Moral Stories in Hindi : श्यामिली जी एक सरकारी स्कूल में अध्यापिका थीं, जो अब सेवा निवृत्त हो चुकीं थी।
उनकी एक बेटी रागिनी और एक बेटा मयंक थे। जो दूसरे शहरों में सेटेल्ड् थे। उनके पति पुरषोत्तम जी का कुछ वर्ष पूर्व ही देहांत हो चुका था, जो एक बैंक अधिकारी थे।
बेटा और बेटी समय-समय पर श्यामली जी का हाल-चाल लेने आते रहते थे।
लेकिन अपनी-अपनी नौकरियों के चलते कोई भी अपनी माँ के पास स्थायी तौर पर ठहर नहीं सकता था।
श्यामिली जी भी अपना घर छोड़कर कहीं भी जाने के लिए राजी नहीं थीं।
जहाँ उन्होंने अपने पति के साथ दुःख-सुख के कई क्षण बिताए थे, वह घर उनके लिए मंदिर के समान था।
बेटा और बेटी ने उन्हें कई बार अपने साथ चलने के लिए कहा लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से मना कर दिया था कि वे अपने इस आशियाने को छोड़कर कहीं भी नहीं जाएंगी।
उनके बार-बार के मान-मनोब्बल से उनकी बहू और दामाद को चिढ़ हो रही थी।
दामाद, बेटी पर नाराज हो रहा था और बहू, बेटे पर कि जब वे नहीं आना चाहतीं तो उन्हें रहने दो उनके आशियाने पर क्यों बार-बार जाकर उनको दखल देते हो!
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समय बीतता रहा, अब बेटी और बेटे का आना भी कम हो गया था।
शायद उनके तबादले और दूर के शहरों में हो गए थे या फिर श्यामली जी के बार-बार जाने से मना करने पर वे नाराज हो गए थे, कुछ भी कहना मुश्किल था।
अब रागिनी और मयंक के बच्चे भी काफी बड़े हो गए थे उनकी स्कूली शिक्षा पूरी हो चुकी थी वे अब कॉलेज में कदम रखने वाले थे।
जहाँ उनके माता-पिता की पोस्टिंग थी वह शहर कोई बड़े और नामी शहरों में से नहीं थे इसलिए उन्होंने अपने माता-पिता से दूसरे शहरों में पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। उनके माता-पिता ने भी बच्चों के उज्जवल भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें दूसरे शहर में रहकर पढ़ने की मंजूरी दे दी।
मयंक के एक बेटी थी सुरुचि और रागिनी को एक बेटा निशांत एवं बेटी स्वाति थी।
तीनों बच्चे पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चले गए।
जब दोनों के माता-पिता को पता चला कि तीनों बच्चे एक साथ ही रहने वाले हैं, तब रागिनी और मयंक ने निश्चिंत होकर उन्हें जाने दिया। अपने काम के चलते वे बच्चों का दाखिला करवाने भी नहीं जा पा थे क्योंकि उन्हें पता था कि उनके बच्चे इतने सक्षम हैं कि वे सब कुछ अपने आप ही कर लेंगे।
उन्होंने यह पूछने की जहमत भी नहीं उठाई कि उनके बच्चे किस शहर में अध्ययनरत हैं?
समय बीतता रहा, बच्चे छुट्टियों में आते-जाते और जल्दी ही वापस चले जाते।
लेकिन माता-पिता भी तीनों बच्चों के एक साथ होने से निश्चिंत थे।
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बच्चों ने जो, जैसा भी बताया उसे ही वे सच मानते रहे। अपने माता-पिता को कभी-कभी बच्चे यह भी बताते थे कि एक दादी जी हैं, वे बहुत अच्छी हैं। वे हम सबका बहुत ध्यान रखती हैं।
लेकिन ये नहीं बताया था कि दादी जी हैं कौन? उनका परिवार कहाँ है?
उनके माता-पिता ने भी यह जानना उचित नहीं समझा कि वे किस दादी जी की बातें कर रहे हैं!
श्यामली जी के आस-पड़ोस के लोग बच्चों की बहुत तारीफ कर रहे थे, सब यही कहते थे “खून का रिश्ता” है, ऐसे ही फीका नहीं पड़ जाता।
बच्चे भी सबकी आँखों के तारा था। मोहल्ले आस-पड़ोस के लोगों को भी बहुत काम आ रहे थे।
इधर रागिनी और मयंक भी बहुत दिनों से अपनी माँ के पास नहीं आए थे।
श्यामली जी ने भी कोई खबर देनी बंद कर दी थी। वैसे भी उनका मन अब बच्चों में लगा रहता था और उनका बुढ़ापा आसानी से कट रहा था।
लेकिन एक दिन उनकी काफी तबियत खराब हो गई तब पड़ोसियों ने रागिनी और मयंक को खबर भेज दी।
हालांकि उनके बच्चों ने खबर नहीं भेजी थी यह सोचकर कि जब उनके माता-पिता को दादी/नानी की चिंता नहीं है तो हम उन्हें यहाँ क्यों बुलाएं? हम तीनों मिलकर ही उनकी देखरेख भी कर लेंगे।
पड़ोसियों द्वारा खबर देने के बाद जब रागिनी और मयंक यहाँ आए तब यहाँ पर उन्होंने अपने बच्चों को देखा।
देखकर वे हैरत में पड़ गए। वे दोनों कुछ कह नहीं सके। काफी शर्मिंदा थे। पड़ोसियों ने ही कहा,,, “खून के रिश्ते इस तरह अलग नहीं होते।”
श्यामली जी ने सिर्फ इतना ही कहा,,, “भले ही हमारे संस्कार कमजोर पड़ गए हों लेकिन तुम्हारे संस्कार बहुत मजबूत थे। सब खुश रहो आवाद रहो।”
उन्होंने ढेरों दुआएं दीं और कुछ ही देर में गर्दन एक ओर लुढ़क गई।
स्वरचित
©अनिला द्विवेदी तिवारी
जबलपुर मध्यप्रदेश
#खून का रिश्ता
अच्छी कहानी है पर माता पिता ये नहीं जानते की बच्चे किस शहर में पढ़ रहे हैं ये बात अविश्वसनीय है । हालाकि ये कहानी है जो कि कपोल कल्पित होती है फिर भी विश्वसनीयता तो अनिवार्य है ।