मेरे जैसे बदनसीब दुनिया में कोई नहीं – सीमा सिंघी

नंदू के जाने के बाद गीता की जिंदगी बड़ी वीरान हो गई थी। उसने बड़ी भाग दौड़ कर अपने पति नंदू का इलाज कराया मगर अचानक ऐसी निगोड़ी बीमारी आ लगी । जो नंदू को ले जाकर ही शांत हुई।

नंदू तन से गरीब था मगर मन से नहीं इसीलिए वो गीता और अपनी दस वर्षीय गुड्डी को बहुत खुश रखता और खुद भी बड़ा खुश रहता। उसका कहना था की जरूरी नहीं, पैसे से ही खुशियां मिल सकती है। किसी के लिए बुरा मत सोचो, बुरा मत करो और पति-पत्नी के रिश्ते में भी एक दूसरे को अच्छी तरह समझो।

उनकी भावनाओं की दिल से इज्जत करो तो, बहुत सॉरी खुशियां मिल सकती है । यही कारण था कि नंदू गीता की छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रखता था और गीता भी नंदू की बातों का बहुत मान करती थी।

नंदू शाम को दुकान से लौटते वक्त बाजार से कभी गुड्डी के लिए जलेबी, कभी गीता के लिए फूल लाना कभी नहीं भूलता। 

 गीता भी नंदू के लाए हुए फूलों में से एक फूल गुड्डी के लगाना कभी नहीं भूलती। गीता को लगता नंदू के लाए हुए फूलों से उसका घर और जीवन दोनों महक उठे हैं । गुड्डी भी उस फूल को लगाए गांव भर में घूमती थी और सबको उसके बाबूजी के द्वारा लाए हुए फूलों के बारे में भी बताती ।

जबकि नंदू के बड़े भाई गजेश को यह सब आडंबर लगते थे। उसे यह सब बिल्कुल भी पसंद नहीं था । वह घर पर भी कुछ भी अपने साथ नहीं लेकर आता। यह देख मन ही मन उसकी पत्नी रानू और उसका बेटा सोनू बहुत दुखी होते मगर गजेश को कहने की कभी हिम्मत नहीं होती क्योंकि गजेश बहुत क्रोधी स्वभाव का था।

ये सब देखकर गीता की जेठानी रानू नंदू और गीता से मन ही मन ईर्ष्या करने लगी। वो हर वक्त दोनों के अंदर झगड़ा कराने के लिए कुछ ना कुछ प्रयास करते रहती मगर उसके सारे प्रयास विफल हो जाते। यहां तक की कभी बेवजह ही मौका पाकर गीता को नीचा दिखाने में भी बाज नहीं आती। जेठानी रानू की यह सारी बातें गीता बहुत अच्छी तरह समझती थी मगर बेवजह झगड़ा करके परिवार में कलह करना नहीं चाहती थी इसीलिए वह चुप रह जाती ।

आज अचानक नंदू के चले जाने के बाद रानू को गीता के लिए बहुत बुरा लग रहा था। उसे आज अपनी सोच और व्यवहार पर बड़ी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि जिस इंसान और उसकी पत्नी से उसने जीवन भर ईर्ष्या की भावना रखी। अब वही नहीं रहा तो अब सुधर जाना ही सही होगा और सही मायने में उसे बहुत पछतावा भी हो रहा था।

वो गीता को सहलाते हुए लगभग रोते हुए बोल उठी। गीता मेरी बहन मुझे क्षमा कर दे। मैंने तेरे साथ कितना बुरा व्यवहार किया। मगर तूने समझदारी से काम लिया और परिवार को जोड़े रखा वरना मैंने तो तेरे जीवन में आग लगाने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मगर मेरी बहन मेरी गीता न जाने तु किस मिट्टी की बनी है जो सब ठीक चलते रहा। सच कहती हूं मेरे जैसे बदनसीब दुनियां में कोई नहीं और कहीं भी नहीं मिलेंगे जो इतने अच्छे देवर देवरानी मिलने के बाद भी मैं उन्हें अपने व्यवहार और जुबान से स्नेह नहीं दे पाईं कहते हुए गीता को अपने गले से लगा लिया और फिर रोने लगी

 अपनी जेठानी की बातें सुनकर गीता भी उदास होकर धीरे से बोल उठी। दीदी अभी यह वक्त इन सब बातों के लिए सही नहीं है फिर भी आप इतना समझ गई, यही मेरे लिए बहुत है और हां 

दीदी बदनसीब तो मेरे जैसा भी कोई नहीं, जो आज मैं गुड्डी के बाबूजी के बिना अकेली हो गई हूं कहते हुए रोने लगी। गीता के मुंह से ऐसी विरह भरी बातें सुनकर जेठानी रानू का दिल पूरा पिघल उठा। वह फिर गीता को समझाते हुए कहने लगी। देख गीता दुनिया में जो आया है, उसे एक दिन जाना भी होता है किसी की सांसों पर हम इंसानों का कोई हक नहीं होता। मगर तू बदनसीब नहीं है क्योंकि आज से हम सब तेरे साथ हैं। कहते हुए रोती हुई गीता को अपने दिल से लगा लिया।

आज इस तरह गीता को पहली बार गले लगा कर रानू का कलेजा फटा जा रहा था मगर मन के किसी को कोने में अपनी गलती सुधारने की वजह से एक संतोष भी था।

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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