अरे पापा आपने अभी तक नहाया नहीं, नहा लूगां बेटा तुम लोग चले जाओ तो फिर नहा लेगे। अच्छा ये बताओ कि तुम लोग तो रात की ट्रेन से जा रहे थे, ये अचानक से दिन की र्टेन क्यों ले ली। वो पापा रात मे परेशानी होगी।
हंसते हुए राजेन्द्र जी बोले अरे बेटा अभी तो तुम लोग जवान हो अभी से क्या परेशानी। रात के सफर मे तो बुढापे में परेशानी होती है तुम जवानों को थोड़ी न। नहीं पापा बुढापे का भी ख्याल रखना पड़ता है। जाइये जल्दी से नहा लिजिए और तैयार हो जाइये हम लोग अकेले नहीं जा रहे है आप भी साथ चल रहे है। अरे क्या नहीं बेटा तुम लोगों के मौज मस्ती मे खलल पडेगा।
(हलांकि राजेन्द्र जी का मन कदर से जाने को कर रहा था। ) हम बुढे को साथ लिए लिए कहाँ कहाँ घूमोगे। बहू को अच्छा नहीं लगेगा। अरे नहीं पापा हम सबको अच्छा लगेगा आप यहाँ पर अकेले नहीं रहेगे।
मुझे पता है आप अकेले नहीं रह पाते है। राजेन्द्र जी मन ही मन खुश हो रहे थे। वो वहां अकेले रहने से डर रहे थे। कई दिनों से उनको यही बात परेशान कर रही थी कि बहू बेटा तो घूमने जा रहे है और मै पांच दिन अकेला घर पर कैसे रहूँगा। कभी अकेला रहा नहीं हूँ, मै शुरू से ही अकेले रहने से बहुत घबराता था।
घर मे पत्नी भी कुछ देर के लिए मंदिर या किसी के घर चली जाती थी तो राजेन्द्र जी परेशान हो जाते थे। पत्नी जया के घर आने पर कहते देखो इतनी देर के लिए तुम कहीं नहीं जाया करो मेरा घर में अकेले जी नहीं लगता। जया जी समझाती अरे ऐसे कैसे चलेगा। आप कोई बच्चे थोडे ही है जो अकेले घबराते है। जाना आना तो पड़ता ही है।
अब क्या मै कभी कहीं जाऊँ नहीं। अब मै कितने दिन से कह रही हूँ कि मेरे भाई की तबियत ठीक नहीं है जाने दे उससे मिलने, लेकिन आप है कि मुझे जाने ही नहीं देते।
न साथ चलते है न मुझे जाने देते है। साथ मे इसलिए नही चलते है कि मेरे मायके में पुराने तरीके सा रहन सहन हे। आपकी सुविधा नुसार नहीं है। और मुझे इस लिए नहीं जाने देते कि मै अकेला नहीं रहूगां।
जया जी और राजेन्द्र जी के एक इकलौता बेटा था अजय। वो घर से बाहर नौकरी करता है। अजय हैदराबाद मे नौकरी करता था और पत्नी दीपिका के साथ रहता था।
जया जी और राजेन्द्र जी अपने गृहनगर मे रहते थे। दोनों का बहुत खुशहाल जिन्दगी थी। हंसी खुशी से समय वयतीत हो रहा था। लेकिन एक दिन अचानक से हार्टअटैक से जया जी इस दुनिया से चल बसी। अब तो जीवन जीना राजेन्द्र जी के लिए बहुत मुश्किल हो गया। कहाँ कुछ घटें भी वो जया जी के बिना नहीं रह पाते थे। वही अब हमेशा के लिए साथ छूट गया था।
अब मजबूरन राजेन्द्र जी को अपना घर छोड़कर बहू बेटे के पास आना पडा। क्योंकि अपने घर पर वो अकेले रहकर अपना ध्यान नही रख पा रहे थे और बीमार हो गए थे। बेटा जाकर फिर पापा को अपने साथ अपने घर पर ले आया। अब अपना घर छोड़कर बेटे के पास आ तो गए थे लेकिन यहाँ भी वही अकेला पन था। बहू बेटा दोनों नौकरी करते थे उनके पास समय ही न था पापा के पास बैठने को। बेचारे बस घर मे अकेले पडे रहते थे बस इतना था कि घर मे कोई है आते जाते कोई दीखता रहता है। सब काम को नौकर लगे थे खाओ पीओ और बस पडे रहो। अक्सर बहू बेटा पार्टी मे भी जाते थे बाहर खाने पीने भी जाते थे। जब भी बेटा अजय पत्नी दीपीका से साथ पापा को भी ले चलने को कहता तो दिपिका कह देती अरे वो क्या बुढापे मे बाहर खाने पीने जाएगें उन्हें घर पर ही रहने दो। कभी कभार राजेन्द्र जी का मन होता था कि वो भी बाहर जाए पर बेटा बहू पूछते ही न थे। बेचारे मन मसोस कर रह जाते थे।
आज अजय और दिपिका किसी रेस्टोरेंट मे खाना खाने गए थे तो वहाँ अजय का एक दोस्त टकरा गया। जो अपने बूढ़े माता पिता को लेकर आया था। अजय ने पहले तो दोस्त अनूप के माता पिता को प्रणाम किया फिर उत्सुकता वश अनूप से पूछ लिया अरे बुजुर्ग माता पिता को बाहर खिलाने ले आए हो, तो क्या हुआ यार माता पिता है हमारे उनका भी मन करता है बाहर खाने पीने का। भले ही वे ये आजकल की आधुनिक चीजे न खाए लेकिन वो जो खाए वही खिला देगे। आखिर जब हम लोग छोटे थे तब इन माता पिता ने भी तो हमारे लिए कितना कुछ किया है। बुढापा तो एक दिन सबका आना है। मै भी एक दिन बूढा होऊगां और फिर हमारे बच्चे हम लोगो को ऐसे छोडकर बाहर चले जाएगें तो हमे कितना बुरा लगेगा। इसलिए उनकी जगह अपने को रखकर देखो। फिर हम जो करेगे वही तो हमारे बच्चे भी सीखेगे। और अगले महीने तो हम लोग मम्मी पापा को लेकर रामेश्वरम जा रहे है। अरे इतना सब कुछ मैनेज कर लोगे यार तुम अजय बोला। हाँ हाँ क्यों नहीं मम्मी पापा चल फिर तो लेते ही है बहुत जयादा न सही कम ही सही। जहाँ चार दिन का टूर होगा वहाँ दो दिन और जयादा लग जाएगा। तो क्या फर्क पड़ता है।
घर आकर अजय अनूप की बातो को सोचता रहा कितने अच्छे विचार है अनूप के आखिर माँ बाप है हमारे जब हम बच्चे थे तो कितना कुछ किया हमारे लिए लेकिन अब जब बूढ़े हो गए है तो हम लोगो को भी तो उनके लिए सोचना चाहिए।
अजय को याद आया मम्मी थी तब पापा कितनी बार कह चुके थे कि एक बार वैष्णो देवी दर्शन को जाना है लेकिन अजय ने कभी ध्यान ही नहीं दिया अपने मे ही मस्त रहा। अजय सोचने लगा अब मम्मी नहीं है तो अब पापा को ही वैष्णो देवी के दर्शन करा दे। इतने भी लाचार नहीं है पापा चलते फिरते तो है फिर क्या। अजय को याद आया कि जब वो पढाई कर रहा था और आई आई टी के कम्पटीशन की तैयारी कर रहा था।एग्जाम खत्म होने के बाद तीन चार दोस्तों ने मिलकर वैष्णो देवी और उसके आस पास घूमने का प्रोग्राम बनाया था। लेकिन पापा के पास इतने पैसे नहीं थे उस समय। और पापा के मना करने पर मै नाराज हो गया था और जिद पकड ली थी कि मुझे जाना ही है। फिर पापा जैसे तैसे करके कहीं से पैसे का इतजाम करके दिया था कि लो जाओ बस इतने ही पैसे है इतने में ही जहाँ घूम सकते हो घूम लो।
अजय ने आज दिपिका से कहा चलो यार आफिस से एक हफ्ते की छुट्टी ले लेते है और पापा को लेकर कहीं घूमने चलते है। पापा को लेकर दिपिका ने कहा हां क्यों नहीं जा सकते क्या। देख लो अजय पापा चल पाएगें, हाँ हाँ क्यों नहीं चल पाएगें।अभी उन्हें बताना नहीं सरप्राइज देगे। टिकट बन जाने पर रात को अजय ने पापा से कहा पापा एक हफ्ते बाद हम और दिपिका वैष्णो देवी की यात्रा पर जा रहे है। अच्छा राजेन्द्र जी बोले और कौन कौन जा रहा है कोई नहीं बस हम दोनों शुक्रवार
की रात की टेन है। पापा घर मे नौकर चाकर तो लगे है आप उनसे अपने मन का खाना बनवा लेना और खा लेना। सुबह शाम को पार्क मे सैर कर लेना। पापा बस पाचं दिन की ही तो बात है, अच्छा बेटा ठीक है।
राजेन्द्र जी सोच रहे थे मेरा भी कितना मन था वैष्णो देवी जाने का चलो ठीक है। जैसे जैसे अजय के जाने के दिन नजदीक आ रहे थे राजेन्द्र जी की उदासी बढती जा रही थी। लेकिन अब आज अचानक से अजय ने कहा पापा आप भी हमारे साथ चल रहे है। पापा के चेहरे की खुशी देखते बन रही थी। फिर भी अपनी खुशी को दबाते हुए इकांर करने लगे। नहीं बेटा तुम लोग चले जाओ मेरे साथ तुम लोगो को परेशानी होगी। इस बुढापे मे मै कहाँ तुम लोगो को परेशान करता रहूँगा। बुढापे का क्या है पापा, बुढापा तो सबको ही आना है। मुझे भी आएगा तब मेरे बच्चे भी ऐसे ही छोड़ जाएगें कि पापा आप घर बैठो क्यों कि आप बूढ़े हो गए हो तो मुझे भी ऐसा ही कुछ लगेगा खराब जैसा कि आप अभी तक सोच रहे थे।
पर बेटा मेरा सामान तो लगा नहीं है वो सब दिपिका ने लगा दिया है, ये जो तीसरी वाली अटैची देख रहे है न वो आपकी ही है इसमें आपका सब सामान है। बस अब जल्दी जल्दी इस छोटे बैग मे अपनी दवाइयाँ और रोजमर्रा की चीजे रख ले बस एक घंटे मे निकलना है हम लोगो ने आप की वजह से ही रात की टेन छोडकर दिन की ले ली है। जल्दी करिये बस आधे घंटे में निकलना है। राजेन्द्र जी के खुशी का ठिकाना न था। वो तो अकेले रहने से ही घबरा रहे थे कैसे रहेगे अकेले पांच दिन। अजय के जाने के एक हफ्ते पहले से ही राजेन्द्र जी उदास हो गए थे। अब खुश है सबके साथ जाएगें माता रानी के दर्शन करके उनसे यही आशीष मागूगां कि अजय जैसी औलाद सबको देना माता रानी। जो मा बाप का बुढापे मे भी ध्यान रखे। आखिर बुढापा तो एक दिन सभी का आना है न।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
22 मार्च