कुछ परायें अपने कुछ अपनें परायें हो जातें हैं – गुरविंदर टूटेजा 

   नीता जल्दी चलों…तैयार नहीं हुई क्या…??

तैयार हूँ राजीव…चलो ये सारा सामान भी कार में रख लों…कहतें हुयें नीता की आँखों में आँसू आ गये…पापाजी तो पहले ही चले गये थे…अब मम्मी जी के जाने से तो घर सूना ही हो गया है…मुझे कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी…हम उनके बिना कैसे रहेगें राजीव…??

  राजीव ने नीता को बाँहों में भर लिया उसकी आँखों में भी पानी था…यहाँ हम कुछ नहीं कर सकतें है पर तुम्हारा ये फैसला की हम मृत्यु भोज नहीं करेंगे और खाना बनवाकर हम विधवाआश्रम में ले जायें और मम्मी  की साड़ियाँ भी वहीं दे आयेंगे..!!!!

  जल्दी ही वहाँ पहुँच गये खाना बनाने का आर्डर दिया था वो भी आ गया था…दोनों ने अपने हाथों से सबकों खाना परोसा व सबको एक-एक साड़ी  दी सभी बहुत खुश हो गये एक आन्टी उदास बैठी थी वो उधर आई ही नहीं तो नीता उनके पास जाकर उनसे आग्रह किया कि वो भी खाना खायें तो उन्होनें पूछा कि तुम आज क्यूँ  खिला रहें हो खाना…??

   नीता रोने लगी और बताया कि मम्मी जी हमें छोड़कर चली गयी तो हमने सोचा कि आप सबके साथ अपना दुःख बाँट लेतें है…!!

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  आन्टी ने कहा…वाह! बेटा आज के ज़मानें में ऐसे बेटे-बहू भी है जो इतना सब कर सकतें है….वरना यहाँ तो सब अपनों के ही सतायें हुए हैं…बहू से तो क्या उम्मीद करें जब बेटा ही पराया हो जायें मुझे भी मेरा बेटा ही यहाँ छोड़ गया और किसी की तो बेटी ने ही यहाँ छोड़ दिया…!!

   सच कहूँ बेटा तुम्हारी सास किस्मतवाली थी जो तुम परायी होकर भी उनकी अपनी बन गई और उनके जाने के बाद भी उनकें लियें ये सब कर रही हो…वरना दर्द की इंम्तिहाँ तब हो जाती है जब अपनें ही ज़िन्दा इंसान को मरा हुआ मान लेतें हैं और हमेशा  के लियें छोड़ देतें है….हम जैसे सभी यहाँ किसी अपने के इंतज़ार में रहतें हैं कोई नहीं आता वो इंतज़ार मौत के साथ ही खत्म होता हैं…!!!!

   नीता यहाँ अपना दुःख कम करने आई थी पर दिल में जाने कितनों का दर्द साथ ले आई थी….इसी उम्मीद के साथ की फिर वो जल्दी ही सब अपनों से मिलने जरूर जायेंगी…राजीव भी इस विश्वास में उसके साथ था….!!!!!

 

गुरविंदर टूटेजा 

उज्जैन (म.प्र.)

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