अनुराधा का आज पूरा दिन ऑफिस में सहकर्मियों और शुभ चिंतकों की बधाइयां लेते हुए गुज़रा, कुमार सर किसी अन्य कार्य में व्यस्त होने के कारण उसे ट्रेंनिग देने नहीं आ सके थे, इसलिए शाम को ऑफिस खत्म होते-होते उसने अपने ऑफिस के फ़ोन से ही घर में पिताजी से बात की उसके पिता वीरेश्वर मिश्रा, भास्कर राव त्रिवेदी और सुलक्षणा ने पूरे इत्मीनान से आधे घंटे से ज्यादा अनुराधा से बात की, वे सभी न्यूज पर अनुराधा की बुद्धिमानी और साहस की खबर पहले ही देख चुके थे,
इसलिए वो खुद भी अनुराधा से इस बारे में ज्यादा से ज्यादा सुनना चाहते थे, पर अनुराधा ने उस केस के बारे में ज्यादा कुछ चर्चा न कर, सिर्फ उन तीनों की खैरियत जानने के बाद अनुराधा अपने रहने के इंतजाम और ऑफिस में होने वाली सामान्य दिनचर्या के बारे में बात कर रही थी।, अंत में अनुराधा ने अपने गेस्ट हाउस और ऑफिस का नंबर भी अपने पिता को दिया और कहा कि कार्य कि व्यस्तता के कारण वह अब से रात में ही आराम से बात किया करेगी। उसके दिए गए नंबर पर सिर्फ आपतकाल की
स्थिति में ही फ़ोन करें। इससे वीरेश्वर मिश्रा समझ गए थे, कि अनुराधा बहुत अधिक कार्य भार के दबाव में है, अभी नई नई नौकरी है, इसलिए कुछ तनाव में है, धीरे धीरे अपने कार्य में अभ्यस्त होने पर वह सामान्य हो जाएगी।
गेस्ट हाउस में पहुंच कर अनुराधा ने फ्रेश होकर चाय पी और न्यूज चैनल देखने लगी, न्यूज चैनल्स उसके नाम पर कल से अलग अलग महानुभाव लोग अपनी अपनी राय रखकर डिबेट कर रहे थे, उसे “महिला शक्ति”, “दुर्गा” और न जाने क्या क्या उपमा देकर संबोधित किया गया। इससे ऊबकर उसने जब गेस्ट हाउस में रखा हुआ आज का समाचार पत्र देखा, तो उसमें भी सिर्फ उसी के कारनामें बढ़ा चढ़ाकर लिखे हुए थे। न्यूज़ मीडिया, प्रिंट मीडिया और यहां तक कि उसका ऑफिस स्टाफ भी मंत्री जी और उनकी पूरी गेंग
के रंगे हाथ पकड़वाने के साहसिक कार्य में सिर्फ और सिर्फ अनुराधा, कमिश्नर सर, पुलिस विभाग एवं भ्रष्ट्राचार निरोधक दस्ते की तारीफों के पुल बांध रहा था, कुमार सर जिन्होंने ही अपनी सूझबूझ और बहादुरी से इस सारे मामले की जांच पड़ताल करके मंत्री जी और उनके साथियों को रंगे हाथ पकड़वाया था, उनका तो कोई नाम तक भी नहीं ले रहा था।
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आज कुमार सर ऑफिस में ट्रेंनिग देने के लिए भी नहीं आए थे, कही उन्हें न्यूज मीडिया और अन्य लोगों के द्वारा मुझे क्रेडिट दिए जाने से कोई नाराज़गी तो नहीं है। वैसे भी किसी के अच्छे कार्य का क्रेडिट उसे ही मिलना चाहिए था, ऐसा अनुराधा का भी मानना था, पर कमिश्नर सर को वह मना नहीं कर सकी थी, आज कुमार सर से नहीं मिल पाने के कारण उसे बहुत अकेलापन भी लग रहा था, अनुराधा को अचानक ध्यान आया कि उसने जब कार से कंस्ट्रक्शन साइट पर जाते वक़्त कुमार सर के मोबाइल से अपने पिता से बात की थी,
तभी कुमार सर ने उसे अपना मोबाइल नम्बर भी लिख कर दिया था, उसने पर्स से कुमार सर का मोबाइल नंबर निकाल कर गेस्ट हाउस के रिसेप्शन से फ़ोन करने के लिए कदम बढ़ाया ही था, तभी उसे याद आया कि अभी रात के 8.30 हो गए है, इंस्पेक्टर विनोद ने बताया था कि कुमार सर रोज़ शाम ऑफिस ख़तम होने पर किसी बॉर में जाकर शराब पीते हैं, इसलिए उसने कुमार सर को फ़ोन करने का विचार त्याग दिया। अनुराधा ने रात का खाना खाकर कुछ समय बाद सोने का प्रयास किया पर उसकी आँखों में नींद कहां थी, वह तो दिन भर ही कुमार सर के ख्यालों में ही डूबी हुई थी।
अगले दिन उसके ऑफिस पहुंचने के 10 मिनट बाद कुमार सर और उनके पीछे पीछे एक हवलदार कुछ फाइल लेकर अनुराधा के पास आए। अनुराधा प्यार भरी आंखों से कुमार सर को देख रही थी, अनुराधा ने जब पहली बार कुमार सर को देखा था उस दिन, और आज तक के महज़ तीन चार दिनों में ही कितना फर्क आ गया था,
उनके लुक्स में, उनकी पर्सनालिटी में, आज कुमार सर क्लीन शेव्ड, नीला सूट पैंट टाई पहने हुए, पॉलिश किए चमकते जूते, परफ्युम की भीनी भीनी खुशबू, उनकी काली चमकती आंखे, दमकते हुए सफेद दांत,और प्यारी सी मोहक मुस्कान कितने प्यारे लग रहे थे, और उस दिन बिना मैचिंग के कपड़े, दो दिन से बड़ी हुई दाढ़ी, और मुँह से आती शराब की बदबू, किसी भी इंसान का इतनी जल्दी कायाकल्प ही बदल जाए उसने सपने में भी नहीं सोचा था,
तभी कुमार सर ने कहा अनुराधा..
अनुराधा अचानक ख़यालो की दुनियां से हक़ीक़त में आ गई।
कुमार सर ने उन फाइल्स कि तरफ इशारा करके कहा कि इसमें बहुत जरूरी केस, रेवेन्यू से सम्बन्धित काग़ज़ात और कुछ विशेष लोगों कि इंक्वायरी के गोपनीय दस्तावेज़ हैं, जो मैंने अपने गाजियाबाद में पोस्टिंग होने की डेट से अभी तक में एकत्रित किए हैं, मेरे मथुरा जाने के बाद तुम इन्हें अपने पास ही रखना। आने वाले दिनों में इन्हीं फाइल्स कि डीटेल्स पर तुम्हें ब्रीफ करूंगा, जब तक मै यहां हूँ, कोशिश करना कि इन सभी का अध्यन करके जो भी और अधिक जानकारी चाहिए हो मेरे से ले लेना ।
लंच तक कुमार सर ने उसे एक स्टूडेंट की तरह एक फाइल पर ब्रीफ किया। लंच के वक़्त उन्होंने अनुराधा से कहा कि आप खाने के लिए क्या करोगी, अनुराधा ने गेस्ट हाउस से ही अपने लिए लंच पैक करा लिया था, परन्तु वह भी कुमार सर को टटोलना चाहती थी, उसने कहा कि अभी मै यहां नई हूं न इसलिए किसी रेस्टोरेंट का मुझे पता नहीं है, किसी को फोन करके मै अपने और आपके लिए खाना बुलवा लेती हूं, अनुराधा ने जानबूझकर टिफिन न लाने का कहकर सफ़ेद झूठ बोला था, ताकि उसे कुमार सर के और करीब आने का मौका मिल सके।
परन्तु कुमार सर ने उसे ऐसा कोई मौका ही नहीं दिया, उन्होंने पास के रेस्टोरेंट में फोन करके दो लोगों के लिए खाना ऑर्डर कर दिया।
फिर भी अनुराधा खाना आने तक कुमार सर से ज्यादा से ज्यादा बात करके, उनके बारे में जानना चाहती थी।
उसने ही बात करने कि पहल करते हुए कुमार सर से कहा “तो सर आप हमेशा ही इसी रेस्टोरेंट से ही खाना मंगवाते हैं?
हाँ ऑफिस के वक्त अक्सर यहीं से खाना मंगवाता हूं, कुमार सर संक्षिप्त सा उत्तर देकर मोबाइल में मेसेज देखने लगे ।
और डिनर? अनुराधा ने हिम्मत करके पूछ ही लिया, हालांकि वो इंस्पेक्टर विनोद कुशवाहा से जान चुकी थी कि कुमार सर रोज़ ऑफिस से निकलते ही किसी बॉर में जाकर शराब पीते हैं, तो डिनर भी वहीं होता होगा।
कुमार सर ने अनुराधा को झिझककर देखते हुए कहा, तीन दिन पहले तक तो किसी न किसी बॉर में ही मेरी शाम गुजरती थी, और डिनर भी वहीं कर लेता था, कहकर कुमार सर ख़ामोश हो गए।
तो आपने पिछली तीन रातों से खाना और पीना नहीं किया क्या? अनुराधा ने चहकते हुए अगला सवाल दाग दिया।
कुमार सर ने संकोच के साथ अनुराधा को कहा कि जब हम पहली बार मिले थे उसके पहली की रात तक तो मै जी भर कर पिया करता था, जिस कारण सुबह मेरे मुंह से शराब कि गंध भी आती ही होगी, पर किसी ने मेरे रुतबे को देखकर मुझे टोकने की कभी हिम्मत नहीं की थी। पर उस दिन जब अनजाने में मै तुमसे टकराकर आगे बढ़ा, तुमने मुझे शराबी और मवाली सा समझ कर बहुत सुनाया था। उसी आत्मग्लानिवश मैने शाम को बॉर जाना ही बंद कर दिया, रात को खाना खाकर सोचता रहा कि इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी,
मै खुद ही कब एक पैक दो पैक सिर्फ किसी ओकेशन पर पीते पीते कब बेवड़े कि तरह घंटो पीने लगा पता ही नहीं चला, शायद शराब ही मेरी तन्हाई का सहारा बन गई थी। बस उस रात के बाद से मेरी अब पीने कि इच्छा ही खत्म हो गई। उसकी अगली रात तो हम मंत्री जी के ऑपरेशन में बिजी थे रात को कमिश्नर सर के साथ ही ऑफिस में ही डिनर किया, और कल रात यूँ ही किसी ढाबे में जाकर खाना खा कर आया था। कुमार ने मुस्कुराकर अनुराधा को जवाब दिया।
तभी रेस्टोरेंट से खाना आ गया था, दोनों ने लंच करके फिर ऑफिस की दूसरी फाइल्स पर डिस्कशन करने लगे,जब उनका ऑफिस स्टाफ शाम को घर जाने की अनुमति लेने आया तब कुमार सर ने घड़ी कि और देखा, शाम के 6 कब बज गए पता ही नहीं चला था।
सारी फाइल्स एक दराज में रखकर लॉक करके अनुराधा ऑफिस के गेट की तरफ बढ़ी ही थी, कि उसने देखा कि कुमार सर कार स्टार्ट करके उसका ही इंतजार कर रहे थे, अनुराधा के पास आते ही बोले कि चलिए मै भी गेस्ट हाउस तक ही का रहा था, सोचा आपको भी वहीं ड्रॉप कर दूं…
अनुराधा मुस्कुराकर कुमार सर के साथ उनकी कार में आगे की सीट पर बैठ गई, वह कुमार सर की तरफ देखते हुए कुछ बात करना चाह ही रही थी, तभी गेस्ट हाउस आ गया, उसके उतरते ही कुमार सर कार स्टार्ट करके आगे बढ़ने लगे।
अनुराधा ने उन्हें टोका सर अभी तो आपने कहा था कि आपको गेस्ट हाउस में कुछ काम था तो अचानक कहां निकल दिए, कुमार सर ने झेंपकर अनुराधा से कहा नहीं मुझे यहां कोई काम नहीं था, तुम पैदल ही गेस्ट हाउस तक जाती ये मुझे अच्छा नहीं लगा, इसलिए मै तुम्हे यहां तक ड्रॉप करने आ गया।
अनुराधा ने खुश होकर कुमार सर से चाय पीने का आग्रह कर दिया, कुमार सर मुस्कुराकर उसके साथ पीछे पीछे गेस्टहाऊस आ गए, वहीं लॉबी में अनुराधा ने चाय और स्नेक्स के लिए कहा और कुमार सर से बात करने की सोचने लगी, उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि वह कुमार सर से क्या बात करे, इसलिए उसने बात शुरू करने के उद्देश्य से पूछ लिया “सर मेरा इंडक्शन ट्रेंनिग प्रोग्राम कब तक चलेगा?
कुमार सर ने मुस्कुराकर कहा क्यों इतनी जल्दी पक गई क्या आप मुझसे?
अनुराधा ने हंसकर कहा नहीं सर, आपके साथ तो मुझे बहुत अच्छा लगता है, आपसे भला मै क्यों बोर होंगी। आप तो बहुत अच्छे से ट्रेंनिग दे रहें है, मुझे …
अनुराधा कुछ और बोलती तभी चाय, स्नेक्स आ गई चाय पीते पीते ही कुमार ने कहा कि कमिश्नर सर ने मुझे 10 तारीख तक तुम्हे इंडक्शन देने का आदेश दिया है, उसके दो दिन बाद मुझे मथुरा में ज्वाइन करना है, यानी अभी तुम्हें मुझे एक सप्ताह और झेलना है।
नहीं सर ऐसा क्यों कहते है, आप तो मुझे बहुत अच्छे लगते है, कहते कहते अनुराधा शर्मा सी गई।
चाय पीते ही कुमार सर अनुराधा से विदा लेकर कार से अपने क्वार्टर चले गए।
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अपने रूम में आकर अनुराधा फ्रेश होने के बाद, वापस गेस्ट हाउस की लॉबी में आकर किताबें देख रही थी, तभी उसे याद आया कि पिताजी को फ़ोन लगा लेती हूं, उसने आज काफ़ी देर तक अपने पिताजी और सुलक्षणा आंटी से खुल कर बात की, बातों ही बातों में उसने कुमार सर द्वारा दी ट्रेंनिग के बारे में भी बताया।
फ़ोन खत्म करके अनुराधा वापस रूम में आ गई, खाना खाने के बाद फिर सोचने लगी कि कुमार सर सिर्फ 10 तारीख तक ही यहां रहेंगे, और उसके बाद जब वो मथुरा शिफ्ट हो जाएंगे तो फिर कहां मिलना हो पाएगा, इसलिए वह उनके साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त गुजारना चाहती थी, उसे महसूस हो चला था कि वह अब कुमार सर से प्यार करने लगी है।
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कुटील चाल (भाग-9) – अविनाश स आठल्ये : Moral stories in hindi
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अविनाश स आठल्ये