कहानी के पिछले भाग के अंत में आपने पढ़ा के, अंगद की मां आकर अंगद को सुरैया की बेरुखी का कारण बताती है.. पर फिर भी सुरैया इस रिश्ते को मना कर देती है..
अब आगे..
अंगद की मां: अब क्या हुआ सुरैया..? मेरे मना करने पर ही तुम यह नाटक कर रही थी… पर अब जब मैं ही अपनी स्वीकृति दे रही हूं… फिर यह ना किसलिए..?
सुरैया: माफ कीजिएगा काकी..! छोटी मुंह बड़ी बात होगी… आपको यह रिश्ता इसलिए मंजूर नहीं था, क्योंकि मेरे साथ बलात्कार हुआ था… या फिर मैं कभी पागल थी.. और सर जी को मेरे साथ शादी अपने काम के वजह से करना पड़ा… इन सब में बस आप लोगों की तरस और दया ही दिख रही है मुझ पर… इंसान अपने कर्मों का बोझ तो सारी उम्र ढो सकता है… पर एहसान का बोझ, ढो नहीं सकता… मैंने सर जी को खुद फोन पर आप से बात करते सुना था कि, उन्हें यह रिश्ता प्यार की वजह से आगे नहीं बढ़ाना… बल्कि लगाव के लिए होगा.. अगर हम एक जानवर के साथ भी ज्यादा दिन रहते हैं, तो उससे भी लगाव हो जाता है.. पर इसका मतलब यह नहीं कि हम उससे शादी के बंधन में ही बंध जाए… शादी जैसे पवित्र बंधन में प्यार का स्थान सबसे बड़ा होता है और यहां उसी पर संदेह है..
अंगद की मां: नहीं सुरैया..! ऐसा नहीं है… यह तुमसे दिल से प्यार करता है… मैं मां हूं इसकी, यह जितना अपने बारे में नहीं जानता, उतना मैं जानती हूं इसके बारे में… तुम मुझ पर विश्वास कर सकती हो..
अंगद: बस मां…! चलिए अब यहां से… इसे बहुत घमंड है अपने आप पर… रहे अकेली… मैं भी कोई मरा नहीं जा रहा इसके बिना… तब से बस तरस और एहसान लगा रखा है.. कह तो रहा हूं प्यार है… पर प्यार में पीएचडी तो इसी ने कर रखी है.. हम सब तो अनपढ़ गवार हैं…
यह कहकर अंगद और उसकी मां वहां से चले जाते हैं… जहां अंगद की मां सुरैया की बातों से हैरान थी, वही अंगद सुरैया की बातों के कारण गुस्से से उबल रहा था… उसका मन तो कर रहा था कि जाकर सुरैया से पूछे कि, क्या देखकर उसने मेरे प्यार पर शक किया..?
मां: बेटा..! तू बेकार में ही गुस्सा कर रहा है उस पर… जब तू उसके बातों को शांति में बैठकर सोचेगा, तो तुझे उसकी हर एक बात सही लगेगी और समझ में भी आएगी…
अंगद: मां..! आप अभी भी उसकी ही तरफदारी कर रही है…?
मां: हां..! मुझे आज उसकी बात सुनकर यकीन ही नहीं हो रहा है, कि उसकी सोच इतनी गहरी हो सकती है.. जबकि उम्र भी उसकी उतनी नहीं है.. बेटा..! अब तो यही मेरी बहू बनेगी..
अंगद: मां..! आप यह सब क्या कह रही हैं..? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा…
मां: बेटा..! तेरी और सुरैया की शादी किस हालत में हुई, यह सभी को पता है… पर तेरे और उसके प्यार के बारे में किसी को नहीं पता… तो दुनिया को लगेगा, तुमने पहले भी तरस खाकर उससे शादी की थी और अब एहसान करके उसी शादी को निभा रहे हो… कहां है इन सब में प्यार..? मतलब प्यार है,पर शादी की तरह, यह भी तो दुनिया को दिखनी चाहिए ना..?
अंगद: मां..! आप सच कह रही थी, आप औरतों को समझना हमारे बस में कहां..? प्लीज मम्मी…! पहेली मत बुझाइए, सीधे-सीधे बताइए… ऐसे ही जान निकली जा रही है…
मां: सुन बेटा..! जैसा मैं कह रही हूं, वैसे ही करते जाना… फिर देखती हूं कैसे मना करती है सुरैया..?
अगले दिन सुरैया के घर के बाहर एक छोटा सा पंडाल बनकर तैयार था… सुरैया हैरान जब अपने घर से बाहर निकलती है, तो वह देखती है सारे कस्बे के लोग वहां इकट्ठा है… इतने में अंगद वहां आकर कहता है.. गांव वालों..! आज से कुछ दिनो पहले मैंने सुरैया से शादी की थी… जिसमें कोई भी शामिल नहीं हो पाया था, क्योंकि सब कुछ जल्दी में हो गया था… मैं तो यहां आप लोगों को आजादी दिलाने आया था और मेरा वह काम हो गया और अब मैं अपने घर वापस लौट जाऊंगा… तो सोचा अब मेरी शादी में आप लोगों का आशीर्वाद तो मिला नहीं और सुरैया अपने ससुराल बिना अपने मायके वालों के आशीर्वाद के कैसे जाएगी…? बस इसलिए आज मैं सुरैया के साथ फिर से शादी करूंगा.. वह भी आप लोगों की मौजूदगी में.. तो कहिए मिलेगा ना हमें आशीर्वाद..?
सभी कस्बे वाले: आप तो हमारे मसीहा है और अब जमाई भी.? हम तो इस शादी में आशीर्वाद भी देंगे और नाचेंगे भी…
फिर अंगद सुरैया के पास जाकर कहता है… लो अब बाराती भी तैयार है और साराती भी… अब तो मना करने की कोई गुंजाइश ही नहीं है… कर दिया ऐलान अपनी शादी का और अपने प्यार का भी… अब तो कोई दिक्कत नहीं है ना..?
सुरैया: मेरे इतना घुमा फिरा कर कहने पर भी, आप मेरी बात समझ गए… इतना दिमाग भी नहीं है आपके पास… जरूर यह काकी की बुद्धिमानी का नतीजा है…
अंगद: फिर एक पुलिस अफसर के बुद्धिमानी पर सवाल..?
सुरैया: होंगे अफसर आप… पर औरतों के दिल को स्वयं भगवान नहीं पढ़ पाए, जिन्होंने उन्हें बनाया… फिर आप तो ठहरे इंसान… ओह नहीं, पुलिस अफसर..!
फिर दोनों हँस पड़ते हैं… उनकी शादी फिर से सभी के सामने हो जाती है… और अंगद अब सुरैया के साथ थोड़ा एकांत चाह रहा था… पर सुरैया भीड़ से निकल ही नहीं पा रही थी… अंगद गुस्से में वहां से थोड़ी दूर एक पेड़ के नीचे चुपचाप बैठ जाता है…सुरैया वहां जाकर सीधे अंगद के पैरों को स्पर्श कर बैठ जाती है…
अंगद: यह क्या कर रही हो सुरैया..?
सुरैया: मेरे देवता के पैर छू रही हूं… आप नाराज मत होइए.. आप नहीं जानते, ते आपकी नाराजगी को मैं कैसे बर्दाश्त करती हूं..?
अंगद: तुमसे मैं नाराज नहीं हूं… वह तो बस मैं तुमसे अकेले में थोड़ा वक्त चाह रहा था और तुम मेरे पांव कभी मत छुना… क्योंकि तुम्हारी जगह मेरे दिल में है..
सुरैया: अरे वाह..! बाराती भी आप खुद ही जुटाए और जो उनके बीच फस जाऊं, तो नाराज भी आप खुद ही हो जाएं.. यह अच्छा है…
अंगद सुरैया के होठों पर अपने हाथ रख कर कहता है… बस करो..! अब इधर उधर की बातें नहीं, प्यार की बातें करना है मुझे… बहुत तड़पाया है तुमने मुझे और जलाया भी… उन सभी का बदला गिन गिन कर लेना है…
सुरैया शर्मा जाती है और अंगद की बाहों में सिमट जाती है…
एक लंबी दर्द की दास्तान..,
आज मोहब्बत की आगोश में समाप्त हुई…
दोनों तन और मन से एक दूसरे के प्रेम में सराबोर हुए..,
और जहां एहसान नहीं, बस प्रेम भावना ही पर्याप्त हुई…
प्रिया पाठको… यह कहानी यहीं समाप्त होती है, आप लोगों को शुक्रिया मेरे साथ बने रहने के लिए… मैंने यह कहानी थोड़ी अलग लिखी है… आप लोगों को कैसी लगी जरूर बताना… मैं बहुत जल्द ही मिलूंगी एक नई कहानी के साथ… इसी वादे के साथ आज विदा लेती हूं..
धन्यवाद🙏🏻🙂