क्या हुआ …आज सुबह-सुबह इतना मधुर संगीत क्यों चला दिया? अभी तो आठ भी नहीं बजे…
सुधीर का इतना ही कहना था कि रसोई में बरतनों की आवाज और तेज हो गई।
हो गई सुबह काली…
सुबह नहीं पापा, आज का पूरा दिन ही काला हो गया है। आज मम्मी की मीटिंग है, उन्हें आठ बजे तक निकलना था। कमला आंटी को जल्दी आने के लिए कहा था, और वो अभी तक नहीं आई।
अरे , ये तो बहुत गड़बड़ हो गई, चारू ने मुझे कल बताया तो था… चल जल्दी से अपने-अपने काम निबटा ले, वरना आज लंच भी नहीं मिलेगा।
मुझे तो कोई टेंशन नहीं हैं, मैं तो कैंटीन में खा लूंगा। पर आपकी चिंता जायज हैं।
आज बजट भी आना है, इसीलिए ऑफिस से हॉफ डे लिया था कि घर पर आराम से बैठकर सुनूंगा, पर सब बर्बाद हो गया…
आपको क्या हुआ…आप क्यूं बड़बड़ा रहे हो?
कुछ नहीं, मुझे क्या हुआ?
क्या आज भी कमला नहीं आई?
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मैं तुम्हारी कुछ मदद करूं…
बस आप तो रहने ही दो, मुझे पता नहीं कि बाप बेटे में क्या खिचड़ी पक रही हैं।
चिंता मत करो, लंच तैयार हो गया है, चाय भी बना दी हैं। चाय और न्यूजपेपर दोनों डाइनिंग टेबल पर है…
मैं तो बस कह रहा था कि…
डोर बेल बज रही है, पहले दरवाजा तो खोल दो।
कमला है…
कमला, आज फिर इतनी लेट, तेरा इंतजार करते-करते आधा काम तो मैंने ही निबटा दिया, तू तो कह रही थी कि बस मेरे बेटे की शादी हो जाए, बहू घर का काम संभाल लेगी, फिर मैं टाइम से आया करूंगी। बेटे की शादी को भी पांच महीने हो गए, पर तेरा टाइम अभी तक सही नहीं हुआ। मैने तो तुझे दो दिन पहले ही बता दिया था …तू फिर भी देर से आई है। “गर्मी का मौसम और ऑफिस जाने की जल्दी में चारु का दिमाग मौसम से भी तेज गरमा रहा था।”
चल, अब खड़ी-खडी मुँह क्या देख रही हैं, फटाफट काम निबटा, साढ़े आठ तो यहीं बज गये,आज फिर डांट खानी पड़ेगी।
सुधीर अखबार पढते-पढ़ते मुस्कुरा रहे थे, चारु जब यूँ बड़बड़ाती, तो उसे बड़ा मजा आता…
जी भर कर हँस लो मुझ पर, तुम्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ता, वैसे भी महाशय की हफ्ते में दो दिन की छुट्टी रहती हैं, हमें तो सातों दिन फुल ऑन काम करना पड़ता हैं। और आज हॉफ डे लिया है, वो अलग…
मैं तो कब से कह रहा हूँ, तुम जाओ, मैं सब मैनेज कर लूंगा, पर तुम्हें तो मुझ पर विश्वास ही नहीं हैं।
इधर चारु ऑफिस गयी तो कमला शुरू हो गयी…
बाबूजी, मेरी तो किस्मत ही खराब हैं, ब्याह करके घर आयी तो पति शराबी निकला, फिर भी कमा कर घर लाता तो दो जून की रोटी मिल जाती, पर यों लल्ला तो कुछ करना ही नहीं चाहता, पढ़ाने की भी बहुत कोशिश की, पर पढ़के ही नही दिया…अब आप बताओ, मैं क्या करूँ…घर का सारा काम निबटा कर ही तो आ पाऊँगी, महारानी से तो कोई काम होता नहीं। भागी-भागी यहां आती हूँ, फिर शाम तक कभी इस घर तो कभी उस घर, आज नींद थोड़ी देर से खुली तो सारा हिसाब बिगड़ गया।
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सुधीर ने जब उसकी किसी बात का जवाब नही दिया तो कमला भी चुप लगा गयी और काम निबटाने लगी।
चारु सही कहती हैं, इनके रोज-रोज के नाटक हैं देर से आने के, अपनी जरूरत होगी तो सब सही और अगर इनसे एक और काम करने को कह दो , तो हज़ार बहाने है सामने…इन पर दया दिखाने का कोई फायदा नही, क्योंकि ये इसे हमारी कमजोरी समझते हैं।
अगले दिन सुबह सात बजे, डोरबेल बजी। आज इतनी जल्दी कौन आ गया?, “अलसायी हुई चारु ने दरवाजा खोला”
कमला तू… आज तो तुझे दस बजे आना था। तेरी लड़की नहीं आई क्या…तेरा भी अलग ही हिसाब है, कल जल्दी आने को कहा था, तो देर से आई। और आज खुद देर से आने के लिए कह रही थी, तो इतनी जल्दी आ गई।
अब क्या बताऊँ बीबी जी, वो तो तैयार थी, फोन पे कह रही थी कि कल शाम तक आ जायेगी, वो स्कूल में पढ़ाती हैं ना, राखी बाँध कर तड़के सवेरे अपने घर चली जायेगी, उसकी भी दो-दो ननद हैं, वो भी तो अपने भैया के राखी बांधेगी।
तो फिर क्या हुआ…
होता क्या, इस मुए ने मना कर दिया, फ़ोन पे कह दिया,” हम तो देहरादून जा रहे है, तू मत आ…फिर कभी बाँध लियो राखी” अब तुम ही बताओ, जब कोई मुँह पे ही मना कर दे तो कोई कैसे आवेगा…
बेटी ने तो कहा भी, “भैया, मैं तो पहले दिन आ रही हूँ, तू सुबह सवेरे निकल जाइयो, दोनों का त्योहार हो जाएगा”, पर बहू ने मना कर दिया। “बहुत भीड़ रहेवे हैं, उस दिन ना जा पाएंगे, इसीलिए एक दिन पहले जा रहे हैं।”
इसीलिए तो कल आने में देर हो गई। आपको भी किस मुंह से बताती, घर में खूब शोर मचा…
तुमने समझाया नहीं उन दोनों को, “चारु ने आश्चर्य से कहा”
अब क्या समझाती दोनों को, दोनों ने ही तो मिली भगत करके सब बातें रची थी…. बेचारी लड़की का त्यौहार अधूरा रह गया। दो दिन पहले फ़ोन आया था तो बड़ी खुश थी कि माँ मैने भाभी के लिए चूड़ी और बिछुवे खरीदे हैं, बड़े ही सुंदर लग रहे हैं और भैया के लिए भी कुछ लिया है, पर तुम्हे न बताऊँगी, तुम उसे बता कर सारा मज़ा किरकिरा कर दोगी, अब किस मुँह से उसे दिलासा दूँ, “कहते हुए कमला रोने लगी।”
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अरे…अरे रोओ मत, सब सही हो जाएगा,एक दिन तुम्हारे बेटे को सब समझ आएगी। ये रिश्ते इतने हल्के थोड़े ही होते है, जो जरा सी ठसक लगने से टूट जाएंगे…मैं पानी लाती हूँ।
अब कछु ना सही होने का बीबी जी, मैंने उससे कहा था, तेरी एक ही बहन हैं, क्यों उसका जी दुखा रहा है, रुक जा….उसका भी त्यौहार पूरा हो जावेगा, खुश हो जाएगी।
पलट के उसने जवाब दिया,”मेरे पास रुपये ना है, रक्षाबंधन पर उसे देने को, जब होंगे तब बुला लूंगा, तभी राखी बांध लेगी।”
एकदम से चुप लगा गयी मैं, मुंह से एक शब्द भी ना बोल निकला उसके आगे… अरे वो क्या रुपये पैसे के लिए आ रही थी, तेरी ही शुभ बनाने के लिए आ रही थी। जब रिश्तों के बीच पैसा दरार का काम करने लगता हैं तो कोई भी चीज उस दरार को भर नहीं सकती। तीन दिन से रोज बाजार हाट जाके बहू अपनी भाभी के लिए पाज़ेब और बहन के लिए सूट लायी थी, उसके लिए पैसे कहाँ से आये…जब अपनी कोख से जन्मा ही ऐसी परायों जैसी बात करें तो गैरों से क्या कहती…
खाली घर काटने को दौड़ रहा था। रह रह कर बेटी की बातें याद आ रही थी। ना मां से निभा पाया और ना ही बहन से जोड़ पाया।
दिल छोटा मत कर…आज नहीं तो कल अकल आ जायेगी।
जिसे साथ निभाना हो, वो रिश्तों के बीच रूपया पैसा ना लाता…छोड़ो बीबी जी, कब तक इन बातों को सोच-सोच के दिल जलाती रहूँगी, अब तो पैसा ही सब कुछ हो गया हैं, रिश्तों का इस जग में कोई मोल नहीं…
मैं जहाँ बैठी थी, वहीं जम के रह गयी, बरसों से जिस ज़ख्म को अपने सीने में दबा कर रखा था, आज अनजाने में कमला उसके पुराने घाव कुरेद कर चली गयी। मैं भी तो कभी इस दौर से गुजरी थी …जब रुपये के आगे बहन का रिश्ता बौना पड़ गया था।
शायद सुधीर ने सारी बातें सुन ली थी, इसीलिए वो मुझे सांत्वना देने के लिए आ गए, पर अब नही रोऊँगी। अब आंसुओं की मेरी आंखों में कोई जगह नहीं …कब तक उन रिश्तों के मरने का गम बनाती रहूंगी। उन घावों को दफ़न करना ही सही था, जो तिल-तिल मारकर मुझे राख बनाते जा रहे थे…कमला सही कहती हैं, “जिन्हें रिश्तों की कद्र नहीं, उनके लिए आँसू बहाना बेकार है, अगर एक रिश्ता मैंने खोया है तो एक रिश्ता वो भी तो खो रहा हैं।”
बहुत दिनों से चारू के मन में जो फांस चुभी हुई थी, आज वो भी निकल गई।
स्वरचित कहानी एवम मौलिक भाव
अपर्णा गर्ग