हमारी अधूरी कहानी – आरती झा आद्या

नियति भोर में खिड़की पर खड़ी बिखरी ओस की बूँदें अपनी आँखों में समेट रही थी और सोच रही थी कि कल जिसे उसने मॉल में देखा, क्या वो विवेक ही था। सारी यादें चलचित्र की भाँति उसके सामने आ रही थी। क्या दिन थे वो भी, जब मिली थी विवेक से पहली बार। उसके विनम्रता पूर्ण व्यक्तिव से प्रभावित भी हुई थी, पर सोचा ना था कि वो इतना खास बन जाएगा उसके जीवन में और वो उसके जीवन में। क्या उम्र ही थी, स्नातक ही तो कर रही थी और विवेक की एक छोटी सी दुकान थी । 

इत्तफाक ही था दोनों का मिलना, अचानक मिलन की पहली शाम को याद कर उसके अधरों पर मुस्कान थिरक उठी। अपनी सहेली के लिए उपहार लेने गई थी और अपना दिल छोड़ आई वहाँ। विवेक और लड़कों से बिल्कुल अलग था, अपने काम के प्रति पूर्णतः समर्पित। कितनी बातें नियति के मानस पटल पर चलने लगी।ना कभी प्यार की बातें हुईं, ना मनुहार, ना कोई वादा। पल दो पल ही एक दूसरे को देख लेना और खुश हो लेना, शायद यही प्यार था। तभी तो भूल नहीं सकी उसे , कभी पराया नहीं लगा, घंटों अकेले में मन ही मन उससे बातें करना, कितना सुकून देना वाला रहा है।

इतने में उसके पतिदेव और बच्चे भी जग गए, उनके लिए चाय नाश्ता करा कर दोपहर का भोजन बना कर एक आशा लेकर फिर से मॉल गई। क्या पता विवेक ही हो और उसके बारे में जानने की जिज्ञासा खींच ले गई उसे। आश्चर्यमिश्रित खुशी नियति के चेहरे पर आ गई, जब उसने भी विवेक को उसका ही इंतजार करते देखा। कल विवेक ने भी देखा था उसे, पर कुछ कह नहीं सका।मॉल के रेस्तरां में साथ बैठ एक दूसरे की जिंदगी की सारी बातें जान लेना चाहते थे। बातों ही बातों में बहुत देर हो चुकी थी, दोनों की अपनी अपनी जिम्मेदारियाँ थी। कल मिलने का वादा कर दोनों जुदा हुए। 

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                        वक़्त गुजारे नहीं गुजर रहा था। वो वक्त भी आ गया, जिसमें मिलने की चाहत तो थी, पर मिलन की आस नहीं थी। एक दूसरे को देखने की चाह ने मिलने पर मजबूर कर दिया। आज के दिन जब मिले तो किसी की पलकें भी नहीं झपक रही थी। आगे की राह आसान करने के लिए एक दूसरे को आँखों में समा लेना चाहते थे क्यूँकि फिर मिलने का विचार नहीं था। दिल और दिमाग के लिए ना तब अजनबी थे, ना आज अजनबी हैं और ना ही दिल और दिमाग कभी अजनबी मानने देगा। इसी सोच ने कहा खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा,

दुआओं में बसेंगे, प्रार्थनाओं में ही एक दूसरे को देख खुश हो लेंगे।किसी की खुशियों की डोर ना टूटे इसलिए यही नियति मंजूर किया नियति और विवेक ने अपने लिए.. अपने अधूरे सपने के लिए। नियति और विवेक दोनों यही सोच मुस्कुरा उठे कि  हमारी अधूरी कहानी अधूरी रह जाए तो अच्छा है.. आँखों में बसी यही एक मूरत होगी। यही होता है शायद सच्चा प्यार, जो मर्यादित होता है, अपने लिए कुछ नहीं चाहता, केवल एक दूसरे के लिए खुशियाँ चाहता है और उन्हीं खुशियों में अपनी खुशी भी ढूंढ लेता है।

#मर्यादा 

आरती झा आद्या (स्वरचित व मौलिक)

दिल्ली

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