अपनी मां को मायके जाने की उत्सुकता में हड़बड़ाते देखकर सुषमा इस बार पूछ ही बैठी”मां,हर साल तो जाती हो नानी के घर।इतनी गर्मी में तीन-तीन ट्रेन बदलकर जाने में क्या तुक है हर साल?अबकी तुम अकेली ही जाना,मुझे नहीं जाना।”मां का खिला चेहरा पल भर में मुरझाकर पीला पड़ गया था उस दिन।
जाने कैसी असुरक्षा की भावना दिखी थी उनके चेहरे पर,कि वह हताश चेहरा कभी भुला नहीं पाई थी सुषमा।बचपन में पांचों भाई-बहन मां के साथ खुशी-खुशी ननिहाल जाते थे।छोटे से घर में मौसी,मामा के बच्चों के साथ सारा दिन हुड़दंगी बहुत भाती थी तब।नानी के बनाए अचार चुराना,खाना चुराकर खाना,दही की हांडी गायब कर देने के षड़यंत्र में सुषमा ही नेतृत्व संभालती थी।यहां तक कि अमूल मिल्क पाउडर भी दो दिन में खत्म हो जाता था।
भरी गर्मी में लाइट की कटौती भी नहीं अखरा करती थी तब।हांथ पंखें से नानी हवा करती रहतीं थीं, अपने मूल के ब्याजों को।आम भी शर्त लगाकर खाना होता था।बेटियों के बच्चों को विशिष्ट सुविधाएं दी जाने की भरसक कोशिश की जाती थी वहां।क्यों?ये तब समझ नहीं आता था,पर अब आने लगा है।ये बच्चे ही तो मां का टिकट होते थे,मायके की। गर्मी की छुट्टियां आईं और बच्चों का नानी के घर जाने की जिद शुरू।मांएं किसी कमांडर की तरह अपने सैनिकों को लगाए रखतीं थीं।जैसे ही दुश्मन खेमा(पापा, दादा-दादी) जज़्बाती हुआ,झट से मनवा लो ननिहाल जाने की बात।यह तरीका शर्तिया काम करता था।
अगली सुबह जब पापा कहते मां से”सुनो वसुधा,इस बार बहुत ज्यादा गर्मी है।तुम्हारे मायके में तो कूलर वगैरह चलते नहीं(कलकत्ता में )।बच्चों को लू ना लगने पाए।एक महीने में ही आ जाना।यहां काम की बड़ी दिक्कत हो जाती है मां को।”मां को मानो काम से एक महीने की छुट्टी मिल जाती।सबके लिए जोड़-तोड़ कर कुछ ना कुछ लेकर ही जाती मां।कहतीं,”देख ना ,वहां से आते समय वो कितना कुछ देतें हैं।
हमारे पास ज्यादा पैसे तो हैं नहीं,इसलिए मैं अचार,मुरब्बा,स्वेटर,मसाले ले जाती हूं।तेरी मामियों को भी अच्छा लगेगा।यह सिलसिला सुषमा के चौदह वर्ष होने तक तो ठीक चला,पर बाद में मन नहीं करता था जाने का।मौसी -मामा के बच्चे भी नहीं आते थे अब।सभी को अब स्पेस चाहिए।वही घर छोटा लगने लगा।
अचार कोई खाने की चीज है? पिज्जा -बरगर कोई खाने नहीं देता।नदी जाने में भी पाबंदी लगा दी मामाओं ने।तो क्या करने जाएं हम।बग़ावत कर दी सभी भाई-बहनों ने कि हम नहीं जाएंगे।आप हो आओ।मां बिना जोर जबरदस्ती करें चुपचाप पापा के साथ चली जाने लगी।ननिहाल से मोह धीरे-धीरे हटने लगा।
अब नाना-नानी नातियों और नातिनियों को देखने के लिए तरसने लगे।मां के विनती करने पर दो -चार साल में हो आती थी सुषमा।इतना सब बदल गया पर नहीं बदला तो मां का मायके के प्रति लगाव।आते समय वैसे ही रोना।सुषमा चिढ़ाते हुए जब कहती”कितना रो लेती हो आप लोग? जबरदस्ती का।हमेशा के लिए थोड़े आती हो ,साल भर बाद तो जाओगी फिर।”
“हां रे सुषमा,एक बार शादी होने दे तेरी,तब देखूंगी तुझे।मायके आने का मन करता है या नहीं देखना तब।हम बेटियां विदाई के साथ मायके की हवा भी बांध लाती हैं अपने दुपट्टे में।जिस बेटी के दिल में मां-बाप के लिए प्यार नहीं,उसे मर जाना चाहिए,और भी ना जाने क्या-क्या।”सुषमा स्वत:ही चुप हो जाती थी।कौन अपना मूड़ फोड़े।इसी ननिहाल जाने और ना जाने के बीच सुषमा अब शादी लायक हो गई।बुआ ने यही सोचकर पास में घर देखा,ताकि आने जाने में दिक्कत ना हो।
ससुराल में कदम रखते ही मां की बातें,उनकी सूनी आंखें,पापा के आंसूओं, भाई-बहनों का रोना आंखों के सामने से जाता ही नहीं था। छिप-छिप कर रोते देखकर सासू मां ने कहा था पति से”कुछ दिनों के लिए छोड़ आ इसे,अपने मायके। छोटे-छोटे भाई -बहन हैं ना,रोते होंगे सुषमा के लिए।”उनको उसी दिन सुषमा ने अपने मस्तक पर स्थान दिया था।ऐसी सास साधारण नहीं हो सकती। शुरू में कुछ महीने रहकर आई।इसी बीच दो बच्चे हो गए।
अब सुषमा के मायके का टिकट तैयार हो चुके थे। छुट्टियां शुरू होते ही बिटिया नानी के घर जाने का राग ऐसा अलापती कि ना चाहते हुए भी सुषमा के पति जाते थे छोड़ने,ढेरों हिदायतें देकर।सुषमा ठीक अपनी मां की तरह कूंदती -फांदती पहुंच जाया करती मां के घर।पूरा समय बच्चे मामा -मौसी की गोद में ही रहते।मां काम भी करने ना देतीं थीं।कहतीं”जितने दिन है यहां,मन भर के सो ले।कुछ करने की जरूरत नहीं।बहुत काम पड़ता है तेरे ऊपर वहां।
अब बस आराम कर।सुबह से खेत से तोड़ी मूली के परांठे,टमाटर की चटनी,चना भाजी पिसी हुई और भी सब सुषमा की पसंद के खाने बनाकर मां बड़े लाड़ से खिलाती।वापस आने की सुनते ही दामाद को भला -बुरा कहना चालू कर देती।वैसे तो मध्यम वर्गीय परिवार था मां का।पर नाती-नातिन के आने की खुशी में महीने भर की पेंशन स्वाहा हो जाती थी।सुषमा के बेटे को गर्म चांवल में बटर खिलाने की आदत मां ने ही डाली थी।
बेटी भी मौसियों की गोद में देशाटन को निकलती।सुषमा की बेटी के रूप में बहुत लाड़ बटोरती थी चुटकी।आते समय सुषमा जब नई साड़ी के साथ अपनी तीन -चार पुरानी साड़ियां रखती थी चुपके से मां की आलमारी में,वो पकड़ लेतीं”,क्यों आखिर ब्याह के बाद मायके का लगाव समझ आने लगा ना तुम्हें? ये साड़ियां तुम भूलती नहीं हो,जान बूझकर छोड़ जाती हो।मेरी ही बेटी हो ना।मैं भी तो ऐसा ही करती थी।
बेटियां अपनी आर्थिक स्थिति को समझते हुए मायके के लिए कुछ ना कुछ देना ही चाहती हैं।यह कन्या गुण है।खूब खुशरहो बेटा।खूब तरक्की करो।बस साल में एक बार आकर हमारे साथ रह लिया करो।यही संजीवनी है अब हमारे लिए।”मां की बात खत्म होते ही सुषमा उनके सीने से लगकर रोते हुए बोली”मुझे माफ़ कर दीजियेगा मां।जब आप मायके जाने की जिद करतीं थीं,तो हम सभी को बहुत चिढ़ होती थी।अब मैं तुम्हारी भावनाओं को समझ सकती हूं।
जहां पैदा हुए,बड़े हुए,स्कूल -कॉलेज गए,वह गली,घर ,नुक्कड़ ,चौराहा अपनाभाई लगता है।और तो और उस गली का कुत्ता भी बड़ा अपना लगता है।हर बेटी को एक बेटी जरूर होनी चाहिए,मां।”दोनों मां -बेटी को रोते देख बच्चे हैरत से पूछते””डिड यू फाइट नानी ?झगड़ा क्यों हो रहा है आप और मम्मी में?”उनकी नानी हंसकर कहती “अरे बच्चों, तुम्हारी मां और उसकी मां अपना -अपन हिसाब समझ रहें हैं।
अचानक बच्चे बड़े हो गए,तो जैसे सफोस्टिकेटेड हो गए।जाने कहां से एटिट्यूड आ गया।अब नानी का घर छोटा लगने लगा।ननिहाल का स्टेटस अब लोअर लगने लगा अचानक।अनएडजस्टेबल हो गया था सब कुछ।अब जब टिकट ही साथ नहीं ,तो सुषमा को जाने की आजादी कैसे मिलती? प्रतिद्वंद्वी खेमे में अब खुशी की लहर दौड़ती दिखाई देती।बच्चों की दादी सीना चौड़ा कर बोलने लगीं,” लो अब क्या कहोगी?
बच्चों के ही जाने का मन नहीं ,तो तुम कैसे जाओगी?पति ने सच्चे जीवन साथी का परिचय देते हुए बच्चों को सही दिशा निर्देश दिए।अपनी पत्नी में दिन-रात कमियां निकालने वाला आदमी ,कभी -कभी पौरुष बल बन जाता है।
बच्चों के मना करने के बाद कुछ दिनों के लिए गई सुषमा।घर में ढेरों काम होतेंहैं,जो उसके ना रहने पर फंस सकतें हैं। देखते-देखते जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गए,ननिहाल से दूर होते गाएं।वहां जानाअबचोरी जैसा लगनेलगा।कुछ दिनों के बाद सालों होने लगे मायके गए।बच्चों के बारे में भी अब जोर-जबरदस्ती नहीं कर सकती।
बड़े जो हो गएं हैं।मायका तो मेरा है,तोमुझे ही रंगों की उबटन लगातेरहनी पड़ेगी।विनती तो नहीं करेगी सुषमा ननिहाल जाने के लिए।बोलें हैं बहुत कुछ बदला है अब वहां।”सुषमा भी पूछ ही ली”मेरा परिवार बदला है क्या,मम्मी पापा बदले हैं मेरे।तुम्हें अब बाहर घुटन होती है, टोका-टोकी से।
ठीकहै बेटा जब तक मेरी मां -पापा)जिंदा रहेंगे,मैं तो जाऊंगी उनसे मिलने।
आज फिरसुषमा का मन किया मां के गले लिपटकर सॉरी बोलदे।हम लोगों के सामने कितना मिमियाती थी,रुकने के लिए।दामाद की जली -कटी का
पूरा ककहरा सुना डालती थी।गले लगाकर धीरे से बोली सुषमा”जब तक आप हो,सुषमा तो आएंगी,और डंडे से बांधकर दामाद को भी लाऊंगी।बच्चों का वो जाने”
मां इसी आश्वासन से खुश हो गई।फिर मुरब्बा,अचार,बड़ी ,बिजौड़े बनाकर रखेगी अपनी बड़ी बेटी के लिए।मायका ,बेटियों के लिए देवलोक से कम थोड़ी है।हमें यहां कोई एंटरटेनमेंट नहीं चाहिए,जोमैटो नहीं चाहिए,मॉल नहीं चाहिए,मेला ही काफी है।जब तक बच्चे छोटें हैं,घूम लेना चाहिए अपना मायका।जैसे ही वो बड़े हो जाएंगे,आपका निकलना दूभर हो जाएगा।कभी बाईं की छुट्टी,कपड़ों पर प्रेस,खाना परोसना ऐसे ना जाने कितने काम किसी और को करना पड़े तो भी अपने मायके की हवा की खुशबू संग हर साल आ जाया करेंगें।हमारी मां को ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा।ठीक है।अब खुश।
शुभ्रा बैनर्जी