गलती – भगवती सक्सेना गौड़

बड़े नाजो से पली शाम्भवी का विवाह तय हो गया था, पापा, मम्मी की इकलौती बिटिया बचपन से अपनी हर इच्छा पूरी करती आई थी। छोटे से कस्बे में आराम से दिन गुजर रहे थे, अर्थशास्त्र लेकर स्नातक की डिग्री भी ले चुकी। एक ही इच्छा मन की मन मे रह गयी, वो नौकरी करना चाहती थी, पर उसके पापा ने समाचारपत्र में देखकर रिश्ता तय कर दिया, उस दशक में यूँ ही शादी तय होती थी और उसके मम्मी, पापा बड़े प्रसन्न थे। धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ।

शाम्भवी बहू बनकर नए माहौल में अपने को व्यवस्थित करने की भरसक कोशिश कर रही थी। बचपन से उसने शांत  माहौल ही देखा था। पर ससुराल में सिर्फ ससुर जी को छोड़कर हर कोई गुस्सैल था। सास बड़े से कनस्तर से चावल निकाल रही थी, शाम्भवी ने कहा,” मम्मी जी, मैं सहायता करूं ?” 

जवाब मिला, “रहने दो, तुम्हारा पूरा मायका मिलकर भी ये भारी काम नही कर सकते।”

वो छोटा सा मुँह बनाकर रह गयी, क्योंकि जवाब देना उसके संस्कार में नही था।

देवर सतीश हैंड पाइप से पानी निकाल रहे थे, शाम्भवी बोली,” भैया लाइये मैं कोशिश करती हूं।”

जवाब मिला, “इसके लिए ताकत चाहिए, काहिल लोग नही कर सकते, बचपन से घी खाया है कभी।”

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तभी ननद जोर से चिल्लाई, “भाभी, ये पराठा है, या पापड़, आपकी मम्मी ने कुछ नही सिखाया।”

उसके आंसू निकलते थे पर बोल नही।

सिर्फ एक शख्स चुपचाप शाम्भवी के व्यवहार को पढ़ने के कोशिश में लगे थे। एक दिन ससुर जी बड़ी आत्मीयता से बोले , “बेटी, इस जहान में जो एक बार डरता है, उसे जीवन भर लोग नीचा दिखाते रहेंगे, अन्याय सहना भी एक गुनाह होता है, इस परिवार में मैंने हमेशा से ये गलती की, अब तुम्हे नही करने दूंगा। एक बार सबको जवाब दे दो, भविष्य में बोलने से डरेंगे।”

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर

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