मकान बना घर – गीता वाधवानी

 मायरा ने खीर की कटोरी दादी के हाथ में देते हुए कहा “-यह लो दादी जल्दी से खा लो ज्यादा गम नहीं है और कटोरी वापस मुझे दे दो।” 

 दादी ने जल्दी से कटोरी मुंह से लगाकर खीर खाली और मायरा को आंसू भरी आंखों से आशीर्वाद देने लगी। 

 मायरा कटोरी ले जाकर रसोई में रख आई। दरअसल यह बूढी मां उसकी सास की भी सास थी। मायरा की सास पार्वती ने अपने ससुर जी के गुजर जाने के बाद उनको एक पीछे के आंगन में बने छोटे से कमरे में रहने पर मजबूर कर दिया था।पार्वती अपने पति की भी सुनती नहीं थी एक बार लड़ाई होने पर मायरा के ससुर ने उनसे कहा भी था “पार्वती याद रखना बुढ़ापा तो सबको आता है, ईश्वर से डरो, मेरी मां को इतना परेशान मत करो।” 

 पार्वती-” तो ऐसा करो, मां बेटा एक साथ रह लो  ” 

 तब मायरा के ससुर जी चुप रह गए, कुछ बोले नहीं। 

 छोटे से कमरे में एक चारपाई पर गर्मी में बिना पंखे के उनकी मां कैसे रहती होगी,वह यही सोचते रहते थे फिर एक दिन उन्होंने और उनके बेटे रजत ने यानी कि मायरा  के पति रजत ने मिलकर एक पंखा खरीद कर मन के कमरे में लगवा दिया। 

 तब भी पार्वती ने खूब लड़ाई करी, लेकिन रजत के चिल्लाने पर वह चुप हो गई। 

 रजत ने कहा-” मां,दादी के साथ इतना बुरा व्यवहार मत किया करो। वह हम सब से कितना प्यार करती है। ” 

 पार्वती-” ज्यादा मत बोल, जब से वह बीमार रहने लगी है मुझे उनके कपड़ों से अजीब सी महक आती है और मुझे अच्छा नहीं लगता। ” 

 रजत-” तो आप उनके कपड़े रोज क्यों नहीं बदलवाती हो, उनका ध्यान क्यों नहीं रखती हो। बीमारी तो किसी को भी हो सकती है, क्या वे जानबूझकर बीमार हुई है? ” 

 पार्वती ने कुछ नहीं कहा, बस बुरा  सा मुंह बना लिया। 

 एक बार मायरा तीन-चार दिन के लिए मायके गई थी। वापस आने पर वह दादी के पास खिचड़ी लेकर गई। तब दादी ने कहा-” बेटा,आज और कुछ बना है क्या? तू नहीं थी, मैं 3 दिन से खिचड़ी ही खा रही हूं, इससे अच्छा है तो आज मैं भूखी ही रह जाऊं। खिचड़ी में कोई स्वाद नहीं है। ” 

मायरा-” दादी, आप क्या खाओगे,बताओ,मैं अभी फटाफट बनाकर लाती हूं। ” 

 दादी -” नहीं रहने दे, मैं भूखी रह लूंगी, तेरी सास पार्वती को पता लगेगा तो चिल्लाएगी, तुझे भी सुनाएगी और मुझे भी। ” 

मायरा -” दादी, मम्मी जी तो अपनी सहेली के घर गई हैं, शाम तक वापस आएंगी, वैसे भी मैं उनसे डरती नहीं हूं और आप भी मत डरा करो। आप बताओ क्या खाओगी? ” 

 दादी -” मेरा मन दो तीन महीने से बैंगन का चटपटा बरथा खाने को कर रहा है।” 

मायरा-” बस इतनी सी बात, अभी बनाकर लाती हूं। ” 

 उसकी आंखों में आंसू आ गए थे कि इतनी तुच्छ  चीज के लिए दादी मां तरस रही है। वह तुरंत गई और बैंगन के बरथे के साथ पतली पतली नरम नरम रोटियां बनाकर ले आई। आज दादी मां ने भरपेट खाना खाया था। 

 और आज वह दादी को खीर खिला कर आई थी। बाहर उसकी सास पार्वती अपने ससुर जी का श्राद्ध धूमधाम से कर रही थी और अंदर सास एक एक चीज के लिए तरस रही थी। 

मायरा सोच रही थी कि यह सासू मां का कैसा व्यवहार है। लोगों की दृष्टि में अच्छा बनने के लिए अपने ससुर जी का श्राद्ध धूमधाम से कर रही है। दूर-दूर से रिश्तेदारों को भोजन के लिए बुलाया है और अंदर अपनी जीवित सास को मामूली सी खीर और पूरी के लिए तरसा  रखा है। तब उसने रजत और पापा जी से बात की। 

 उन्होंने कहा-“मायरा, जो तुम्हें ठीक लगे वही करो, हम तुम्हारे साथ हैं। ” 

 एक दिन मायरा फोन पर किसी से बात कर रही थी। उसकी सास पार्वती छुप कर सब कुछ सुन रही थी। 

 मायरा-” हां क्या बताऊं यार, बुढ़िया बहुत ही चटोरी है, कल अपनी सहेली के साथ गोलगप्पे और पाव भाजी खा कर आई है, हां हां सही कह रही है तू। ” 

 पार्वती जोर से चिल्लाई-“मायरा, यह क्या तरीका है बात करने का, तुम मुझे बुढ़िया कह रही हो और चटोरी भी। ” 

मायरा-” मम्मी जी, मैं आपके लिए नहीं बोला था और क्या आप मेरी बातें छिपकर सुन रही थी, बैड मैनर्स, मैं तो रजत को जरूर बताऊंगी और यह भी बताऊंगी कि आप जब अपनी सहेली से बात करती हो तो दादी मां को बुढ़िया कह कर पुकारती हो। ” 

 पार्वती-” अरे नहीं बेटा, मैं तो यहां से निकल रही थी तो आवाज कान में पड़ गई। ” 

मायरा-” वैसे आपको बुरा क्यों लगा, क्या आपने सचमुच गोलगप्पे खाए थे, मैं आपके लिए नहीं कहा था। बल्कि एक दिन आप ही कह रही थी कि कितनी चटोरी है बुढ़िया, बुढ़ापे में इसे खाने को खीर चाहिए। वैसे मम्मी जी बुढ़ापा तो सबको आता है ना। ” 

 और सच में मायरा किसी से भी बात नहीं कर रही थी। वह तो बंद फोन में जानबूझकर बोल रही थी ताकि पार्वती सुन सके। 

 पार्वती के पति ने उसे एक बार समझाया भी था कि तुम जिस सहेली की बातों में आकर मेरी मां का अपमान कर रही हो वह तुम्हारी सहेली सही औरत नहीं है क्योंकि वह अपनी सास को वृद्ध आश्रम छोड़कर आई है। 

 एक बार पार्वती किसी रिश्तेदार की शादी में अपने पति के साथ शहर से बाहर गई और दो दिन बाद जब वापस आई तो आंगन में खुदाई हो रही थी। 

 वह काम करने वाले मजदूरों पर चिल्लाई-” बंद करो, यह तुम किस से पूछ कर कर रहे हो और क्यों? ” 

मायरा-” मम्मी जी, अपने काम क्यों रुकवा दिया, पता है आजकल इन लोगों की दिहाड़ी बहुत ज्यादा है। ” 

 पार्वती-” बहू,यह क्या नाटक है, यह क्या हो रहा है यहां और वह भी मुझसे बिना पूछे। ” 

मायरा-” मम्मी जी,फ्यूचर की प्लानिंग, भविष्य की तैयारी ” 

 पार्वती-” किसका भविष्य और कैसी तैयारी? ” 

मायरा-” मम्मी जी आपने, इस घर में अपनी सास की जगह ले ली और घर को अच्छे से संभाल लिया। शादी में जाने से पहले आपने कहा था कि अब आप जल्दी थक जाती हैं और घुटनों में भी दर्द रहता है। तो अब आपकी जगह घर मुझे संभालना होगा और मैं आपके लिए आंगन में कमरा बनवा रही हूं। लेकिन आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए, मैं कंजूस नहीं हूं। दादी जी की तरह आपका कमरा छोटा नहीं होगा। बड़ा कमरा विद अटैच बाथरूम एंड कूलर आल्सो। आप कहोगी तो रसोई भी बनवा दूंगी। अपना मनपसंद बनाओ और खाओ। दादी की तरह ना तो आपको बार-बार खिचड़ी खानी पड़ेगी और ना ही खीर के लिए तरसना पड़ेगा।” 

 चलो भाई लोगों काम शुरू करो और काम शुरू हो गया। 

 पार्वती यह सुनकर परेशान हो गई थी। उसे नींद नहीं आ रही थी। कभी इस करवट कभी उस करवट। कभी अपने आंसू पोछ रही थी। उसके पति सब कुछ नोटिस कर रहे थे। उन्होंने इसका हाल सुबह बहू मायरा को बताया। 

 थोड़ी देर बाद पार्वती बहू के कमरे में गई तो वह वहां पर नहीं थी। तब पार्वती अपनी सास के कमरे की तरफ गई, मायरा वहीं बैठी हुई दिखी। उसने कमरे के बाहर खड़े रहकर सुना-” उसकी  सास, मायरा से कह रही थी -” मायरा, अब बस कर बेटा, पार्वती बुरे दिल की नहीं है, लगता है किसी की बातों में आ गई है, वह एक अच्छी बहू है। उसे और परेशान मत कर बेटी। ” 

मायरा-” मुझे पता है दादी, उनकी अच्छाई कहीं छुप गई है, वही तो वापस लानी है। ” 

 तभी पार्वती अपनी सास के चरणों में गिर पड़ी। ” मुझे माफ कर दो मां जी, मैं आपका कितना दिल दुखाया, आपके साथ बहुत गलत किया, मेरे गलत करने पर भी आपने मेरी बहू से कहा कि मैं अच्छी हूं उसे परेशान मत कर। मायरा, तू भी मुझे माफ कर दे, मैं सचमुच भूल गई थी कि बुढ़ापा तो सबको आता है और एक दिन मुझे भी आएगा। जो व्यवहार में अपनी सास के साथ करूंगी हो सकता है कि वही व्यवहार मेरी बहू मेरे साथ करें। ” 

मायरा ने हंसकर कहा -” मां की, यह तो गलत बात है आपने फिर हमारी बातें छुपकर सुन ली। ” 

 पार्वती रोते-रोते हंसने लगी और साथ में दादी जी भी हंसने लगी। मायरा और पार्वती ने, दादी जी का हाथ पकड़ा और उन्हें अपने घर के, अपने कमरे में पहुंचा दिया। 

 एक मकान, अब फिर से घर बन गया था। 

 अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली 

# बुढ़ापा तो सबको आता है

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