लहू के रंग

 इतना सुनते ही दीनदयाल का पत्थर सा दिखने वाला चेहरा पिघलने लगा। उसकी आँखों के किनारे भीग गए। उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से अपनी आँखें पोंछीं और रुंधे हुए गले से बोला, “आपने सब सच पता कर लिया वकील साहब। हाँ, मेरा भाई बहुत बड़ा आदमी है। उसके पास आज गाड़ियां हैं, नौकर-चाकर हैं, बड़ा रुतबा है। और मैं… मैं बस नुक्कड़ पर एक गैरेज में गाड़ियाँ सुधारता हूँ।”

मैंने उससे पूछा, “दीनदयाल जी, जब आपके माता-पिता गुज़रे, तब आप पंद्रह साल के थे, और आपका भाई समीर सिर्फ पांच साल का। क्या ये सच है कि आपने उसकी परवरिश के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी?”

मेरा नाम विक्रम है। मैं शहर के एक प्रतिष्ठित इलाके में वकालत करता हूँ। मेरे केबिन में हमेशा एक शांत और गंभीर माहौल रहता है, जहाँ सिर्फ वातानुकूलन (एसी) की हल्की गुनगुनाहट और पन्नों के पलटने की आवाज़ गूंजती है। उस दिन दोपहर का समय था। मैं एक बहुत ही जटिल केस की फाइल का अध्ययन कर रहा था। तभी मेरे चेंबर का भारी लकड़ी का दरवाज़ा अचानक खुला। बिना किसी अपॉइंटमेंट, बिना किसी पूर्व सूचना के एक आदमी अंदर चला आया।

उसके चेहरे पर गहरी झुर्रियां थीं, जो उम्र से ज़्यादा तज़ुर्बे और धूप की मार से बनी लग रही थीं। उसके बाल बिखरे हुए थे, दाढ़ी कई दिनों से बढ़ी हुई थी और आँखों में एक अजीब सी बेचैनी तैर रही थी। उसने जो कपड़े पहने थे, वे कभी सफेद रहे होंगे, लेकिन अब उन पर ग्रीस, पसीने और मिट्टी के गहरे दाग थे। उसके पांयचों पर कीचड़ के सूखे हुए निशान साफ नज़र आ रहे थे। उसके खुरदरे और कांपते हाथों में पुराने और पीले पड़ चुके कागज़ों का एक मोटा बंडल था।

वह सीधे मेरी मेज़ के सामने आकर खड़ा हो गया और बिना किसी भूमिका के बोला, “वकील साहब, मुझे उस पूरे बंगले पर स्टे (रोक) लगाना है। उसे बिकने से रोकना है। बताइए, इसके लिए और क्या कागज़ चाहिए? खर्चा कितना भी हो, मैं पाई-पाई चुका दूंगा, बस आप उस बंगले पर स्टे लगवा दीजिए।”

उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हताशा और ज़िद थी। मैंने उसे शांत कराने के लिए कहा, “आप पहले बैठ जाइए।” मैंने अपने चपरासी को आवाज़ लगाई, “रमेश, ज़रा एक गिलास ठंडा पानी लाना।”

वह आदमी संकोच के साथ मेरे सामने वाली मखमली कुर्सी के किनारे पर टिक कर बैठ गया। उसने पानी का गिलास एक ही सांस में खाली कर दिया। मैंने उससे कागज़ मांगे। उसने बड़ी सावधानी से वह बंडल मेरी मेज़ पर रख दिया। मैंने कागज़ पलटने शुरू किए। वे एक पुश्तैनी ज़मीन और शहर के एक पॉश इलाके में बने एक आलीशान बंगले के दस्तावेज़ थे। मैंने उससे उसकी सारी जानकारी ली। उसका नाम दीनदयाल था। लगभग पौन घंटे तक मैं उससे पूछताछ करता रहा। वह हर सवाल का जवाब बहुत ही संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट रूप से दे रहा था।

कागज़ों की स्थिति और मामले की गंभीरता को देखते हुए मैंने उससे कहा, “दीनदयाल जी, मैं इन सारे कागज़ों को तसल्ली से देख लेता हूँ। फिर आपके केस पर विचार करेंगे। आप ऐसा कीजिए, अगले शनिवार को इसी समय मुझसे मिलने आइए।”

दीनदयाल बिना कुछ कहे, हाथ जोड़कर वहां से चला गया। उस पूरे हफ्ते मैंने उसके केस की गहराई से जांच की। मैंने अपने कुछ सूत्रों से दीनदयाल और उस बंगले के असली मालिक के बारे में जानकारी निकलवाई। जो सच मेरे सामने आया, उसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया।

चार दिन बाद, शनिवार को, दीनदयाल फिर मेरे ऑफिस में आया। इस बार भी उसके कपड़े वैसे ही थे—धूल और पसीने में सने हुए। वह बहुत ज़्यादा बेचैन और निराश लग रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब सा गुस्सा और दर्द था, जो सीधे उसके भाई के लिए था।

मैंने उसे बैठने का इशारा किया। वह चुपचाप बैठ गया। मेरे ऑफिस में उस समय एक अजीब सी खामोशी गूंज रही थी, जिसे तोड़ना मुझे बहुत भारी लग रहा था। मैंने गहरी सांस ली और बात की शुरुआत की।

“दीनदयाल जी, मैंने आपके सारे पेपर्स देख लिए हैं। और आपके परिवार, आपकी पृष्ठभूमि और आपकी निजी ज़िंदगी के बारे में भी मैंने काफी जानकारी हासिल की है।”

दीनदयाल ने अपनी नज़रें उठाईं और मेरी आँखों में देखने लगा।

मैंने आगे कहा, “मेरी जानकारी के अनुसार, आप दो भाई हैं। आपकी कोई बहन नहीं है। आपके माता-पिता का साया आपके सिर से तब उठ गया था, जब आप खुद महज़ पंद्रह साल के थे। आप केवल आठवीं पास हैं और आपका छोटा भाई, समीर, एक बहुत बड़ा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट है।”

इतना सुनते ही दीनदयाल का पत्थर सा दिखने वाला चेहरा पिघलने लगा। उसकी आँखों के किनारे भीग गए। उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से अपनी आँखें पोंछीं और रुंधे हुए गले से बोला, “आपने सब सच पता कर लिया वकील साहब। हाँ, मेरा भाई बहुत बड़ा आदमी है। उसके पास आज गाड़ियां हैं, नौकर-चाकर हैं, बड़ा रुतबा है। और मैं… मैं बस नुक्कड़ पर एक गैरेज में गाड़ियाँ सुधारता हूँ।”

मैंने उससे पूछा, “दीनदयाल जी, जब आपके माता-पिता गुज़रे, तब आप पंद्रह साल के थे, और आपका भाई समीर सिर्फ पांच साल का। क्या ये सच है कि आपने उसकी परवरिश के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी?”

यह सवाल जैसे किसी पुराने रिसते हुए घाव पर नमक की तरह लगा। दीनदयाल फफक कर रो पड़ा। उसने अपने आंसुओं को रोकते हुए जो कहानी सुनाई, वह किसी भी इंसान का कलेजा चीर देने के लिए काफी थी।

“वकील साहब,” दीनदयाल ने कहना शुरू किया, “जब बाबूजी और माँ एक बस दुर्घटना में गुज़रे, तो हमारे सिर पर आसमान टूट पड़ा था। रिश्तेदारों ने मुँह फेर लिया। मेरे छोटे भाई समीर को तो ये भी नहीं पता था कि मौत क्या होती है। वह माँ के शव के पास बैठकर ज़िद कर रहा था कि माँ को कहो उसे दूध पिलाएं। उस दिन मैंने कसम खाई थी कि मैं समीर को कभी अनाथ होने का एहसास नहीं होने दूंगा।”

दीनदयाल ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। उसने पहले एक ढाबे पर बर्तन मांजने का काम किया, फिर एक चाय की थड़ी लगाई और अंततः एक गैरेज में मैकेनिक बन गया। उसने अपनी जवानी के दिन, अपने शौक, अपनी छुट्टियां सब उस गैरेज की कालिख और ग्रीस में झोंक दीं। वह खुद फटे कपड़े पहनता, आधी रोटी खाता, लेकिन समीर को हमेशा शहर के सबसे अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेजा।

“मुझे पढ़ाई का कोई शौक नहीं था साहब, ऐसा नहीं है। लेकिन जब मैं समीर को साफ-सुथरी यूनिफॉर्म में स्कूल जाते देखता था, तो मुझे लगता था जैसे मैं खुद स्कूल जा रहा हूँ। मैंने उसकी हर ज़िद पूरी की। उसे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला दिलाने के लिए मैंने गैरेज में रात-रात भर ओवरटाइम किया। जब उसके दोस्त शहर से बाहर ट्रिप पर जाते, तो मैं अपनी खून-पसीने की कमाई निकालकर उसे देता, ताकि उसे दोस्तों के सामने शर्मिंदा न होना पड़े।”

समीर पढ़ाई में होशियार था। उसने अच्छे नंबरों से इंजीनियरिंग पास की और उसे शहर की सबसे बड़ी आईटी कंपनी में नौकरी मिल गई। दीनदयाल की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसे लगा जैसे उसकी ज़िंदगी की सारी तपस्या सफल हो गई। लेकिन उसे नहीं पता था कि सफलता की सीढ़ियां चढ़ते ही इंसान अक्सर उस सीढ़ी को भूल जाता है जिसने उसे सहारा दिया था।

समीर को एक रसूखदार परिवार की लड़की, रिया से प्यार हो गया। रिया बहुत ही आधुनिक ख्यालों वाली लड़की थी, जिसके लिए स्टेटस और पैसा ही सब कुछ था। जब समीर ने रिया से शादी की, तो दीनदयाल ने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी उस शादी में लगा दी। लेकिन उस शादी में दीनदयाल की हैसियत एक बड़े भाई की नहीं, बल्कि एक काम करने वाले नौकर जैसी रह गई थी। समीर ने अपने हाई-सोसाइटी दोस्तों और रिया के परिवार के सामने दीनदयाल को अपना भाई बताने से भी संकोच किया। उसने उन्हें बताया कि दीनदयाल उनके दूर के एक गरीब रिश्तेदार हैं जो बचपन से उनके साथ रहते हैं।

यह बात दीनदयाल के दिल में तीर की तरह चुभी थी, लेकिन उसने समीर की खुशी के लिए इसे भी बर्दाश्त कर लिया।

शादी के कुछ महीनों बाद ही रिया को उस छोटे से पुश्तैनी मकान और दीनदयाल के रहन-सहन से घुटन होने लगी। समीर ने एक दिन दीनदयाल से कहा कि वह और रिया एक अलग फ्लैट में शिफ्ट हो रहे हैं। दीनदयाल ने मुस्कुराकर उन्हें विदा किया और उसी पुराने घर में अकेला रहने लगा। समीर का आना-जाना कम होता गया। महीने में एक बार फोन आ जाता, वह भी सिर्फ औपचारिकता के लिए।

“तो फिर अब बात इस प्रॉपर्टी के स्टे तक कैसे पहुँच गई?” मैंने मामले की तह तक जाने के लिए पूछा।

दीनदयाल की आँखों में एक भयानक ज्वाला धधक उठी। “धोखा दिया है उसने मुझे, वकील साहब! उसने अपनी ही माँ की निशानी, उस पुश्तैनी ज़मीन को मुझसे धोखे से छीन लिया।”

दीनदयाल ने बताया कि कुछ महीने पहले समीर उसके पास आया था। वह बहुत परेशान लग रहा था। उसने कहा कि वह एक नई कंपनी शुरू करना चाहता है, जिसके लिए उसे बैंक से एक बड़ा लोन चाहिए। लोन पास कराने के लिए उसे गारंटी के तौर पर पुश्तैनी ज़मीन के कागज़ों पर दीनदयाल के हस्ताक्षर चाहिए थे। दीनदयाल ने बिना सोचे-समझे, बिना कागज़ पढ़े, अपने छोटे भाई पर आँख मूंदकर विश्वास करते हुए हर उस जगह अंगूठा और दस्तखत कर दिए, जहाँ समीर ने कहा।

“मैंने सोचा, मेरे भाई की तरक्की हो रही है, इसमें मेरा क्या नुकसान है! लेकिन वकील साहब, उस गद्दार ने लोन के कागज़ नहीं, बल्कि प्रॉपर्टी ट्रांसफर के कागज़ों पर मेरे दस्तखत करवाए थे। उसने वह पुश्तैनी ज़मीन बिल्डर को बेच दी। मुझे तब पता चला जब दो दिन पहले बिल्डर के आदमी उस घर को तोड़ने आ गए। उस घर में मेरी माँ की यादें थीं, बाबूजी के हाथ का लगाया हुआ आम का पेड़ था। उस घर के एक-एक कोने में मैंने समीर को पाल-पोस कर बड़ा किया था। उसने वह सब बेच दिया, और उस पैसे से शहर के इस पॉश इलाके में करोड़ों का ये नया बंगला खरीदा है।”

दीनदयाल का शरीर गुस्से और हताशा से कांप रहा था। वह कुर्सी से उठा और मेज़ पर मुक्का मारते हुए बोला, “मुझे पैसा नहीं चाहिए वकील साहब! मैं आज भी गैरेज में काम करके अपना पेट पाल सकता हूँ। लेकिन मुझे उसका वह नया बंगला किसी भी कीमत पर बिकने से रोकना है। मैं उसे चैन से नहीं जीने दूंगा। उसने मेरे भरोसे का कत्ल किया है।”

मैं एक वकील के तौर पर रोज़ दर्जनों मामले देखता था, लेकिन इस केस ने मुझे झकझोर दिया था। मैंने दीनदयाल को न्याय दिलाने का फैसला किया। हमने कोर्ट में अर्ज़ी लगाई और समीर के बंगले पर स्टे के लिए एक मज़बूत नोटिस तैयार किया।

जब समीर को कानूनी नोटिस मिला, तो उसकी रातों की नींद उड़ गई। वह अगले ही दिन अपने दो महंगे वकीलों के साथ मेरे चेंबर में आ धमका। समीर ने बेहतरीन सूट पहना हुआ था और उसके चेहरे पर एक अजीब सा अहंकार और झुंझलाहट थी।

“ये सब क्या बकवास है, मिस्टर विक्रम?” समीर ने मेरे सामने बैठते ही कहा। “मेरे भाई का दिमाग खराब हो गया है। मैं उसे दस-पंद्रह लाख रुपये देने को तैयार हूँ, आप उसे समझाइए कि ये केस वापस ले ले। वह पुश्तैनी ज़मीन किसी काम की नहीं थी, मैंने उसे बेचकर एक स्मार्ट इन्वेस्टमेंट किया है।”

तभी केबिन का दरवाज़ा खुला और दीनदयाल अंदर आ गया। अपने छोटे भाई को देखकर वह एक पल के लिए ठिठका, लेकिन फिर उसकी आँखों में वही कठोरता आ गई।

समीर ने दीनदयाल को देखते ही अपनी जेब से एक चेकबुक निकाली और दस लाख का चेक साइन करके उसकी तरफ फेंक दिया। “भैया, ये लो दस लाख। अपने उस सड़े हुए गैरेज को छोड़कर कोई अच्छी दुकान खोल लेना। और ये केस-वेस का ड्रामा बंद करो। मेरे पास तुम्हारी इन फालतू बातों के लिए समय नहीं है।”

चेक ज़मीन पर गिर गया। केबिन में गहरी शांति छा गई। मुझे लगा कि दीनदयाल अभी फट पड़ेगा, या शायद पैसे देखकर पिघल जाएगा। लेकिन दीनदयाल ने जो किया, उसने समीर के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया।

दीनदयाल ने बहुत शांति से वह चेक उठाया और उसे फाड़कर समीर के मुंह पर फेंक दिया।

“मुझे तेरा पैसा नहीं चाहिए, समीर,” दीनदयाल की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। “मैं तो यहाँ इसलिए आया था ताकि तुझे एहसास दिला सकूँ कि तूने क्या खोया है। तूने वो ज़मीन नहीं बेची, तूने अपना वो पिता बेच दिया जिसने अपने पेट पर पट्टी बांधकर तुझे पिज़्ज़ा खिलाया था। तूने अपनी वो माँ बेच दी जिसने अपनी जवानी के शौक मारकर तुझे कॉन्वेंट में पढ़ाया था। तूने आज मुझे बता दिया कि मैंने एक इंसान नहीं, एक लालची जानवर पाला था।”

समीर का चेहरा फक पड़ गया। उसे ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी।

दीनदयाल मेरी तरफ मुड़ा और हाथ जोड़कर बोला, “वकील साहब, मुझे केस वापस लेना है। मैं इसके बंगले पर स्टे नहीं लगाना चाहता।”

मैं हैरान रह गया। “लेकिन दीनदयाल जी, हम केस जीत सकते हैं! आप ऐसे कैसे…”

“जीतकर क्या करूँगा साहब?” दीनदयाल ने मुझे बीच में ही टोक दिया। “जिस भाई के लिए मैंने अपनी ज़िंदगी हार दी, वो तो अंदर से मर चुका है। अब इस कागज़ के टुकड़ों के लिए मैं कोर्ट-कचहरी में उस इंसान से नहीं लड़ना चाहता, जिसे मैंने कभी अपने हाथों से चलना सिखाया था। इसे इसका बंगला मुबारक हो। लेकिन इसे यह कभी सुकून नहीं देगा।”

दीनदयाल ने मेज़ से अपने कागज़ उठाए और बिना समीर की तरफ देखे, चेंबर से बाहर निकल गया। समीर वहीं मूर्ति की तरह बैठा रह गया। उसकी आँखों में शर्मिंदगी थी या कुछ और, मैं नहीं जानता। लेकिन मैं यह जानता था कि दीनदयाल भले ही वह केस हार गया था, लेकिन वह एक इंसान के रूप में बहुत बड़ी जीत हासिल करके बाहर गया था। वह आज भी उस गैरेज में काम करता है, पूरी ईमानदारी और स्वाभिमान के साथ, जबकि समीर अपने करोड़ों के बंगले में भी सुकून की नींद के लिए तरसता है।

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