“एक मां ने अपनी बेटी के लिए वो दुनिया चुनी जो समाज की नजर में ‘उतरन’ थी, लेकिन उस दुनिया में बेटी को वो मिला जो मां ने पूरी जिंदगी खोया था।”
शादी की शहनाई की आवाज़ के बीच, हर तरफ जश्न का माहौल था। रंग-बिरंगे कपड़ों में सजी-धजी औरतें, मेहमानों की हंसी-ठिठोली और पकवानों की खुश्बू से पूरा लॉन महक रहा था। लेकिन कमरे के अंदर का दृश्य बिल्कुल अलग था।
सुषमा जी बिस्तर के एक कोने में बैठी अपनी बेटी, अंकिता, के हाथों में मेहंदी रचते देख रही थीं। अंकिता के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, लेकिन सुषमा जी की आंखों में चिंता का समंदर लहरा रहा था।
बाहर मेहमानों के बीच कानाफूसी चल रही थी।
“अरे, सुना है दूल्हा पहले से शादीशुदा था? उसकी पत्नी कैंसर से गुज़र गई थी।”
“हां, और एक पांच साल की बेटी भी है। पता नहीं सुषमा जी को क्या सूझी, अपनी कुंवारी, पढ़ी-लिखी बेटी को ऐसे घर में ब्याह रही हैं। डॉक्टर है अंकिता, उसे लड़कों की क्या कमी थी?”
सुषमा जी के कानों में ये बातें पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं। लेकिन उन्होंने किसी को जवाब नहीं दिया। वे जानती थीं कि उन्होंने यह फैसला क्यों लिया था।
कहानी कुछ महीने पहले शुरू हुई थी। अंकिता शहर के एक बड़े अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) थी। वहां उसकी मुलाकात डॉ. विवान से हुई थी। विवान एक कार्डियोलॉजिस्ट थे और अस्पताल में सबका बहुत सम्मान करते थे। लेकिन उनकी जिंदगी में एक खालीपन था—उनकी पत्नी का देहांत दो साल पहले हो चुका था और वे अपनी नन्ही बेटी, रूही, को अकेले पाल रहे थे।
रूही अक्सर बीमार रहती थी और अंकिता उसका इलाज करती थी। धीरे-धीरे अंकिता और रूही के बीच एक गहरा जुड़ाव बन गया। विवान भी अंकिता की संवेदनशीलता और रूही के प्रति उसके निस्वार्थ प्रेम से प्रभावित थे। जब विवान ने अंकिता के सामने शादी का प्रस्ताव रखा, तो अंकिता ने तुरंत हां कर दी।
लेकिन अंकिता के पिता, राघवेन्द्र जी, इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे।
“सुषमा, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है?” राघवेन्द्र जी ने गुस्से में कहा था जब सुषमा जी ने विवान की बात छेड़ी थी। “मेरी बेटी डॉक्टर है, कोई बेचारी नहीं जो किसी की दूसरी पत्नी बने। और वो भी एक सौतेली मां? समाज क्या कहेगा? लोग कहेंगे कि राघवेन्द्र को अपनी बेटी के लिए कोई ढंग का लड़का नहीं मिला।”
“समाज की छोड़िए राघवेन्द्र जी,” सुषमा जी ने शांत स्वर में कहा था। “विवान एक सुलझा हुआ इंसान है। और सबसे बड़ी बात, वो अंकिता की कद्र करता है। रूही अंकिता को मां मान चुकी है। क्या यह काफी नहीं?”
“कद्र?” राघवेन्द्र जी ने व्यंग्य से कहा। “पुरुषों की कद्र का मुझे अच्छे से पता है। पहली पत्नी के जाने के बाद उन्हें बस एक आया (Nanny) चाहिए होती है जो उनके बच्चे पाले और घर संभाले। प्यार-व्यार सब दिखावा है। अंकिता वहां जाएगी तो नौकरानी बनकर रह जाएगी।”
राघवेन्द्र जी की यह बात सुषमा जी के दिल पर एक पुराने घाव की तरह लगी थी। उन्हें अपना अतीत याद आ गया।
सुषमा जी की शादी राघवेन्द्र जी से तब हुई थी जब राघवेन्द्र जी का पहला रिश्ता टूट चुका था (सगाई के बाद)। सुषमा जी के परिवार ने इसे एक ‘अच्छे घर’ का रिश्ता मानकर हां कर दी थी। लेकिन शादी के तीस साल बाद भी, सुषमा जी को कभी वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थीं। राघवेन्द्र जी हमेशा अपनी पहली मंगेतर की तुलना सुषमा जी से करते थे—”वो होती तो घर को स्वर्ग बना देती,” “तुमसे तो ढंग की चाय भी नहीं बनती।”
सुषमा जी ने पूरी जिंदगी राघवेन्द्र जी के ताने सुने, उनके घर को संभाला, उनके बच्चों को अच्छी परवरिश दी, लेकिन राघवेन्द्र जी की नजर में वह हमेशा ‘दूसरे दर्जे’ की पत्नी ही रहीं। एक ‘समझौता’ जिससे घर चल रहा था।
जब राघवेन्द्र जी ने विवान के बारे में वही बात कही, तो सुषमा जी को लगा कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है। लेकिन इस बार वह अपनी बेटी के साथ ऐसा नहीं होने देंगी। उन्होंने चुपचाप विवान से मिलने का फैसला किया।
एक दिन, सुषमा जी अस्पताल पहुंचीं और विवान के केबिन में गईं। विवान ने बड़े आदर से उन्हें बैठाया।
“डॉक्टर साहब,” सुषमा जी ने सीधे मुद्दे की बात की। “मैं जानती हूं कि आप अंकिता को पसंद करते हैं। लेकिन एक मां होने के नाते मेरे मन में डर है। क्या आप अंकिता से इसलिए शादी करना चाहते हैं क्योंकि आपको रूही के लिए मां चाहिए? या इसलिए क्योंकि आप अंकिता को अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहते हैं?”
विवान ने एक पल के लिए सोचा और फिर बहुत ही गंभीरता से कहा, “मां जी, रूही के लिए आया रखी जा सकती है, पर जीवन के लिए साथी नहीं खरीदा जा सकता। अंकिता ने न सिर्फ रूही के दिल में जगह बनाई है, बल्कि उसने मुझे दोबारा जीना सिखाया है। मैं उसे रूही की मां बनाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी पत्नी, अपनी दोस्त बनाने के लिए ला रहा हूं। उसका करियर, उसके सपने, सब मेरे लिए उतने ही मायने रखते हैं जितने मेरे अपने।”
विवान की आंखों में सच्चाई देखकर सुषमा जी का दिल हल्का हो गया। उन्हें लगा कि जो सम्मान उन्हें तीस साल में नहीं मिला, वह उनकी बेटी को शादी के पहले दिन से मिल रहा है।
घर आकर सुषमा जी ने राघवेन्द्र जी से साफ कह दिया, “अंकिता की शादी विवान से ही होगी। अगर आप साथ देंगे तो अच्छा, वरना मैं अकेले ही अपनी बेटी का कन्यादान करूंगी।”
राघवेन्द्र जी के अहम को चोट पहुंची। “ठीक है, करो मनमानी। लेकिन याद रखना, जिस दिन वो रोती हुई वापस आएगी, उस दिन मेरे पास मत आना।”
और आज, शादी का दिन था। राघवेन्द्र जी मंडप में नहीं बैठे थे। वे अपने कमरे में बंद थे, अपनी जिद्द पर अड़े हुए।
फेरे संपन्न हुए। विदा का समय आया। अंकिता ने मां को गले लगाया और रो पड़ी। सुषमा जी ने आंसू पोंछे और अपनी कलाई से सोने के कंगन उतारकर अंकिता को पहनाए।
“ये कंगन मेरी नानी ने मुझे दिए थे, बेटा,” सुषमा जी ने कहा। “उन्होंने कहा था कि औरत का असली गहना उसका स्वाभिमान होता है। मैंने शायद पूरी जिंदगी उस गहने को संदूक में बंद रखा, लेकिन तुम उसे हमेशा पहनना। विवान अच्छा लड़का है, पर याद रखना, किसी की ‘जरूरत’ मत बनना, उसकी ‘चाहत’ बने रहना।”
अंकिता ने मां के पैर छुए और विवान के साथ गाड़ी में बैठ गई। गाड़ी धूल उड़ाती हुई चली गई, लेकिन सुषमा जी के मन में एक अजीब सी शांति थी।
दो साल बीत गए।
राघवेन्द्र जी बीमार पड़ गए। उन्हें लकवे का हल्का दौरा पड़ा था। उनका शरीर दाहिनी तरफ से काम नहीं कर रहा था। सुषमा जी दिन-रात उनकी सेवा में लगी रहतीं, लेकिन राघवेन्द्र जी का चिड़चिड़ापन बढ़ता जा रहा था।
एक शाम, राघवेन्द्र जी बिस्तर पर लेटे पानी मांग रहे थे। सुषमा जी रसोई में थीं। तभी दरवाजे की घंटी बजी। सुषमा जी ने जाकर देखा तो सामने अंकिता और विवान खड़े थे। साथ में सात साल की रूही भी थी।
राघवेन्द्र जी ने अंकिता को देखा तो मुंह फेर लिया। लेकिन विवान आगे बढ़ा और उनके पैर छुए।
“पापा जी, कैसे हैं आप?” विवान ने पूछा।
राघवेन्द्र जी ने कोई जवाब नहीं दिया।
विवान ने अंकिता की तरफ देखा और फिर अपने बैग से कुछ फाइलें निकालीं। “पापा जी, मैंने आपके इलाज के लिए शहर के बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट से बात की है। और घर पर फिजियोथेरेपी का इंतज़ाम भी कर दिया है। अंकिता खुद आपकी डाइट और दवाइयों का चार्ट बनाएगी।”
राघवेन्द्र जी ने घूरकर देखा। “मुझे किसी की भीख नहीं चाहिए। खासकर उस लड़की की जिसने मेरी बात नहीं मानी।”
अंकिता की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन विवान ने उसका हाथ थाम लिया। उसने राघवेन्द्र जी से कहा, “पापा जी, यह भीख नहीं, फर्ज है। और रही बात बात न मानने की, तो अंकिता ने आपकी बात न मानकर सही किया। क्योंकि अगर मानी होती, तो आज वह यहां एक खुशहाल बेटी और पत्नी बनकर नहीं, शायद एक घुटी हुई महिला बनकर खड़ी होती।”
विवान ने कमरे में चारों तरफ देखा, जहां सुषमा जी खड़ी थीं। “मैंने सुना है आप अक्सर मां जी को ताने देते हैं कि वो ‘दूसरी पसंद’ थीं। लेकिन पापा जी, कभी-कभी दूसरी पसंद ही वो होती है जो आखिर तक साथ निभाती है। मां जी ने पूरी जिंदगी आपको वो प्यार दिया जो शायद आपकी ‘पहली पसंद’ भी नहीं दे पाती। और आज अंकिता मेरे घर को, मेरी रूही को और मुझे वही प्यार दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि मैं उसका सम्मान करता हूं, उसे अपनी बराबर मानता हूं।”
राघवेन्द्र जी सन्न रह गए। जिस दामाद को उन्होंने ‘स्वार्थी’ समझा था, वह आज उन्हें आईना दिखा रहा था।
तभी नन्ही रूही राघवेन्द्र जी के पास आई और अपनी तोतली आवाज़ में बोली, “नाना जी, मम्मा कहती हैं आप बीमार हो। मैं आपके लिए ‘गेट वेल सून’ कार्ड लाई हूं।”
राघवेन्द्र जी ने उस मासूम बच्ची को देखा। उसने वही कंगन पहन रखे थे जो अंकिता की कलाई में थोड़े बड़े लगते थे, शायद अंकिता ने उसे खेलने के लिए दिए थे। वे कंगन… सुषमा जी के कंगन।
उस पल राघवेन्द्र जी का कठोर दिल पिघल गया। उन्हें एहसास हुआ कि जिसे वह ‘सौतेली’ और ‘उतारन’ समझ रहे थे, वह असल में एक मासूम रिश्ता था जिसे प्यार ने सींचा था। और जिसे वह अपनी ‘मजबूरी’ वाली पत्नी (सुषमा) समझते थे, वह असल में उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
राघवेन्द्र जी की आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते हुए हाथ से रूही के सिर पर हाथ रखा। फिर उन्होंने सुषमा जी की ओर देखा, जो दरवाजे पर खड़ी रो रही थीं।
“सुषमा…” राघवेन्द्र जी की आवाज़ टूटी हुई थी। “पानी… पानी पिलाओगी?”
सुषमा जी दौड़कर आईं और उन्हें पानी पिलाया। राघवेन्द्र जी ने पानी पीकर अंकिता का हाथ पकड़ा।
“मुझे माफ कर दे बेटा। मैं गलत था। विवान सही कह रहा है। तेरा फैसला सही था। तूने वो चुना जो मैं तेरी मां के लिए कभी नहीं बन पाया—एक सच्चा साथी।”
कमरे में एक भारी सन्नाटा था, लेकिन वह सन्नाटा दुख का नहीं, बल्कि मेल-मिलाप का था। अंकिता ने पिता के गले लगकर रोना शुरू कर दिया। विवान मुस्कुरा रहा था।
उस दिन के बाद घर का नक्शा बदल गया। राघवेन्द्र जी अब ताने नहीं देते थे। वे अक्सर शाम को विवान के साथ शतरंज खेलते और अंकिता के हाथ की बनी चाय की तारीफ करते। सुषमा जी के चेहरे पर अब वो उदासी नहीं थी, बल्कि एक संतोष था—अपनी बेटी को सही राह चुनने देने का संतोष।
एक दिन, सुषमा जी अपनी अलमारी साफ़ कर रही थीं। उन्हें वही पुराना संदूक मिला जिसमें उन्होंने अपने कंगन रखे थे। अब वह खाली था। लेकिन सुषमा जी को कोई मलाल नहीं था। उन्होंने महसूस किया कि उनके कंगन अब सही कलाई में हैं—उस कलाई में, जो न सिर्फ मरीजों का इलाज करती है, बल्कि रिश्तों के घाव भी भरती है।
समाज ने जो कहा, वह हवा हो गया। अंकिता की खुशहाल जिंदगी ने साबित कर दिया कि रिश्ते खून से नहीं, एहसास और सम्मान से बनते हैं। और कभी-कभी, ‘दूसरी बार’ की शुरुआत, पहली बार से कहीं ज्यादा खूबसूरत होती है।
दोस्तों जीवन में हमें अक्सर ‘परफेक्ट’ की तलाश होती है, लेकिन खुशियां अक्सर वहां मिलती हैं जहां हम ‘स्वीकार’ करना सीखते हैं। विवान ने अंकिता को और अंकिता ने रूही को स्वीकार किया, और इसी स्वीकारोक्ति ने एक टूटे हुए परिवार को जोड़ दिया। प्यार कोई ‘यूज्ड’ (used) चीज नहीं होती, वह तो हर बार नया होता है, बस देखने वाला नजरिया चाहिए।
मूल लेखिका : निभा राजीव “निर्वि”