“ देखो अपने लाड़ले पर जरा लगाम कसो… नहीं तो कल को मेरे हाथों कुछ हो जाएगा तो फिर मुझे दोष मत देना… जाने कितने मन्नतों के बाद हमारे घर ये बेटा पैदा हुआ पर हमारी क़िस्मत पर बट्टा लगाने में लगा है ।” महावीर सिंह ग़ुस्से में बोले जा रहे थे उधर कमरे के कोने में मुँह में साड़ी का पल्लू दबाएँ रमा अपनी सिसकियाँ रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी पर बेटे के लिए पति के बोल किरचों की तरह चुभ रहे थे
महावीर सिंह चार भाई सबके घर बेटियाँ आई शुरू में सबने लक्ष्मी कह कर स्वागत किया पर महावीर सिंह की माँ कहती रहती भगवान एक तो पोते का मुँह दिखा दे…. महावीर सिंह सबसे बड़े और उनसे छोटे तीन भाई सब माता-पिता बन गए पर महावीर सिंह कई सालों तक इस इंतज़ार में बैठे रहे कि माता रानी उन्हें भी पिता बनने का सुख ज़रूर देंगी ।
शादी के बारहवें साल में रमा गर्भवती हुई बहुत ख़्याल रखा गया इतने समय बाद वो माँ बन रही थी और सब कुछ ईश्वर के चमत्कार जैसा लग रहा था समय पर प्रसव हुआ और वो किशन के माता-पिता बन गए…. पोते को देख महावीर सिंह की माँ फूली ना समाई … घर में सब बहनों के बीच अकेला भाई…. आँखों का तारा बना रहता सब उसपर जान छिड़कती थी ।
किशन अपनी बहनों को देख कर बड़ा हो रहा था बहने कभी कभी उसे फ़्रॉक पहना कर लड़की जैसे तैयार करती तो किशन बहुत खुश होता कभी कभी तो वो माँ से ज़िद्द भी करता रमा उसे बचपना समझ नज़रअंदाज़ कर देती पर किशन ज्यों ज्यों बड़ा हो रहा था उसके रंगढंग लड़कियों जैसे होने लगे थे ये सब देख कर रमा डर जाती और उसे समझाने की कोशिश करती पर किशन हमेशा कहता मुझे ऐसे ही रहना।
कॉलेज में आने के बाद उसकी दोस्ती एक लड़के से हो गई जिसके साथ ही वो हमेशा नज़र आता… लड़के से दोस्ती तो ठीक थी पर आज जो कुछ कॉलेज में हुआ उसकी चर्चा उसके घर तक पहुँच गई जिस वजह से महावीर सिंह बहुत ग़ुस्से में थे।
कॉलेज में वैलेण्टाइन डे की धूम मची थी … लड़के लड़कियाँ अपने अपने प्यार का इज़हार कर रहे थे कि अचानक किशन ने अपने दोस्त को फूल देते हुए प्रपोज़ करते हुए एक गहरा चुंबन ले लिया ये दृश्य देख सब हक्के बक्के रह गए… किशन वैसे ही लड़कों के रहन सहन में अलग दिखता था पर उसे किसी की टिप्पणी का कोई असर नहीं होता था पर आज बात हद से ज़्यादा बढ़ गई जिसके लिए महावीर सिंह गरम हो रखे थे।
किशन जब घर आया रमा उसे पकड़ कर कमरे में ले गई और पूछताछ करने लगी किशन ने हामी भरते हुए कहा,” माँ मैं नहीं जानता ये सब कैसे कब क्या पर मैं अपने ही शरीर में असहज महसूस करता हूँ मुझे लड़कियों की तरह रहना पसंद है अगर आप लोगों को लगता है मैं बट्टा लगा रहा हूँ तो मैं कहीं दूर चला जाऊँगा पर मैं जैसा हूँ उसमें खुश रहना चाहता हूँ कम से कम आप तो समझो।”
रमा लाख समझाने की कोशिश की पर किशन ने अपने आपको जैसा था वैसे ही स्वीकार कर घर छोड़कर चला गया… बट्टा तो वैसे भी लग चुका था अब उसके जाने से क्या ही फ़र्क़ पड़ता।
रमा रोती रह गई पर कहीं कोने में ममता उमड़ कर यही कह रही थी बेटा इस जग में तेरे जैसे लोगों को स्वीकार करने का सामर्थ्य नहीं आया है शायद मैं वो हिम्मत कर सकूँ पर वक़्त लगेगा ।
कहानी पर आपके विचारों का स्वागत है..।
धन्यवाद
रश्मि प्रकाश
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