प्राची बहुत खुश थी कि आज वो अपने पति रवि के साथ अकेले ही पिकनिक पर जाने वाली थी,संयुक्त
परिवार में कभी कोई कभी कोई संग जाता ही था और प्राची कुछ पल अकेले होने को तरसती।
वो निकल ही रहे थे कि प्राची की विधवा ननद शांति ने कहा..भाभी!लौटते वक्त मेरे लिए ये मेडिसिन लेते
आना,कल सुबह की बीपी की दवाई खत्म हो रही है इसलिए याद दिलाया नहीं तो…
वो प्राची का बना मुंह देखकर समझ गई थी कि उसे शायद उन्हें नहीं टोकना चाहिए था,प्राची को बुरा लगा है।
रवि ने कहा…बिल्कुल दीदी,हम जरूर लाएंगे ,आप इतना कांशियस क्यों हो रही हैं?
प्राची का मुंह अभी भी बना हुआ था।
रवि ने बाहर निकलते ही कहा…शांति दीदी तुम्हारी आंखों में इतना खटकती क्यों हैं?देख रहा हूं कि तुम
सामान्य मैनर्स भी नहीं रख पाती हो आजकल…क्या वो हमसे जरूरी दवाई भी न मंगवाएं?
नहीं रवि..वो बात नहीं लेकिन ऐसे किसी को घर से निकलते टोकना अच्छी बात नहीं होती,वो तो उम्र,अनुभव
में भी बड़ी हैं,समझ होनी चाहिए उन्हें।
तुम भी बात का बतंगड़ बनाने में माहिर हो…रवि झुंझला रहा था प्राची पर उसकी संकीर्ण सोच के लिए,उसने
कहा…दवाई हम पहले ही ले लेते हैं, रास्ते में दुकान पड़ेगी,पिकनिक पर बाद में जाएंगे।
लेकिन पहली बस निकल जाएगी,फिर भीड़ भी ज्यादा हो जाएगी रवि…पहले चलते हैं,दवाई शाम को ले लेंगे।
प्लीज सॉरी!
रवि को गुस्सा चढ़ चुका था,वो जिद पर अड़ गया और पहले दवाई लेने चल दिया।प्राची पछता रही थी अपनी
गलती पर कि उसने रवि का मूड ऑफ कर दिया खामख्वाह।
जब वो बस स्टैंड लौट के आए तो पता चला कि जो बस अभी पिकनिक स्पॉट के लिए निकली थी उसका
भीषण एक्सीडेंट हो गया रास्ते में,लोगों को बहुत चोटें आई हैं,काफी हाहाकार मचा था हर तरफ।
रवि ने प्राची को देखा कि कुछ समझ आया या नहीं…जो शांति दीदी सुबह शाम तुम्हारी आंखों में खटकती हैं
,आज उनकी वजह से तुम्हारे प्राण बच सके हैं,अब तो समझोगी कि जो होता है वो भलाई के लिए होता
है,परिवार के लोग सब आपके हित के लिए ही होते हैं,उनसे छोटी छोटी बातों पर वैर रखना,मन मैला करना
अच्छी बात नहीं होता।दीदी तो आज से हमारा लकी चार्म बन गई हैं।
प्राची की आँखें शर्म से झुक गई,सही कहते हो तुम,आज के बाद मैं फिर इस ओछी सोच को खुद पर हावी
नहीं होने दूंगी और दीदी के इस एहसान को हमेशा याद रखूंगी।
डॉक्टर संगीता अग्रवाल
वैशाली
#आंखों में खटकना