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ड्रेसिंग टेबल की सारी दराजें, कई कई बार छान चुकी,कबर्ड देख डाला । टेबल के नीचे ,हाथ घूँसा घुँसाकर , झाड़ू से कबर्ड के नीचे घुमाकर देख लिया, पर दिखाई नहीं दी…
आज ही नहीं मिलनी थी !
जिस दिन ज़रूरी हो, बस उसी दिन, बल्कि उसी समय,कभी न मिलती चीज़ें और जब काम न हो खटकती रहेंगी आँखों में।
झुँझला सी गयी थी मैं उसे ख़ोज ख़ोज कर।
काम वाली बाई ने झाडू पोछा लगाते समय कहीं उठाकर तो नहीं ले गयी घर अपने ?
नही नही ! वो क्यों लेकर जायेगी।
“बेचारी काम कर करके ही कमर तोड़ें जा रही है अपनीं “
कहाँ फ़ुर्सत है उसे सजने धजने की…
बेटियां भी, घर पर नहीं है। एक फ्रेन्च क्लास तो दूसरी डांस क्लास। पूछूँ भी तो कैसे ?
वैसे तो ,कभी मेरी ड्रेसिंग टेबल के इर्द गिर्द उन्हें फटकते न देखा। फिर भी ,क्या भरोसा ,जाने कब मन में सजने संवरने की ललक जाग उठे…
मैं भी जब उनकी उम्र की थी तो क्रीम ,पावडर,काज़ल और भी जाने क्या क्या ढूंढा करती थी ।
माँ को तो सादगी पसन्द थी। कभी सज़ते संवरते नहीं देखा । पर हाँ ! माथे पर एक बड़ी लाल बिन्दी जरूर लगाती थी , जिससे उनका चेहरा हरदम दमकता रहता और माँग में सिन्दूर भी ।कैसे जमा जमाकर ऊपर तक भर देती थीं …
और मैं अक़्सर ही कहा करती,
” माँ , मेरी सहेलियों की माँओं को देखो ,कैसे बढ़िया से तैयार होती हैं। खूब तरह तरह के श्रृंगार करती हैं।”
बड़ा सारा मेकअप का सामान होता है उनके यहाँ और एक तुम हो माँ, जो एक ‘लिपस्टिक’ तक नहीं ला सकती,बोलो !
‘लिपस्टिक’ लेने में क्या है, पर जब लगानी ही नहीं तो क्यों ख़रीदा जाये…. ।
“क्यों नहीं ,लगानी है माँ “
मुझे बिलकुल भी ,पसंद नहीं है न मेरी गुड़िया। स्नेह से माँ मेरी ठोड़ी पकड़कर कहती।
पर मैं उनका जवाब सुन उदास हो जाती। मन आशंकित हो जाता , हमारे घर शायद ! कभी ‘लिपस्टिक’ आये ही ना।
माँ , मेरी उदासी का कारण समझ जाती । फिर बड़े प्यार से समझाते हुए कहती,
” मेरी गुड़िया रानी के, ये जो प्यारे से ,नाज़ुक गुलाबी होंठ हैं न, लिपिस्टिक लगाने से काले हो जायेंगे “
“सब तो लगाते है न माँ “
मैं ज़िद करती । मेरी ज़िद देख,
“अच्छा जब बड़ी हो जाओगी, तब लगा लेना”…अब तो ख़ुश !!
माँ के दिए तर्क कभी भी पसन्द न आते और मन में “लिपस्टिक” की चाह भी कम ना होती…
एक बार स्कूल में नृत्य नाटिका में भाग लिया, घर से तैयार होकर जाना था। माँ ने अपनी शादी की लाल बनारसी साड़ी मुझे पहना दी। फिर बालों की चोटी गूँथकर, रजनीगंधा के फूलों की वेणि से उसे सज़ा दिया…
आईना देख ,मैं रोआंसी सी हो गयी,
” क्या बिना ‘लिपस्टिक’ के भी सुन्दर दिखा जा सकता है माँ “
मेरी आँखों में भर आये आँसू को देख ,माँ ने झट सिन्दूर को हल्का सा मेरे होंठ में लगाकर उनकी रंगत बढ़ा दी,आईने में अपनीं सुंदर छवि देख मैं ख़ुश हो गयी…
समय बीतता गया और उसके साथ ही शौक भी बदलते रहे ।
बड़े होते होते मैं कब माँ जैसी ही होती चली गयी , पता ही न चला….।
कभी सजने सँवरने का मन ही न करता। विवाह के दिन भी दुल्हन बनी तो सिर्फ माथे में बड़ी सी बिन्दी लगाने का मन हुआ….
सखि सहेलियाँ नहीं मानी, फिर हल्का सा मेकअप कर ही दिया।
पतिदेव को भी सादगी ही पसन्द थी। सो कभी कोई नुक्स न निकाला।
इनके फ्रेंड सर्कल में सबकी बीबियों को बडा सज़ते धजते देख लगता, कभी कभार कुछ तो कर ही लेना चाहिए । इतनी भी क्या सादगी और फिर बरसों पहले की मन में दबी हुई लिपस्टिक की चाह अचानक हिलोरें मारने लगी….
एक दिन ‘लिपिस्टिक’ लेने बाजार पहुँच ही गयी…सोचा भी न था, कई सारे ब्रांड्स और कलर्स शेड्स देखने को मिलेंगे…!
हे भगवान !,बड़ा मुश्किल है इनमें से किसी एक लिपिस्टिक का चुनाव करना…सोचती रही।
लगा जैसे वे सभी लिपस्टिक भी बड़ी उम्मींद लगाये मुझे एकटक घूरी जा रहीं हैं।
जाने किसकी क़िस्मत चमक जाएँ आज, सोंच रहीं हो जैसे…..।
बड़ी मुश्किल से, लाल सुर्ख सी लिपिस्टिक जाने कैसे मन को भा गयी और ले आयी मैं। जब कभी कोई आयोजन होता तो कभी हल्का तो कभी गहरा , दिन रात का वक़्त देख रंग देती होंठो को ।
और आज भी इनके फ़्रेंड की शादी की सालगिरह की पार्टी है जिसके लिए तैयार होना है और वो है कि मिल ना रही…
पतिदेव की पुकार सुन, हाँ जी ,बस दो मिनट में आयी… कहकर ,सिंदूर को ही हल्का सा होंठो पर लगा लिया , लो बढ़ गयी रंगत होठों की…।
आज फिर से, माँ का फ़ार्मूला अपना लिया…
“तुम भी न माँ…किस क़दर रची बसी हो मेरे जीवन में…”
मुस्कुराती हुई ड्रॉइंग रूम पहुँची तो देखते ही पतिदेव ने कहा,
“बड़ी प्यारी लग लग रही हो”
उनकी बात पर यक़ीन न हुआ हो जैसे । फिर से तसल्ली करने के लिए पूछ बैठी,
“सच कह रहे हो”
हाँ,सौ फ़ीसदी सच, तुम्हारी निच्छल हँसी और सौम्य मुस्कुराहट के सामने सब कुछ फ़ीका है.।
सच कह रहा हूँ ।
सुनकर ,मेरे होठों पर डेढ़ इंच मुस्कान गहरा गयी….
—सपना शिवाले सोलंकी