क्या अकेली माँ कन्यादान नहीं कर सकती – रश्मि प्रकाश

सुहानी बेटा देख ये साड़ियां कैसी है? कहती हुई उसकी मॉं ने चार पांच साड़ियां उसके सामने फैला दी। एक-एक साड़ी को हाथ से सहलाते हुए मां की आंखों में उम्मीद भी थी और थकान भी। शादी घर में थी, कामों की लिस्ट खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी—कभी हलवाई को फोन, कभी मामा-मौसी को बुलावा, कभी पंडित जी की तारीख, तो कभी पड़ोस की औरतों के साथ बैठक। घर के कोने-कोने में तैयारियों की आवाजाही थी, पर सुहानी का मन कहीं और भटका हुआ था।

बेटा तुम्हारी शादी है और तुम ही मुंह फुलाकर बैठी हो? घर में सबकुछ मुझे ही देखना है ना बेटा तेरे भाई भी अभी छोटे हैं। तुम मदद नहीं करोगी तो मैं अकेले कैसे संभालूं? तुम्हारे पापा होते तो ये सब नहीं होता क्यों नहीं समझ रही।

मां की आवाज़ में शिकायत कम और मजबूरी ज्यादा थी। वह चाहती थी सुहानी उसके साथ खड़ी रहे—सिर्फ काम के लिए नहीं, मन के लिए भी। मगर सुहानी के चेहरे पर जो उदासी थी, वह साड़ियों से दूर, रस्मों से दूर—किसी एक सवाल पर अटकी हुई थी।

क्या समझूं मां आप ही बताओ ना? सब के मुंह से बस यही सुन रही हूं मेरा कन्यादान कौन करेगा? माँ जब पापा हमें छोड़कर गये हम चारों कितने छोटे थे। मुझे आज भी याद है जब मैं छोटी थी हास्टल में पढ़ती थी छुट्टियों में जब घर आई तब पता चला पापा का एक्सिडेंट हुआ और वो हमारे बीच नहीं रहे। हमारा ये दुःख कम नहीं था फिर भी लोगों के मुंह से दबी जुबान से सुनाई दिया अब सुहानी का क्या होगा ?कहाँ पढ़ेंगी ?

सुहानी की आंखों के आगे वही पुराना दृश्य तैर गया—घर के आंगन में रोना, मां के चेहरे पर सन्नाटा, भाइयों की सहमी आंखें और रिश्तेदारों की फुसफुसाहटें। पिता का जाना सिर्फ एक मृत्यु नहीं थी, वह पूरे घर पर एक साया था, जो हर खुशी में अपना हिस्सा मांगता था।

माँ तब तुमने और छोटे चाचा ने बोला जहां पढ़ती है वहीं पढ़ेंगी। ये उसके पापा का सपना है। फिर मां आज जब मेरी शादी होने वाली तुमने खुद खोज कर लड़का पसन्द किया सब कुछ तुम कर रही हो तो ये कन्यादान में क्या दिककत? मैंने सुना दादा जी नाना जी से बात कर रहे थे आप ही बताइए समधी जी सुहानी का कन्यादान कौन करेगा?

सुहानी के शब्दों में गुस्सा नहीं था—बस एक दर्द था। वह समझ नहीं पा रही थी कि जिस मां ने पिता के जाने के बाद सब संभाला, वही मां आज इस एक रस्म के सामने क्यों चुप हो जाती है? क्यों लोग ऐसी रस्म के नाम पर मां को पीछे धकेलने में लगे हैं?

घर में इतने सारे लोग हैं मां फिर भी सब चुप थे। दादा जी बोले बड़े चाचा से करवा दिया जाये? मां नाना जी पता क्या बोले आप जैसा उचित समझे करे समधी जी अब हम भी क्या बोले।

ये सुनकर सुहानी का दिल और भारी हो गया। उसे लगा, जैसे उसकी जिंदगी की सबसे अहम घड़ी में उसकी इच्छा की कोई कीमत नहीं। जैसे यह उसकी शादी नहीं, लोगों की परंपरा निभाने का मंच हो।

शादी की तैयारी पूरे जोर शोर से चल रही थी। सुहानी के पापा का सपना था इकलौती बेटी की शादी जब भी करूंगा धूमधाम से बस मां ने ये बात गांठ बांध ली और जितना कर सकती कर रही थी। तीन छोटे भाई भी बस ये सोच रहे थे पापा नहीं है तो लोग कोई बात न बनाएं शादी अच्छी तरह हो जाए। पर पेंच तो कन्यादान को लेकर अब भी अटका हुआ था।

भाइयों के चेहरे पर भी वही असमंजस था। वे बहन को खुश देखना चाहते थे, मां को टूटते नहीं देखना चाहते थे, और रिश्तेदारों के सामने “कमजोर” भी नहीं पड़ना चाहते थे। पर वे छोटे थे—निर्णय लेने की ताकत उनके पास नहीं थी।

सुहानी सोच रही थी जिन लोगों ने आज तक हम भाई बहनों के लिए कुछ किया नहीं उनके आशीर्वाद के साथ शादी कैसे कर ली। वो दादा जी के पास गई। शादी के घर में भीड़ तो हो चुकी थी, ऐसे में बात करना मुश्किल तो था पर ज़रूरी भी। दादा जी ने पूछा क्या बात है सुहानी कुछ बोलना है?

जी दादा जी मुझे आप से और नाना जी से बात करनी है।

दादा जी ने बोला अच्छा चलो दूसरे कमरे में चलकर बात करते।

वो तीनों दूसरे कमरे में आ गये तो दादा जी बोले हां बेटा बोलो क्या बात है?

दादा जी आपलोग मेरे कन्यादान की बात कर रहे क्या आपने एक बार भी मुझे पूछा मैं क्या चाहती? मेरी मॉं कन्यादान क्यों नहीं कर सकती मुझे बतायेगे? मैंने मां से पूछा पर वो चुप रह जाती।

दादा जी बोले बेटा हमलोगों में कन्यादान पति-पत्नी साथ मिलकर करते हैं ऐसे में आपकी मम्मी कैसे कर सकती? जब आपकी दादी गुजर गई तो आपकी बुआ की शादी उनके चाचा ने करी। फिर आपको आपत्ति किस बात पर हो रही?

सुहानी ने गहरी सांस ली। उसे पता था, दादा जी अपनी समझ से सही कह रहे हैं, पर वह यह भी जानती थी कि हर “परंपरा” हमेशा “न्याय” नहीं होती।

दादा जी मुझे सब समझ आ रहा पर मुझे आप ही बताइए जो बड़े चाचा ने कभी हमारा हाल न जाना उनसे मैं कैसे उम्मीद करूं कि वो मुझे आशीर्वाद और प्यार से विदा करेंगे?

मुझे ये भी पता है मां को आपलोग किसी भी रस्मों रिवाज में शामिल नहीं होने देंगे जबकि उससे ज्यादा प्यार कौन दे सकता है?

बस आप दोनों से विनती करतीं हूँ—
मेरी मां को मेरे आस पास ही रहने दे पापा नहीं है इसकी सजा वो काट रही है मैं अपनी शादी में उसको दूर करके और दुःख नहीं देना चाहती।

रही बात कन्यादान की तो आप बस इतना कर दे छोटे चाचा ने जिन्होंने हमेशा हमारा साथ दिया है अगर वो मेरा कन्यादान कर सकते है तो मुझे खुशी होगी। मुझे पता है छोटे चाचा से बड़े और दो चाचा है पर बात अगर कन्यादान की है तो मेरा कन्यादान छोटे चाचा से करवा दीजिए।

सुहानी की आंखें नम थीं, पर आवाज़ में दृढ़ता थी। उसने पहली बार अपनी इच्छा खुलकर रखी थी। यह सिर्फ रस्म का सवाल नहीं था, यह सम्मान का सवाल था।

दादा जी और नाना जी ने विचार किया और बोले ठीक है बेटा जिसमें तुम्हारी खुशी। सुहानी भी अब खुश हो गई।

उसके भीतर जैसे वर्षों से दबा बोझ थोड़ा हल्का हो गया। उसे लगा, आखिर कोई तो उसकी बात सुन रहा है।

पूरी शादी में उसकी मां उसके साथ रही। मां ने सुहानी के बालों में तेल लगाया, उसे हल्दी में सजाया, मेहंदी लगवाते समय उसका हाथ थामे रखा। सुहानी को हर पल महसूस हुआ कि मां ही उसकी असली ढाल है।

जब कन्यादान का वक्त आया तो दादा जी ने बोला छोटे तुम दोनों सुहानी का कन्यादान करो।

छोटे चाचा और चाची ने बहुत प्यार से मुझे देखा और ऐसा लगा उनके आशीर्वाद के बिना मेरी विदाई अधूरी रह जाती।

पंडित जी ने मंत्र पढ़े। अग्नि की लौ चमक रही थी। सुहानी का मन कांप रहा था—खुशी, डर, और विदाई की टीस… सब एक साथ।

जब पंडित जी ने मेरा हाथ चाचा चाची के हाथ में रखा तो चाचा जी ने मां से बोला भाभी आप भी आइए ये हक तो आपका है।

उस पल जैसे समय रुक गया। सुहानी की आंखें भर आईं। उसे ऐसा लगा, जो बात वह कब से बोलना चाहती थी, चाचा जी ने उसकी वह इच्छा भी पूरी कर दी।

मां आगे बढ़ीं। हाथ कांप रहे थे, आंखें भीग रही थीं, पर चेहरा गर्व से चमक रहा था। सुहानी ने मां की तरफ देखा—उस मां को, जिसने अकेले चार बच्चों को संभाला, जिसने समाज के तानों को पी लिया, जिसने बेटी के सपनों को टूटने नहीं दिया।

दिल ही दिल में चाचा का धन्यवाद करते मेरी आंखों ने बहना चालू कर दिया। मैं खुश थी जैसे भी हुआ मेरा कन्यादान मेरी मां के हाथों भी सम्पन्न हुआ।

वह रस्म सिर्फ रस्म नहीं रही—वह मां के अधिकार की वापसी बन गई।

जीवन में बहुत लोगों के साथ ऐसी बात होती है जिनको समय के साथ बदलना चाहिए। ये एक सच है जिसको आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ। उम्मीद है कहानी आपको पसंद आये। आपके प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।

रश्मि प्रकाश


अब आपकी बारी (कमेंट के लिए)

आपके हिसाब से कन्यादान जैसी रस्मों में माँ का अधिकार कितना होना चाहिए?
क्या परंपरा के नाम पर किसी माँ को बेटी से दूर रखना सही है, या समय के साथ बदलाव जरूरी है?
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