गुड नाइट डायरी – चाँदनी झा : Moral Stories in Hindi

“तुमने जो सूरज को लेकर अपने मन में “नफ़रत की दीवार” खड़ी कर ली है, क्या वो सही है? सूरज मेरा दोस्त बाद में बना, पहले वो तुम्हारा दोस्त है। तुमको मेरे और सूरज के रिश्ते में शक है? तो,…मुझसे भी नफ़रत होनी चाहिए। ये क्या दोहरापन है, उसको म्यूट कर रखा है, अनफ्रेंड कर दिया है, कॉल रिसीव नहीं करते हो,

इग्नोर करने लगे हो। और मन में उसके लिए ईर्ष्या और द्वेष की भावना इतनी हो गई है कि, तुम्हारे जीवन में जो असर हो रहा है, हो ही रहा है, हमारी ज़िंदगी को भी असमान्य कर रही है। हमारी शादी के इतने साल हो गए, अभी तक तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं हुआ है? और मुझपर भरोसा नहीं है? अपने दोस्त पर भी नहीं?

आखिर किस बात से तुमको लगा कि मेरा इंट्रेस्ट तुम्हारे अलावा सूरज में है? क्यों,…बस हाँ अकेली रहती हूँ, तो बात करता, अपनी बातें वो मुझसे भी करता, और मुझे भी दोस्त समझता। और मैंने भी तो कभी तुमसे नहीं छिपाया कि सूरज से मेरी बात होती है। तुमसे तो कुछ छुपा नहीं है मेरा, मोबाइल हो या कोई बात…जब हमदोनों के बीच कोई भी रहस्य नहीं है तो फिर ये शक का बीज कैसे उपजा तुम्हारे मन में?

और हाँ मुझे कभी कुछ खटकता, कि तुम्हारा झुकाव कहीं और है, या कहीं फ्लर्ट कर रहे हो, तो दूसरों से ज्यादा तुम पर गुस्सा आता। क्यों तुमने मुझे धोखे में रखा? या क्या अब मैं तुम्हें पहले की तरह आकर्षक नहीं लगती, या…. इफ, बट जो भी महसूस होता तुम्हारे लिए होता। क्योंकि, मुझे तुम पर यकीं है,

दूसरों से कोई उम्मीद ही नहीं है, तो फिर उससे कैसी नाराज़गी? और हाँ अपना ही सिक्का खोटा हो तो, बाज़ार जाकर क्या किया जा सकता है? राजीव ऐसे चुप मत रहो, मुझे जवाब चाहिए,…आखिर तुमने मुझे कैसे गलत समझा?” राजीव पर अचानक संगीता के इतने सारे सवाल एकसाथ वह समझ नहीं पा रहा था क्या कहे…?

?कैसे कहे, क्यों शक हुआ? कब हुआ? ये तो उसे भी समझ न आ रहा था। पर आजकल संगीता, हर बात में सूरज की बातें ज्यादा करती थी, या,….जब राजीव घर पर नहीं रहता, तब भी सूरज आता इसलिए? वह खुद सारी बातों को समझ नहीं पा रहा था। ये भी बात सच है कि शादी के इतने सालों में, अपने परिवार, बच्चे, पति के अलावा,…

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संगीता का इन्ट्रेस्ट दूसरों में बेवजह नहीं है। फिर आज…..शक या यों कहें, राजीव ने सीधे हमला कर दिया, संगीता के चरित्र पर, मुझे मुकेश से तेरा ऐसे हंस कर बात करना बिल्कुल पसंद नहीं है। वहां तक तो ठीक है, अपनी पत्नी संगीता से उखड़ा-उखड़ा रहने लगा। वो प्यार, वो उमंग जैसे कहीं खो गया। एक दो दिन से संगीता भी नोटिस कर रही थी,….

पूछा भी था राजीव कोई बात है क्या? खोए-खोए रहते हो, मुझसे खफ़ा हो? या कोई बात सता रही? तो मुझे बताओ। पर राजीव ना कहकर टाल देता। आज….अचानक से कह ही दिया, लगता है बहुत दिनों से मन में गुबार भरा था,…जो आज सूरज की कोई बात छिड़ी तो राजीव फट गया। संगीता आवाक रह गई। उसने प्यार से राजीव का हाथ थामा और अपने पास बैठाया, और कहने लगी,…..”क्या तुम सिर्फ़ मुझसे प्यार करते हो?” 

“नहीं, नहीं, सिर्फ तुमसे कैसे,अपने माता-पिता, अपने बच्चों से, कुछ दोस्तों से, कुछ सहकर्मियों से, मेरे प्यार की लिस्ट में कई लोग हैं। पर हर रिश्तों का अपना मान है। तुमसे जो रिश्ता है, वो सुकून है, माता-पिता के लिए सम्मान, बच्चों के लिए त्याग, और दोस्तों से खुशी।” संगीता ने राजीव के आँखों में आँखें डालकर बोली,…”मेरे प्यार को तब तुम कैसे देखते हो? मेरी ज़िंदगी में भी तुम्हारे अलावा कई लोग हैं ,जिसे मैं प्यार करती हूं,

या जो मुझसे प्यार करते हैं। मेरी मम्मी की मैं जान हूँ, भाइयों की अरमान, दोस्तों की शान, अपने बच्चों की दोस्त….हर रिश्तों में अलग मजा है, अलग मर्यादा है। प्यार का असली मतलब ही है,….खुशी। प्यार, आनंद का पर्याय है। और प्यार का कोई बंधन नहीं है, बस रिश्तों का मान रखना जरूरी है। और तुम…तुम तो मेरे पति हो, जीवनसाथी, दोस्त,

मेरे बच्चों का पिता, तुम्हारी तो मेरी ज़िंदगी में सबसे अलग स्थान है। तुम श्रृंगार हो, प्यार हो, खुशियां हो, दुनिया हो। क्या यार,…तुम्हारी जगह कोई ले ही नहीं सकता। फिर तुमने क्यों, हमारे वैवाहिक जीवन में किसी तीसरे की किसी भी प्रकार की कल्पना भी किया? और हाँ तुम मुझसे यही प्यार करते हो? या सूरज के साथ तुम्हारी दोस्ती की डोर इतनी कमजोर निकली।

मुश्किल समय में सभी दोस्तों में सिर्फ उसी ने हमारा साथ दिया था, और हर परेशानी में तुम्हारे ओंठो पर सिर्फ उसका ही नाम रहता था। मैं तो मजाक में कह भी देती थी, कि कहीं सूरज तुम्हारी गर्लफ्रेंड तो नहीं है। और तुम दोनों ताली देकर खूब हंसते थे। फिर अचानक से कैसे लगा, कि तुम्हारी पत्नी, और तुम्हारा दोस्त तुमको धोखा दे रहा है।” राजीव ध्यान से संगीता की बातें सुन रहा था, बोला….”मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता, मैं नहीं चाहता कि…..”वाक्य पूरा न कर सका राजीव।

संगीता ने कहा, “मन से मैल हटा कर खुली आँखों से देखो, ज़िंदगी की खुशियों। को महसूस करने की कोशिश करो। सूरज मुझसे कह रहा था, “दीदी आपके पतिदेव मेरा फोन रिसीव नहीं करते, मैसेज का भी जवाब नहीं देते कोई बात है क्या? कुछ गलती हो गई मुझसे क्या?” अब बताओ उसको असलियत पता चलेगी तो कितना बुरा लगेगा? तुम जानते हो वो मुझे अपनी बहन सा समझता है, फिर भी……?” संगीता थोड़ी अपसेट सी हो गई। राजीव ने संभालने की कोशिश किया। “सॉरी, न जाने कौन सा पल था, जो मेरे मन में ऐसा ख्याल आया, माफ़ कर दो मुझे।” 

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रिश्तों की इस खटास से दोनों बाहर तो निकल गए…पर बेगुनाह सूरज शायद अभी भी राजीव की नजरों में दोषी है, और…उसकी अपनी पत्नी संगीता उसके(राजीव) के साथ। आज रात संगीता, डायरी में लिख रही थी।…. कैसा, और कब, किससे प्यार होता? कहा तो नहीं जा सकता है,… 

 प्रेम तो कल्पना से भी खूबसूरत होता है। किसी रिश्तों में विश्वास की सबसे ज्यादा अहमियत है। और विश्वास….बनाने की जरूरत नहीं होती, रिश्तों में रहने से विश्वास भी मजबूत होता जाता है। शायद….यह कई पति-पत्नी की कहानी होगी, जो या तो पत्नी के दिल को ठेस पहुंचाती है, या प्यार पर सवाल उठाती है, या….जाने, अनजाने पुरुष प्रधानता समाज की असलियत दिखाती है। या…प्यार को बौना कर देता है। प्रेम, परवाह, दोस्ती, सबकुछ समय के साथ शायद बदलता जाता है।…

 आखिर जरूरत क्यों पड़ी, राजीव को मेरे अन्य किसी के साथ रिश्तों पर सवाल उठाने का? क्या सूरज को मैं जान नहीं पाई हूँ, या राजीव मुझे न समझ सका है? प्यार, रिश्ता, दोस्ती में उलझी मैं,…कुछ समझ नहीं पा रही हूँ। बाकी उलझन कल, गुड नाइट डायरी, कल मिलते हैं

तुम्हारी संगीत।…..

 संगीता, अपने पति,और बच्चों के साथ बिस्तर पर आ गई, उसके मन में बस यही चल रहा था,…प्यार और रिश्तों को कौन, कैसे देखता है? और नींद कोसों दूर थी। आज राजीव के सवाल उसे सोने नहीं दे रहे थे। समाज का कुछ दोहरापन, और उसके मन की उलझन उसको बेचैन कर रही थी। उसने खुद से कहा, कोई बात नहीं, संभलने में लगेगा कुछ दिन मुझे। पर नफ़रत की दीवार दोस्ती के बीच तो मैं मिटाकर रहूंगी, अपनी सच्चाई के साथ।

चाँदनी झा 

#नफरत की दीवार

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