मेरा सहारा मेरी बेटी – मंजू ओमर

आज सरस्वती जी के आंख से आंसू बह रहे थे लेकिन होठों पर मुस्कान थी। तभी पडोस मे रहने वाली कावेरी ने आकर कहा अरे माता जी आज तो खुशी का मौका है तब भी आप रो रही है परिवार की परवाह किये बिना आपने इस उम्र मे ज़ो काम किया है उसका तो जवाब ही नहीं, आपके जज़्बे को सलाम है।

नहीं तो इस उम्र में तो आकर लोग बच्चों के मोहताज हो जाते है, कुछ करने की स्थिति मे ही नहीं रहते। हाँ कावेरी तुम सही कह रही हो समय को देखते हुए मैने ये फैसला लिया। आजकल जब तक आप कुछ करने लायक है पैसो से और शरीर से तबतक बहू बेटा परिवार सब अपना है नहीं तो कोई नहीं पूछता सब बेकार है।

बेटे को तो माँ पिता की सम्पत्ति चाहिए और बहू को घर मे काम करने के लिए फ्री की नौकरानी और उसके घर और उसके बच्चे की जो देखभाल कर सके तब तो बहू बेटे के घर आपकी इज्जत है वरना एक नौकर से बढकर कुछ  नहीं है सिवाय बोझ बनकर रह जाना है। एक कबाड की तरह आप बेटे बहू के घर मे पडे पडे जिंदगी गुजार देनी है। 

             सरस्वती जी ने बताया कि ये बातें मेरे पति ने मुझे समझाई थी कि अपने परिवार मे अपनी इज्जत और मान सम्मान को कैसे बनाए रखना है। सरस्वती जी और दीनानाथ दोनों पति पत्नी थे। सरस्वती जब ब्याह कर इस घर में आई थी तो घर मे कुछ भी नहीं था। गाँव मे दो कमरो का छोटा सा मकान था।

जिसमें अपने पिता के साथ दीनानाथ जी रहते थे। दीनानाथ के मां नहीं थी उनकी मृत्यु हो चुकी थी। कुछ खेती बाडी थी उसी से जिवोकोपार्जन होता था। घर मे एक काम वाली रखी थी जो घर का सारा काम कर जाती थी और दीनानाथ का भी थोड़ा खयाल रख जाती थी।

खाना बना कर दीना को खिला पिला कर तब जाती थी। आठ साल का था दीनू जब उसकी माँ गुजर गई थी। गाँव के खेत खलिहान मे खेल कर और पेड़ों पर उछल कूद करते हुए दीनू बड़ा हुआ था। खूब मौज मस्ती में दीनू का बचपन बीता था। वही सरकारी स्कूल में पढ़ने चला जाता था।

लेकिन अब दीनू बड़ा हो गया था गाँव में स्कूल बस आठवीं तक ही था। दसवीं की पढाई के लिए प्राइवेट इम्तिहान देना पडा था क्योंकि गाँव मे आठवीं के बाद पढाई  नही थी। दूर स्कूल था जहाँ से दीनू ने हाई स्कूल किया रोज साइकिल से परीक्षा देने जाता था। 

             अब आगे की पढाई के लिए दीना को शहर जाना ही पडेगा। दीनू के पिता विश्वनाथ जी दीनू को खूब पढाना चाहते थे। उन्होंने तय किया कि खेतों का काम अब बटाई पर देकर दीनू को लेकर शहर चले जाऐ जहाँ आगे की उसकी पढाई हो सके। इस विचार से दीनू को लेकर शहर आ गए। एक कमरा किराए पर लिया

और आगे की पढाई करने लगा दीनू। दीनू पढाई मे होशियार था अच्छे नंबरों से पास होता था। ग्रेजुएशन करने के बाद सरकारी बैंक मे उसे नौकरी मिल गई। कुछ दिनों बाद शहर मे एक छोटा सा मकान खरीद लिया। विश्वनाथ जी ने गाँव की ही लडकी सरस्वती से दीनू की शादी करा दी।

सरस्वती भी बहुत शालीन समझदार और मृदुल स्वभाव की थी। घर गृहस्थी अच्छे से संभाल ली। दो साल में दीनू के एक बेटा और एक बेटी हो गए। सरस्वती बड़ी किफायत से घर चलाती थी। इस बीच विश्वनाथ जी चल बसे अब दीनू अपने परिवार के साथ अकेला रह गया। 

           दीनू के बच्चे धीरे धीरे बडे हो रहे थे। उनकी अच्छी पढाई लिखाई कराई। बेटी दिव्या की शादी कर दी। दामाद अमेरिका मे नौकरी करता था तो बेटी भी वही चली गई। बेटा अजय भी शहर जाकर नौकरी करने लगा। अब घर मे दीनानाथ और सरस्वती रह गए थे। दोनों बच्चे बाहर चले गए

तो दीनू को अपना गाँव बहुत याद आने लगा। सरस्वती से कहते चलो अब गाँव चलकर रहते है अब तो यहाँ कोई नहीं है जिस काम के लिए यहाँ आए थे वो तो हो गया। बच्चे पढ लिखकर अपनी अपनी जगह चले गए। बेटी की शादी हो गई अजय की रह गई है उसे भी निपटा कर गाँव चलते है मेरा रिटायर मेंट भी नजदीक आ रहा है। 

           एक दिन बेटे अजय ने बताया कि वो आपने आफिस की किसी लडकी को पसंद करता है दीनानाथ जी ने कोई रोक नहीं लगाई बोले तुम्हे पसंद है तो ठीक है और उसकी भी शादी निपटा दिया। 

           अब रिटायर मेटं के बाद सरस्वती और दीनू गाँव जाने की तैयारी करने लगे। यहाँ शहर के मकान मे ताला लगाया और गाँव पहुंच गए। वहाँ पहुँच कर खेती के काम मे दिलचस्पी लेने लगे जैसे उनके पिता जी करते थे। ऐसे ही एक दिन खेत मे कुछ काम करवा रहे थे कि कहीं से एक सांप आया और दीनानाथ को काट गया।

बहुत झाडफूकं हुई पर दीनानाथ जी नहीं बच पाए। अब सरस्वती जी अकेली हो गई। सरस्वती को अपना गाँव छोडकर शहर मे रहने की कोई इच्छा नहीं थी। उन्होंने तय किया कि वो गाँव मे ही रहेगी ं। घर मे एक काम वाली आती थी घर का सारा काम कर जाती थी। गंगा, गंगा नाम था उसका वो अपने साथ एक छै साल की बेटी को भी साथ लाती थी। 

         एक बार तीन दिन गंगा काम पर नहीं आई तो सरस्वती जी उसके घर तक पता करने गई वही पास मे रहती थी। वहाँ घर के बाहर उसकी बेटी बैठी रो रही थी और घर मै कोई नहीं था। जब सरस्वती ने गंगा के बारे मे पूछा तो बेटी बोली पता नहीं मम्मी कहाँ चली गई है। और तेरा पापा वो तो घर ही नहीं

आता शराब पीकर कहीं पर पड़ा होगा। तुम्हारी देखभाल करने वाला कोई नहीं है, नहीं। फिर सरस्वती जी को उस बेटी पर तरस आ गया और वो उसे घर ले आई। सीमा नाम था उसका, सरस्वती ने उसे खाने पीने को दिया और घर मे ही रख लिया। दो दिन हो गए कोई भी सीमा को पूछने नहीं आया।

पता चला कि सीमा का बाप होश मे ही नहीं रहता दिन भर दारू पीकर पडा रहता है, और उसकी माँ गंगा किसी दूसरे मर्द के साथ भाग गई है। अब सीमा बेसहारों की तरह पडी है। सीमा सरस्वती के घर रहने लगी उसका खूब मन लगने लगा वहाँ। खाने पीने को मिलता और घर के छोटे मोटे काम भी करती और पडी रहती। सीमा सरस्वती को अम्मा कहकर बुलाने लगी। 

            सीमा के बाप को पता लग गया था कि सीमा सरस्वती जी के यहाँ रह रही है वो और भी निश्चित हो गया उसको क्या उसकी तो जान छूटी। सरस्वती अब सीमा को घर मे पढाने लगी और पास के ही एक सरकारी स्कूल मे पढने को भी भेज दिया। सीमा घर का काम भी करती और पढाई भी करती खूब मन लगने लगा

दोनों का एक दूसरे से। सीमा धीरे धीरे अपने माँ बाप को भूल गई। और किसी ने उसकी खोज खबर भी न ली। माँ तो भाग ही गई थी बाप भी कभी नहीं आया पूछने। अब सीमा सरस्वती के घर को ही अपना घर समझने लगी और खूब प्यार से रहने लगी। 

            पंदरह साल की हो गई सीमा सरस्वती और सीमा मे आपस मे लगाव बढता जा रहा था। आज सरस्वती को बहुत तेज बुखार था। सीमा हर वक़्त सरस्वती का ख्याल रखती दिन भर उसकी सेवा करती, डाक्टर को बुलाती दवा ले आती एक मिनट भी  न छोडती सरस्वती को। तीन चार दिन मे सरस्वती ठीक हो गई

अब तो और भी सीमा के लिए चाह बढ गई। अब तो सगी माँ बेटी जैसी रहने लगीं। खूब पैसा खर्च करती थी सरस्वती उसके ऊपर। खूब अच्छे अच्छे कपड़े लेकर देती सरस्वती अच्छा खाना पीना पाकर सीमा का रंग रूप खूब निखर गया था। 

          इस बार बी ए की परीक्षा दी सीमा ने। अब सरस्वती जी उसकी शादी ब्याह करके बड़ा पुण्य कमाना चाहती थी। लडके की तलाश करने लगीं। अच्छे संस्कार पाकर पली बढी थी सीमा। फिर कुछ दिनों बाद सरस्वती की खोज पूरी हुई। अच्छे संस्कारों को देखकर वही स्कूल के प्रिसिंपल ने अपने बेटे के लिए सीमा का हाथ मागां।

प्रिसिंपल साहब को सरस्वती ने सीमा की पूरी असलियत बताई ये मेरी पाली हुई बेटी है मैंने इसे पैदा नहीं किया है। प्रिसिंपल साहब जो इन भेदभाव को नहीं मानते थे वो तो सबको शिक्षा देते थे कि ये भेदभाव मिटाओ। वो तैयार हो गए इस शादी को। 

       आज सीमा की शादी हो रही हैऔर सरस्वती जी की आखें ऱो रही है। मेरी बेटी जा रही है बहुत बड़ी सहारा थी मेरे लिए। लेकिन मेरे हाथों उसका भविष्य संवर गया इस कुछ लिए मै बहुत खुश हूँ। सीमा सरस्वती अम्मा के गले लगकर रो रही थी अम्मा तुम अकेले हो गई हो अपना ध्यान रखना। वैसे मै तो हमेशा आपका ध्यान रखूगीं बस आप एक बार फोन कर देना मै दौडी चली आऊंगी। 

     दोस्तों कभी कभी अनजाने मे ही ऐसा रिश्ता जुड जाता है, जो अपनो से भी ज्यादा बढकर अपना हो जाता है। 

मंजू ओमर

झांसी उत्तर प्रदेश

9 अप्रैल

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