*जहाँ चाह, वहाँ राह* – सरला मेहता

” माँ ! तुम क्यों चली गई, हम सबको छोड़कर। दादी भी थक जाती है, दादू की सेवा टहल करते। पापा हम सबके ख़ातिर नई  बिंदु माँ ले आए हैं। पर उन्हें अपनी बेटी कुहू से ही फ़ुर्सत नहीं। तुम्हीं बताओं मैं क्या करूँ ? ” यूँ ही माँ से अपना दुखड़ा सुनाते कुणाल सो … Read more

पराया धन – बालेश्वर गुप्ता

बाय बाय – माइ सन- अपने ही घर के दरवाजे से अपने अपंग बेटे को अपनी पीठ पर लादे राजेश हाथ हिलाकर अपने दूसरे बेटे से सदा के लिए विदा ले रहा था. पर सामने तो कोई था ही नही, बेटा तो अपनी पत्नि और बच्चो के साथ घर के अंदर था, उसे  अपने 76 … Read more

जन्म-कुंडली  – सीमा वर्मा

हर माँ का यह सपना होता है कि वह अपनी नाजों से पाली बेटी का सोलह श्रृंगार करके उसे अपने जीवनसाथी के साथ विदा करे। लिहाजा मैं भी इसकी अपवाद नहीं हूँ। ‘अनुराधा’ हमारी अर्थात मेरे और ‘अनुज वर्मा ‘ की इकलौती बिटिया है। वह दिखने में जितनी खुशनुमा है। बुद्धि कौशल में उससे भी … Read more

विश्वास – पुष्पा पाण्डेय

बीरा के इंतजार में कुसुम अभी तक स्नान-पूजा भी नहीं कर पायी थी। रोज सात बजे तक बीरा आ जाती थी। दस बज चुके। वैसे भी दो दिन से कुसुम सिर दर्द  से परेशान थी। इंतजार करते-करते जुठे बर्तन भी धूल चुके। अब झाडू उठाने ही वाली थी कि दरवाजे की घंटी बजी। ” अरे … Read more

साँवली सलोनी -लक्ष्मी कुमावत 

“आहा! मेरी बड़ी बहन की बहु तो कितनी गोरी आई है। मैं भी अपने सुमित की जब शादी करूंगी तो ऐसी ही गोरी बहू लेकर आऊंगी, जिसका रंग दूध जैसा उजला हो” ” अरे तुम भी क्या बात लेकर बैठ गई? जब से अपनी बहन के घर से आई हो, तब से बस ‘गोरी बहू, … Read more

आर्ट – मीनाक्षी सौरभ  

“यार, तुम ना पराँठे कितने करारे कर देती हो। जल्दीबाज़ी बहुत करती हो, गैस को तेज़ मत रखा करो। मीडियम पर सिकते हैं पराँठे और पकौड़े तो।” नीरजा कुछ न बोली बस चुपचाप गैस की ऑंच मीडियम कर दी। “सब्ज़ियों में तड़का मारो, तब मसालों की ख़ुशबू आएगी और हाँ, मसालों को थोड़ी देर तेल … Read more

मां तो कूड़ा नहीं – ननु नरेंद्र

 दो दिन से पत्नी के साथ घर की सफाई करा रहा हूं. इधर उधर जहां देखो कूड़ा ही कूड़ा. दो बड़े बैग भरकर कल फेंके. दो आज भर गए.सारा का सारा पिछले साल खुद ही खरीदा  था और दीवाली  निबटते ही फिर कूड़ा खरीदना चालू हो जाएगा. सही बात है कि कूड़ा हम खुद ही … Read more

परख अपनों की – मंगला श्रीवास्तव 

 अपने ही घर मे चार बेटें और बहुओं के बीच रहते हुएं भी सविता देवी आज अकेली पड़ गयी थी।अपने कठोर व्यवहार और रूढ़िवादिता के कारण। उस पर से उनकी एक आदत दुसरों की बातों में आना।    वह अक्सर परिवार और अपने अड़ोसी पड़ोसी से घर की बाते करती और फिर वह लोग भी बाते … Read more

तलाक़ रोग नहीं है – के कामेश्वरी

उमादेवी की दो लड़कियाँ थीं । वह कॉलेज में इंग्लिश लेक्चरर थी । उसके पति विजय जूनियर कॉलेज में प्रिंसिपल थे । बड़ी लड़की अनु ने भी इंग्लिश में रिसर्च किया । छोटी बेटी अरुणा ने एम बी ए किया और कॉलेज में ही नौकरी करने लगी । माता-पिता को अब बच्चों के लिए रिश्ते … Read more

हिसाब – गरिमा जैन

बात उन दिनों की है जब मैं अपनी बहन पिंकी की नंद की शादी में गई थी। सबके लिए महीनों से तोहफे ले रखे थे मैंने अपनी बहन के लिए बहुत सुंदर सा मोतियों का हार लिया था और उससे मेल खाती एक सुंदर सी साड़ी। उसकी सास उसकी नंद के लिए भी बहुत सुंदर … Read more

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