जुआ – एम पी सिंह : Moral Stories in Hindi

अगर आपसे पूछा जाये कि क्या आप जुआ खेलते हैं? तो यकीनन आपका जवाब होगा नही। क्योंकि जुआ के नाम से आपके ज़हन में केवल कैसिनो, प्लेइंग कार्ड्स, हॉर्स रेस, बेटिंग, सट्टा, मैच फिक्सिंग, लॉटरी टिकट आदि ही आयेंगे, पर हकीकत कुछ और भी है। बिना जुआ खेले जिंदगी आगे नहीं बढ़ती।

शादी के लिये लड़का लड़की एक दूसरे का रंग रूप, पढ़ाई, कमाई, आदि देखते हैं, चंद मुलाकातें ओर कुछ घंटे की बातें, फिर ताउम्र साथ रहने का फैसला, कितना सही / गलत साबित होगा नही जानते,

ये जुआ ही तो है। शादी के बाद फैमली प्लान करते हैं, पता नही लड़का होगा या लड़की, ये जुआ ही तो है। अगर लड़का हुआ तो पढ़ लिखकर नेकदिल इन्सान बनेगा या आवारा, मॉ बाप की सेवा करेगा या बोझ बनेगा,

पता नही, ये जुआ ही तो है। अगर लड़की हुई तो मॉ बाप का नाम रोशन करेगी या बदनाम, पता नही, ये जुआ ही तो है। लड़की का पति वफादार होगा या नही, पता नहीं,

ये जुआ ही तो है। औलाद, जिसके लिए मॉ बाप अपना सबकुछ दांव पर लगाकर पालपोस कर बड़ा करते है, बुढ़ापे में सहारा बनेंगे या बेसहारा छोड़ देंगे, पता नही, ये जुआ ही हो है।

ऐसे अनेको उदाहरण है जो ये दर्शाते है कि जिंदगी में आगे बदने के लिये जुआ तो खेलना ही पड़ता है।

जिस किसी कार्य के करने से, उसके परिणाम में अनिश्चितता हो वो जुआ ही तो है।

इसका ये अर्थ बिल्कुल नही की हाथ पे हाथ रख कर बैठ जाये।

जब तक जीवन है, तब तक आस है,  चुनोतियो से जूझते रहो, खुद पर, और ऊपर वाले पेर भरोसा रखो, ओर जुआ खेलते रहो।

ये मेरे निजी विचार हैं, हो सकता है कि आप इससे सहमत न हो, यदि ऐसा है तो अपने विचार अवश्य दे।

 

विचारक

Mohindra Singh

(एम पी सिंह )

स्वरचित, अप्रकाशित

2 Apr 25

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!