बुढ़ापा तो सबको आता है – बिमला रावत जड़धारी

जब मैं छोटा था तो हर गर्मियों की छुट्टियों में अपने पिताजी के साथ गाॅंव जाता था। कभी-कभी किसी गर्मियों की छुट्टी में

मम्मी भी जाया करती थी। मम्मी को गाॅंव बिल्कुल भी पसंद नहीं था। बस वह पिताजी का मन रखने के लिए चली जाती

थी। पिताजी पूरे साल ऑफिस से छुट्टी नहीं लेते थे, अगर बहुत जरूरी हुआ तभी लेते थे। लेकिन जब मेरी गर्मियों की छुट्टी

होती तब पिताजी अपने ऑफिस से पंद्रह – बीस दिन की छुट्टी लेते थे। फिर हमें गाॅंव लेकर जाते थे।पिताजी गाॅंव आ कर

बिल्कुल बच्चे बन जाते थे। पूरा परिवार एक साथ रहता था मेरे दादा जी सबसे बड़े, उनसे छोटे दो भाई, फिर उन के बच्चे,

और फिर हम उन के बच्चे। वहाॅं सबका अपना – अपना ग्रुप होता था। दादा जी उनके भाई और गाॅंव के जो उनके हम उम्र सब

एक साथ बैठकर हुक्का पीते और गप्पे मारते ,दूसरी और एक बहुत ही बड़ा पीपल का पेड़ उसके छांव में पिताजी , पिताजी

के चाचा जी के बच्चे गांव के और सभी रिश्तेदार बैठ कर बातें करते। पिताजी तो भूल ही जाते कि मैं भी हूॅं। हम बच्चों का

अपना ग्रुप था। हम सब बच्चे अपने ग्रुप में खेलते, खूब मस्ती करते, कोई रोक – टोक नहीं। शाम होते ही सब अपने – अपने

घर चले जाते। हम सब भी घर आ जाते। सारा परिवार साथ ही रहता, साथ ही बैठकर खाना खाते। खाना खा कर सब बड़े

लोग अपने – अपने कमरे में चलें जाते और हम सब बच्चे एक ही कमरे में सोते। या फिर यूँ बोलो कि रात भर गप्पे मारते।

इस तरह दिन और रात का पता ही नहीं चलाता। कब छुट्टियाँ खत्म हो जाती पता ही नहीं चलता।मुझे कभी महसूस ही नहीं

हुआ कि मेरे पिताजी अपने माँ बाबा के इकलौते बेटे हैं। गाँव में हमारा संयुक्त परिवार था। खाना भी साथ बनाते और साथ

ही खाते। पूरा परिवार बड़े प्यार से रहता था।जैसे -जैसे मैं बड़ा होता गया, अब मेरा गाॅंव जाना कम हो गया। पर पिताजी

हमेशा गाॅंव जरूर जाते। मुझे याद है जब मैं आखिरी बार गाॅंव गया तब पिताजी ने दादा दादी जी से कहा था माॅं बाबा अब

आप लोग मेरे साथ शहर चलो, वहीं मेरे साथ रहना। यहाॅं आप लोग अकेले रहते हो। मुझे हमेशा आप लोगों की चिंता रहती

है।दादा जी बोले,;अरे बेटा बुढ़ापा ही तो आया है, कोई आफत नहीं आयी। हम यहाॅं अपनों के बीच है। हमारी चिंता मत

किया करो, हमारा तो बचपन और जवानी अपनों के बीच मजे से गुजर गयी, बुढ़ापा भी गुजर जाएगा। ये बुढ़ापा तो सब में

आना है। मैं तुम्हें एक सलाह देना चाहूॅंगा, तुमने जवानी तो शहर में गुजर दी। अगर बुढ़ापा अच्छे से गुजारना चाहते हो तो

जहॉं तुम्हें खुशी मिलें वहाॅं चलें जाना या फिर अपनों के बीच यहाँ आ जाना। तुम्हें कभी बुढ़ापे का एहसास ही नहीं होगा।

और तुम्हारा भी एक ही बेटा है, वह अपनों के बीच रहेगा तो उसे भी रिश्तों की पहचान होगी। तभी वह रिश्तों की कद्र

करना सिखेगा। बुढ़ापा तो सबमें एक दिन आना ही है।अब पिताजी रिटायर हो गए हैं। मम्मी को गुजरे तीन साल हो गए।

मैं और मेरी पत्नी दोनों ही नौकरी वाले हैं। मेरे दोनों बच्चे, बेटी रिया और बेटा रियश, दोनों ही स्कूल चले जाते हैं।

पिताजी घर में अकेले बोर हो जाते और वो हमेशा गाॅंव जाने की जिद्द करते, कहते मैं अपने आप ही चला जाऊॅंगा, मैं अभी

इतना बुढ़ा भी नहीं हुआ हूॅं। परन्तु हम कहते यहाॅं आप अपनी उम्र के लोगों के साथ घूमों, या कलब जाॅईन कर लो। वह कुछ

नहीं कहते।एक दिन मैं और पिताजी बैठे बातें कर रहे थे। तभी मेरी बेटी रिया और रियश दोनों खेल कर आए और पूछने

लगे पापा कजिन क्या होता है? हमारी जो फ्रेंड सिया है वह हमारे साथ खेलने नहीं आयी, कहे रही थी कि हमारे घर

कजिन आए हैं हम उनके साथ खेलेंगे। मैंने कुछ नहीं बोला। पापा मेरी तरफ देखने लगे और बच्चों को बोला, जब तुम्हारी

स्कूल की छुट्टियां होंगी, तब हम भी तुम्हारे कजिन के पास गाॅंव चलेंगे। चलों अभी अपनी पढ़ाई करो।मैंने पापा से कहा

पापा ये आप क्या बोल रहे हो, गाॅंव में बच्चें कैसे रह पाएंगे और अब तो वहॉं कोई रहता भी नहीं है।बेटा कैसे नहीं रहते,

तुम्हारे चाचा लोग वहीं रहते हैं। उनके बच्चे हर गर्मियों की छुट्टी में गाॅंव आते हैं, जैसे तुम जाते थे। बेटा जो सवाल आज

तुम्हारे बच्चों ने तुम से पूछा कभी तुम ने क्यों नहीं पूछा? क्योंकि तुम उन रिश्तों के बीच रहे हो इसलिए। बेटा तुम्हें याद है

एक बार तुम्हारे दादा जी ने कहा था, बच्चे अगर अपनों के बीच रहेंगे तभी उन्हें रिश्ते की पहचान होगी और रिश्तों की कद्र

करना सिखेंगा।हाॅं पिताजी, और कहा था बुढ़ापा अच्छे से गुजरना चाहते हो तो जहॉं तुम्हें खुशी मिले वहाॅं चले जाना

क्योंकि बुढ़ापा तो सबमें आता है।;हा हा हा दोनों जोर से हंस पड़े।ठीक है पिताजी। अब से गर्मियों की छुट्टी गाॅंव में।

क्योंकि बुढ़ापा तो मुझ में भी आना है। 

बिमला रावत जड़धारी

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