नीलिमा स्तब्ध रह गई। जिस कठपुतली को वह उंगलियों पर नचाती थी, उसने पहली बार खुलकर इनकार कर दिया था। नीलिमा ने तुरंत अपना पैंतरा बदला और आंखों में आंसू लाकर बोली, “अंजलि, तुम मुझसे ऐसे बात कर रही हो? मैंने तो तुम्हें अपनी सगी बहन समझा था। क्या यही सिला है मेरे प्यार का?”
तभी कमरे के दरवाज़े पर सास पार्वती जी, ससुर जगदीश जी और सोहन आकर खड़े हो गए। पार्वती जी ने आगे बढ़कर कड़े शब्दों में कहा, “बस कर नीलिमा! तेरी इस झूठी चाशनी और मक्कारी का पर्दाफाश आज हो चुका है।
अंजलि के विवाह को अभी सवा साल ही हुआ था। घर में ससुर जगदीश जी, सास पार्वती जी, जेठ विवेक, जेठानी नीलिमा, उनके दो चंचल बेटे—आरव और अयांश, अंजलि का पति सोहन और गोद में खेलता उसका तीन महीने का नन्हा बेटा कबीर था।
अंजलि स्वभाव से बेहद भोली, सरल और सेवाभावी स्त्री थी। नियति की मार उसने बहुत छोटी उम्र में ही देख ली थी; एक सड़क दुर्घटना में उसके माता-पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया था। मामा-मामी के घर पली-बढ़ी अंजलि ने बचपन से ही ‘पराई अमानत’ और ‘बोझ’ जैसे कड़वे ताने सुने थे। इसी अभाव और अकेलेपन ने उसके मन में अपनों के प्रति एक ऐसी तड़प भर दी थी कि अगर कोई उससे दो बोल प्यार से बोल देता, तो वह उस पर अपनी जान छिड़कने को तैयार हो जाती। जिसे खोने का असहनीय दर्द पता हो, वह हर रिश्ते को सहेजने के लिए खुद को भी दांव पर लगा देता है।
इसके ठीक उलट, उसकी जेठानी नीलिमा बेहद चालाक, दुनियादार और बातों की बाजीगर थी। नीलिमा को अच्छी तरह पता था कि बिना हाथ हिलाए दूसरों से अपना काम कैसे कराया जाता है। वह अंजलि की दुखती रग यानी उसके अपनेपन की भूख को पहचान चुकी थी। नीलिमा दिन की शुरुआत ही इतनी मीठी और लाड़-भरी बातों से करती कि अंजलि चाहकर भी किसी बात के लिए न नहीं कह पाती।
“अरे मेरी प्यारी अंजलि! तुम सच में इस घर के लिए किसी वरदान से कम नहीं हो। तुम्हारे बिना तो यह घर बिखर ही जाता। मुझे आज सिर में भयंकर दर्द है, ज़रा नाश्ता तुम देख लोगी न मेरी जान?” नीलिमा बड़े दुलार से अंजलि के सिर पर हाथ फेरती और फिर खुद कमरे में जाकर आराम से मोबाइल पर वीडियो देखने या अपनी सहेलियों से गपशप करने में मशगूल हो जाती।
अंजलि खुश हो जाती कि जेठानी उसे इतनी अहमियत देती है। सुबह की चाय से लेकर रात के बर्तनों तक, पूरे आठ-नौ लोगों के परिवार का भोजन, साफ-सफाई, कपड़े और ऊपर से नीलिमा के दोनों बच्चों को स्कूल भेजने की तैयारी—सब अकेले अंजलि के कंधों पर आ टिका था। जब नीलिमा को बाज़ार जाना होता, सहेलियों की किट्टी पार्टी में शामिल होना होता या मायके घूमने निकलना होता, तो वह दोनों बच्चों को अंजलि के हवाले छोड़कर कहती, “अंजलि, इन शैतानों को तुम्हारे सिवा कोई संभाल ही नहीं सकता। तुम तो इनकी छोटी मां हो, आखिर मेरा तुम्हारे सिवा इस घर में अपना है ही कौन?”
अंजलि भी अपने तीन महीने के मासूम कबीर को एक हाथ से संभालते हुए दूसरे हाथ से आरव और अयांश की देखरेख करती। उन्हें नहलाना, खाना खिलाना, होमवर्क कराना—सब बड़े प्यार और निश्छल मन से करती। लेकिन इस आपाधापी में उसका अपना स्वास्थ्य दिन-ब-दिन गिरता जा रहा था। आंखों के नीचे काले घेरे उभर आए थे और चेहरे का नूर गायब हो चुका था।
सास पार्वती जी यह सब रोज़ देखती थीं। वे समझदार और अनुभवी महिला थीं। उन्होंने कई बार अंजलि को रसोई में अकेले पसीना बहाते देखा, तो एकांत में समझाते हुए कहा, “बहू, तू इतनी सीधी मत बन। अभी तेरी डिलीवरी को तीन महीने ही हुए हैं। इस समय शरीर को आराम और पौष्टिक आहार की ज़रूरत होती है। इतना भागदौड़ वाला काम तेरे शरीर को अंदर से खोखला कर देगा। नीलिमा से भी बोल कि वह घर के कामों में हाथ बंटाए। कबीर अभी बहुत छोटा है, उसे तेरी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, और सोहन भी शाम को थका-हारा आता है, तू उसे भी समय नहीं दे पाती। यह अति किसी दिन तुझे भारी पड़ जाएगी।”
पर अंजलि मुस्कुराकर सास की बातों को टाल देती। वह कहती, “मां जी, दीदी का स्वभाव कितना अच्छा है। वह मुझसे इतना प्यार करती हैं, मुझे अपनी छोटी बहन मानती हैं। परिवार के लिए काम करने में भला क्या हर्ज है? मैं बिल्कुल ठीक हूं, आप व्यर्थ ही चिंता करती हैं।” अंजलि को लगता था कि सास शायद जेठानी के प्रति थोड़ी सख्त हैं, जबकि जेठानी तो उसके प्रति इतनी मीठी और संवेदनशील हैं।
नीलिमा की होशियारी का सबसे बड़ा खेल तब शुरू होता जब घर में तारीफें बटोरने का वक्त आता। अंजलि रसोई में घंटों खड़े रहकर तरह-तरह के व्यंजन तैयार करती। जब खाना परोसने की बारी आती, तभी नीलिमा बड़े करीने से सज-धजकर रसोई में दाखिल होती और थालियां हाथ में लेकर अंजलि से कहती, “अरे मेरी प्यारी बहना! तुम तो पसीने से तर-बतर हो गई। अब तुम जाओ और थोड़ा आराम करो, बाकी सब मैं संभाल लूंगी। अब मैं अपनी बहन का ख्याल नहीं रखूंगी तो कौन रखेगा? हमारा तो जन्मों का नाता है।”
इसके बाद जब ससुर जगदीश जी और जेठ विवेक खाने की मेज पर बैठते, तो नीलिमा मुस्कुराते हुए कहती, “पापा जी, देखिए आज मैंने आपके पसंद की कढ़ी और कचौड़ियां खास मसाले डालकर बनाई हैं। आप खाकर बताइए कैसी बनी हैं।” ससुर और पति नीलिमा की तारीफों के पुल बांध देते, और बेचारी अंजलि अपने कमरे में थकी-हारी भूख भूलकर रोते हुए कबीर को चुप कराने में जुटी रहती।
सोहन जब रात को दफ्तर से लौटता, तो अंजलि को हमेशा बेदम और अधमरी हालत में पाता। जब वह अंजलि से पूछता, तो अंजलि भाभी की चालाकी छिपाते हुए सिर्फ यही कहती कि घर के कामों में थोड़ा वक्त लग गया। सोहन भी समझ नहीं पा रहा था कि अंजलि इतनी उपेक्षित क्यों महसूस कर रही है।
एक दिन दोपहर को नीलिमा को अपनी एक दूर की रिश्तेदार की शादी की खरीदारी के लिए मॉल जाना था। उसने फिर वही मीठी चाशनी घोली, “अंजलि, मैं बस दो घंटे में आ रही हूं। आरव और अयांश को ज़रा देखना, और शाम की चाय और नाश्ते की तैयारी कर लेना मेरी लाडो।”
अंजलि उस दिन सुबह से ही हल्के बुखार और कमजोरी से जूझ रही थी। उसने सोचा कि थोड़ी देर आराम करेगी, लेकिन दोनों बच्चों की फरमाइशें और कबीर का लगातार रोना उसे सांस भी नहीं लेने दे रहा था। अचानक कबीर को तेज़ बुखार चढ़ गया। वह बुरी तरह तड़पने लगा। अंजलि घबरा गई। उसने नीलिमा को फोन लगाया, “दीदी, कबीर का शरीर आग की तरह तप रहा है, मुझे बहुत घबराहट हो रही है। आप कब तक आएंगी?”
नीलिमा ने फोन पर चिढ़ते हुए कहा, “अरे अंजलि, बच्चों को थोड़ा-बहुत बुखार तो होता ही रहता है। मैं अभी एक ज़रूरी शोरूम में हूं, तुम ज़रा गीली पट्टी रख दो और खुद संभालो। हर छोटी बात पर मुझे परेशान मत किया करो।” कहकर उसने फोन काट दिया।
नीलिमा की आवाज़ का वह रूखापन और स्वार्थ अंजलि के सीने में तीर की तरह चुभ गया। आज पहली बार उस मीठी चाशनी के पीछे छुपा विषैला सच अंजलि के सामने नग्न होकर खड़ा था। जिस जेठानी के बच्चों के लिए वह अपनी सुध-बुध खो बैठती थी, उसी जेठानी के पास अंजलि के बीमार बच्चे के लिए हमदर्दी का एक शब्द तक नहीं था।
अंजलि की आंखों से आंसू बह निकले, लेकिन उस लाचारी ने उसके भीतर सोई हुई ममता और स्वाभिमान को जगा दिया। उसने तुरंत सास पार्वती जी को आवाज़ दी। पार्वती जी दौड़कर आईं और कबीर की हालत देखकर चौंक गईं। उन्होंने सोहन को फोन किया और तुरंत डॉक्टर के पास ले गईं। समय पर इलाज मिलने से कबीर की तबीयत संभल गई।
अस्पताल से लौटते समय अंजलि पूरी तरह बदल चुकी थी। उसके भीतर का भोलापन अब विवेकपूर्ण परिपक्वता में बदल गया था। उसे समझ आ गया था कि रिश्तों में त्याग केवल तब तक सुंदर लगता है जब तक दोनों तरफ से सम्मान हो; जब त्याग का इस्तेमाल शोषण के लिए होने लगे, तो वहां सीमा रेखा खींचना अनिवार्य हो जाता है।
शाम को जब नीलिमा हाथों में शॉपिंग बैग लिए हंसती-खिलखिलाती घर लौटी, तो उसने देखा कि रसोई ठंडी पड़ी थी। कोई चाय नहीं बनी थी, न ही रात के खाने की कोई तैयारी थी। उसने तुरंत अंजलि के कमरे का रुख किया और पुराने मीठे अंदाज में शिकायती लहजे में कहा, “अरे अंजलि! घर में अंधेरा क्यों है? किसी ने चाय तक नहीं बनाई? मेहमान आने वाले हैं, तुम यहां बैठी हो? चलो उठो, जल्दी से कुछ बना लो।”
अंजलि ने इस बार नज़रें झुकाकर हामी नहीं भरी। उसने अपने बीमार बच्चे को सीने से लगाया, सीधी खड़ी हुई और बेहद शांत, गंभीर तथा दृढ़ आवाज़ में कहा, “दीदी, कबीर की तबीयत बहुत खराब है और उसे इस वक्त मेरी सबसे ज्यादा ज़रूरत है। डॉक्टर ने मुझे भी पूरी तरह आराम करने को कहा है। आज से घर के कामों की आधी ज़िम्मेदारी आपको खुद उठानी होगी। रसोई खुली है, आप चाय और खाना बना लीजिए।”
नीलिमा स्तब्ध रह गई। जिस कठपुतली को वह उंगलियों पर नचाती थी, उसने पहली बार खुलकर इनकार कर दिया था। नीलिमा ने तुरंत अपना पैंतरा बदला और आंखों में आंसू लाकर बोली, “अंजलि, तुम मुझसे ऐसे बात कर रही हो? मैंने तो तुम्हें अपनी सगी बहन समझा था। क्या यही सिला है मेरे प्यार का?”
तभी कमरे के दरवाज़े पर सास पार्वती जी, ससुर जगदीश जी और सोहन आकर खड़े हो गए। पार्वती जी ने आगे बढ़कर कड़े शब्दों में कहा, “बस कर नीलिमा! तेरी इस झूठी चाशनी और मक्कारी का पर्दाफाश आज हो चुका है। जब अंजलि का बच्चा तड़प रहा था, तब तेरी बहन जैसी ममता कहां मॉल में खो गई थी? अंजलि इस घर की देवरानी है, तेरी नौकरानी नहीं। तूने उसकी सादगी और अकेलेपन का जो नाजायज़ फायदा उठाया है, वह अब इस घर में नहीं चलेगा।”
ससुर जगदीश जी ने भी गंभीर स्वर में कहा, “पार्वती बिल्कुल सही कह रही है। आज के बाद इस घर का हर काम दोनों बहुओं में बराबर बंटेगा। कोई किसी पर अपना बोझ नहीं डालेगा।”
नीलिमा का सिर शर्म से झुक गया। उसकी चालाकी का खेल हमेशा के लिए खत्म हो चुका था।
उस दिन के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। अंजलि ने किसी से कोई बैर नहीं पाला, लेकिन उसने अपनी सीमाएं तय कर लीं। उसने अपने बच्चे, अपने पति और अपनी सेहत को पहली प्राथमिकता दी। नीलिमा को भी समझ आ गया कि दिखावटी मिठास से रिश्ते नहीं चलते, और उसने भी धीरे-धीरे अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाना शुरू कर दिया।
अंजलि के आत्मसम्मान और समझदारी ने न केवल उसके परिवार को बिखरने से बचाया, बल्कि उसे शोषण की बेड़ियों से आज़ाद कर एक गरिमापूर्ण और सुखी जीवन की राह दिखाई।
पाठकों के लिए विचारणीय प्रश्न:
क्या हमारे समाज में अक्सर सादे और संवेदनशील स्वभाव के लोगों की अच्छाई का फायदा उनके अपने ही उठाते हैं? क्या रिश्तों में कड़वी सच्चाई, दिखावे की मीठी चाशनी से कहीं बेहतर नहीं होती? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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