ममता का रंग’ – प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’

“मेरी मां बुआ के यहां शादी में नहीं जाएंगी….”वसुधा के कुछ कहने से पहले वसुधा की बेटी सौम्या ने जैसे ही कहा तो सब अवाक रह गए।

“बेटा….”

“मां प्लीज…, इस बार आप कुछ भी कहने से मुझे मत रोको….वैसे भी आज तक आप मुझे ही चुप करवाती आई हो और किसी से आप कुछ नहीं कहती.. ” 

“लेकिन ऐसे कैसे हो सकता है…यदि नहीं गई तो सबको….सबसे बड़ी बात दीदी को कितना बुरा लगेगा…और वैसे भी तू अभी बच्ची है इसलिए बड़ों के बीच में चुप रहा कर और हां कल दोनों समय से तैयार हो जाना….” वसुधा की जेठानी शालनी ने सौम्या को चुप कराते हुए कहा।

“मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूं अब….मुझे पता है कि आप मां को हर जगह साथ क्यों ले जाते हो ….जिससे उन पर काम की सारी जिम्मेदारी डाल दें और खुद एंजॉय कर सकें….और वैसे भी पापा नहीं है तो शगुन के सभी कार्य तो उनके बिना ही होते हैं तो मां जाकर क्या करेंगी ……..”

“अरे इसकी जवान तो देखो कितनी चल रही है….( वसुधा की और देखते हुए) और तू चुपचाप खड़ी सुन रही है ….अरे एक–दो साल में इसका विवाह हो जाएगा तो भगवान ही मालिक है कि ससुराल में कैसे निभाएगी….साथ ले जायेगी क्या अपने…”शालिनी ने गुस्से से कहा।

“साथ ले जाऊंगी मां को या साथ रहूंगी वो तो समय बताएगा लेकिन इस विवाह में जब वरुण भैया का पुनर्विवाह हो रहा है, मां नहीं जाएंगी तो नहीं जाएंगी बस….” सौम्या ने लगभग चीखते हुए कहा।

“चुप भी हो जा अब….” वसुधा ने सौम्या से कहा

“और दीदी आप…आप तो समझदार है आप ही मान जाइए…आप तो जानती हैं कि जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो मां बाप की चलती ही कहां है उनके आगे …अब मां जी को ही देख लीजिए (पास खड़ी अपनी सास की ओर इशारा करते हुए) ….” हाथ जोड़ते हुए वसुधा ने कहा।

वसुधा की बातें सुन शालनी चुप हो गई और मुंह बनाते हुए वहां से चली गई…क्योंकि इस बार वसुधा ने सीधा उस पर कटाक्ष किया था कि उसके और उसके पति के आगे मां की नहीं चलती।

इस बहस के बाद वसुधा बीती यादों में खो गई….जब सौम्या गर्भ में ही थी कि एक दुर्घटना ने उसके पिता का साया उसके सिर से उठ गया था….सौम्या पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था….मायके वालों ने 1 माह बाद जब वसुधा को अपने साथ अपने यहां ले जाने और गर्भ गिरवाने की बात ससुराल वालों से छेड़ी तो सास ने ये कहकर कि लोग क्या कहेंगे कि बेटा नहीं रहा तो बहू को भी निकाल दिया और फिर ये उनके बेटे की आखिरी निशानी है इसलिए ये नहीं हो सकता है। कहते हुए मायके वालों की बात को मानने से इंकार कर दिया।

“एक तो मेरा भैया चला गया और तुम लोग हो कि उसकी निशानी को भी….”कहते हुए नन्द भी सुनाने लगीं

अब मायके वाले चुप हो गए हालांकि वसुधा भी नहीं चाहती थी सुबोध की निशानी को मिटाना लेकिन उस समय तो वो कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थी इसलिए चुप ही रह गई और वैसे भी अच्छा ही हुआ आज सुबोध की निशानी सौम्या से उसके जीवन में मातृत्व के रंग भरे हुए थे।

सुबोध के जाने के 8 माह बाद जब सौम्या का जन्म हुआ तब ससुराल वालों के चेहरे के रंग उड़ गए…उन्हें बेटे की उम्मीद थी जो कि पूरी नहीं हुई आखिर भगवान के आगे किसकी चलती है..

कुछ महीनों तक सब सामान्य चलता रहा लेकिन जब पति का साथ न हो तो ससुराल वालों के रंग बदलते देर नहीं लगती…..वसुधा पर भी सभी के अत्याचार बढ़ते गए….वह बहू कम इस घर की एक नौकरानी बनकर रह गई….जिसको जब काम होता ऑर्डर चला देता…. जहां तक कि किसी रिश्तेदारी में कोई प्रोग्राम होता जहां पूरे परिवार को जाना होता वहां भी सारी जिम्मेदारी वसुधा पर डाल दी जाती और खुद सब लोग एंजॉय करते….

वसुधा की स्थिति देख जब पुनः मायके वालों ने वसुधा के पुनर्विवाह की बात चलाई तब भी सास और ननद ने ये कहकर मना कर दिया कि अरे भाग्य में अगर पति का सुख लिखा ही होता तो सुबोध का ही साथ नहीं छूटता…हमारे यहां पुनर्विवाह नहीं होता…।

“लेकिन आप ये भी तो सोचो कि वसुधा की अभी उम्र की क्या है पूरी जिंदगी वो अकेले किसके सहारे गुजरेगी….”

“अरे तो क्या इससे पहले कोई विधवा नहीं हुई….ये तो भी 24 साल की है पहले के जमाने में तो बहुत कम उम्र में विवाह हो जाते थे तब भी तो कुछ महिलाएं वैधव्य जीवन बितातीं थीं….और फिर चलो मान भी लें तो क्या कोई इसकी बेटी को उतना अपनापन दे पाएगा क्या जो इसे जहां मिल रहा है….”

“लेकिन उसे तो आप लोग रखोगे न….आपने ही तो बोला था कि वो आपके बेटे की निशानी है….और फिर वसुधा आती रहेगी न सबसे मिलने….संबंध तो रहेंगे ही न; रिश्ते थोड़े ही न खत्म हो रहे हैं….”

इस बात को सुनकर सब सुन्न रह गए…..वसुधा को भी अपने मां बाबूजी से इस प्रकार की उम्मीद नहीं थी कि वो उसकी बेटी को उससे अलग करने की सोच रखते हैं तो, उसे आश्चर्य हुआ कि उसकी बेटी से उन्हें जरा भी लगाव नहीं है…इससे पहले कि कोई कुछ कहता वसुधा ही बीच में बोल पड़ी “लेकिन मैं अपनी बच्ची के बिना नहीं रह सकती….और मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि आप लोग क्यों फालतू बहस में पड़े हैं….मैं जैसी भी हूं ठीक हूं….”

उस समय सब चुप हो गए कि बाद में सोचा जाएगा।

फिर कुछ दिनों बाद जब वसुधा मायके गई तब उसे पता चला कि मायके वाले उसकी बेटी के प्रति इतना निष्ठुर क्यों थे….

“देख वसुधा, हम भी नहीं चाहते कि तुझे तेरी बेटी से दूर किया जाए लेकिन हमें तेरे प्रति तेरे ससुराल वालों के व्यवहार की पता है इसलिए हम तेरा पुनर्विवाह करना चाहते हैं और गुड़िया को उनके पास छोड़ने को तो बस ऐसे ही बोल दिया था क्योंकि हम जानते हैं कि वो बेटी को  नहीं रखेंगे….”

“लेकिन आपको….” वसुधा अवाक सी अपनी मां को देख रही थी।

” तूने तो हमें कुछ नहीं बताया लेकिन एक दिन तेरा भाई तेरे यहां गया था तब तुझे तेरी सास और जेठानी जो सुनाने में लग रहीं थी वो सब उसने सुन लिया और फिर बाहर से ही वापिस आ गया… उनके अनुसार उस घर का बेटा चला गया तो तुझसे संबंध ही क्या बचा…तेरी बेटी को जिसके जन्म लेने से पहले ये सोचकर कि बेटा होगा निशानी बोल रहे थे, अब मनहूस और बोझ कहने लगे हैं ….उनके अनुसार यदि वो तुझे नहीं रखें तो तेरा कहीं ठिकाना नहीं है, तू उनके अहसान तले है इसलिए जैसे चाहे वैसे वो रखेंगे…..यही बातें सुनने के बाद ही हमने फैसला किया कि तेरा पुनर्विवाह कर देंगे और फिर आजकल तो पुनर्विवाह होते भी है…अगर उसी समय तेरा भाई अंदर जाकर उनसे कुछ कहता तो वो सफाई देने से नहीं चूकते या फिर बात ज्यादा बढ़ जाती और फिर हो सकता है तुझे और परेशान करने लगते….और फिर यदि हम ये कहें कि तू यहीं रह ले तो वो इसे मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं….इसलिए यही सही रहेगा कि तू पुनर्विवाह कर ले और रही बात बच्ची की तो ऐसा घर परिवार देखेंगे जो बेटी को भी अपना लें….बस एक बार तेरे यहां सब हां कर दें …क्योंकि उनकी मर्जी के खिलाफ अगर हमने किया तो विवाह के सारे खर्च की जिम्मेदारी हम पर आ जाएगी और तुझे तो पता है कि अभी कुछ साल पहले तेरे विवाह में कितना खर्च हुआ था और अब तेरी बहन का भी करना है तो …..कम से कम तेरे ससुराल वाले हां कर देंगे तो वो सामान जो हमने दिया था और अभी तक तेरे यहां पैक ही रखा है उसे तो दे देंगे और कुछ हम कर देंगे तो सब हो जाएगा…।”

वसुधा की आंखों में ये सोच आंसू आ गए कि वो पहले कितना गलत सोच रही थी उसने पुनर्विवाह के लिए मूक सहमति जता दी….

जब कुछ दिन बाद भाई और पापा एक लड़के की फोटो को लेकर उसकी ससुराल आए तब ससुराल वालों ने बहुत हंगामा किया और ये कहकर कि उनके यहां ऐसा न तो पहले कभी हुआ है और न अब होगा….मना कर दिया।

बस तभी से वसुधा भगवान की मर्जी मान सब कुछ चुपचाप सहती चली जा रही थी….सौम्या जैसे जैसे बड़ी होती जा रही थी, समझदार होती जा रही थी….उसे भी सब बातें पता चल गईं थीं….उसे मां का अपमान सहन नहीं होता था अतः उसने मन ही मन ठान लिया था कि एक दिन वह अपने पैरों पर खड़ी होकर मां को सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार दिलवा कर रहेगी…एक बेटी होकर भी बेटे का पूरा फ़र्ज़ निभाएगी।

और आज के दिन बस यही हो रहा था…..आज जो ननद पुनर्विवाह के खिलाफ थीं जब वही आज अपनी बहू के मरने के सालभर बाद ही अपने बेटे का पुनर्विवाह कर रहीं थीं जिससे उनके 2 साल के बेटे को मां का सुख मिल सके…तब सौम्या का गुस्सा फट पड़ा….आज वह पढ़ लिख कर एक छोटी सी प्राइवेट कंपनी में जॉब करने लगी थी और साथ ही विभिन्न प्रतियोगिताओं की तैयारी भी कर रही थी जिससे भविष्य में किसी अच्छे पद पर सरकारी जॉब पा सके….

आज वह वसुधा के मान सम्मान को सबसे आगे रख रही थी जिसे सब लोग कभी फर्ज तो कभी जिम्मेदारियों का नाम देकर भूल गए थे….

पति के जाने पर वसुधा की बेरंग जिंदगी को जिसे सब लोगों ने अपने अपने रंग दिखाए थे उसी बेरंग जिंदगी को आज सौम्या ममता के रंग के साथ साथ सम्मान और अधिकार के रंग से सजाने में लग चुकी थी….

बेटी को देख आज वसुधा को सभी रिश्तों के रंग से ममता का रंग पक्का नजर आ रहा था जो कभी बदलने वाला नहीं था

 # रिश्तों के रंग  

प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’

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