“जाहिल गंवार कहीं की!!! मैंने कौन सी फाइल लाने कही थी और तुम यह क्या लेकर के आई हो… शक्ल के साथ-साथ अक्ल भी घास चरने चली गई है क्या…हे भगवान! यह किसके पल्ले बांध दिया मुझे मेरे मां-बाप ने… मुझसे बड़ा भाग्यहीन कौन होगा जो तुम्हारे जैसी गंवार मेरे मत्थे मढ़ दी गई… अब खड़ी-खड़ी मेरा मुंह क्या देख रही हो.. जाओ यहां से… मैं खुद ले आऊंगा फाइल…” अजय आपे से बाहर होकर चिल्लाया।
माधवी बिल्कुल जड़ हो गई। उसका सांवला मुखड़ा इस अपमान से और स्याह पड़ गया और बड़ी-बड़ी आंखों में ढेर सारा पानी उतर आया। फिर भी स्वयं को संभालते हुए उसने आर्त्त स्वर में कहा, “-जी मुझे अंग्रेजी नहीं आती ना, तो मैं समझ नहीं पाई ठीक से… मैं अभी जाकर….” इससे आगे के शब्द उसके कंठ में ही रह गए। अजय उसे अपमानित छोड़कर वहां से जा चुका था।
वह धीमे में कदमों से चलती हुई रसोई में आ गई और अपनी वेदना को भूलने का प्रयास करते हुए सब्जी में कलछी चलने लगी। लेकिन आंखें थी जो उसके प्रयास से विद्रोह करते हुए गंगा जमुना बहाने को तत्पर थी। उसके विवाह से लेकर अब तक का संपूर्ण घटनाक्रम उसकी आंखों के सामने कौंध रहा था।
माधवी के पिता रामनारायण जी अजय के पिता के बचपन के मित्र थे और गांव में ही रहते थे। एक बार वह उनसे मिलने गांव आए तो उन्हें सांवली सलोनी, सरल, सादगीपूर्ण और सौम्य माधवी बहुत पसंद आ गई और उन्होंने अजय के लिए माधवी के पिता से उसका हाथ मांग लिया। अजय तो यह विवाह नहीं करना चाहता था
परंतु पिता के ठसकेदार व्यक्तित्व के समक्ष उसकी एक न चली और पिता की आज्ञा के समक्ष उसे झुकना ही पड़ा और शीघ्र ही अजय और माधवी का विवाह संपन्न हो गया। अजय ने माधवी से भी विवाह तो कर लिया परंतु कभी हृदय से उसे अपनी पत्नी स्वीकार नहीं कर पाया। उसे तो एक गोरी चिट्टी, आधुनिक, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली लड़की चाहिए थी। किंतु हिंदी माध्यम से शिक्षित सांवली माधवी उसके गले की फांस बन गई थी। वह उसे अपने साथ लेकर दिल्ली तो आ गया परंतु कदम-कदम पर उसे अपमानित करने से बाज नहीं आता था।
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स्वयं भरसक संयत रखने का प्रयास करते हुए माधवी ने किसी प्रकार से खाना बनाया। खाना खाते हुए ही अजय को उसके मित्र रचित का फोन आया। उसके घर पार्टी थी और उसने अजय को आमंत्रित करने के लिए फोन किया था। बातों से ही पता चल रहा था कि उसने माधवी को भी साथ में बुलाया है। भोजन के पश्चात जब अजय है हाथ धोने लगा तो माधवी ने हिम्मत करके पूछा, “-कल आपको कहीं जाना है क्या?”
“- हां, अब क्या इसके लिए भी महारानी जी की अनुमति लेनी पड़ेगी ??” अजय ने कटु स्वर में उत्तर दिया।
“आपके साथ मुझे अभी जाना है क्या?” माधवी ने डरते डरते प्रश्न किया ।
“-पागल नहीं हूं कि तुम्हें अपने साथ लेकर जाऊंगा बेइज्जती कराने के लिए… कुछ आता जाता भी है तुम्हें…हुंह! ये मुंह और मसूर की दाल… अरे कभी देखना रचित की पत्नी को… कितनी आधुनिक है.. कैसे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है… कैसे मैनर्स और एटिकेट्स हैं… और एक तुम हो जिसने मेरे जीवन में कदम रखकर मुझ पर भाग्यहीन होने का ठप्पा लगा दिया… चलो अब मेरा मूड मत खराब करो.. जल्दी सोने दो.. सुबह ऑफिस में बहुत सारा काम है।”
माधवी पर जहर बुझे शब्दों की बौछार करके अजय सोने चला गया।
दूसरे दिन कार्यालय से घर आकर अजय फटाफट फ्रेश हुआ और नियत समय पर पार्टी के लिए निकल गया। माधवी का भी बहुत मन कर रहा था कि वह भी अजय के साथ जाए और देखे कि शहर की दावतें कैसी होती हैं। लेकिन अजय के इस व्यवहार के बाद तो उसे कुछ ही कहना व्यर्थ था।
अजय को गए हुए कुछ ही समय हुआ था कि माधवी के फोन का रिंग बजने लगा। किसी अनजान नंबर से कॉल था। उसने फोन उठाया तो उधर से आवाज आई, “-आप अजय कुमार के घर से बोल रही हैं?”
किसी अनहोनी की आशंका से कांपते हुए स्वर में माधवी ने उत्तर दिया,”- जी हां मैं उनकी पत्नी बोल रही हूं?”
“-आपके पति की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई है और उन्हें बहुत गंभीर चोटे आई हुई हैं। आप तुरंत संजीवनी अस्पताल पहुंचे।” उधर से स्वर आया।
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माधवी ने तुरंत घर से निकल कर टैक्सी ली और अस्पताल पहुंच गई। अजय को बहुत चोटें आईं थीं। लगभग एक सप्ताह अजय को अस्पताल में रहना पड़ा। माधवी ने अजय के माता-पिता को सूचित करना चाहा परंतु अजय ने मना कर दिया क्योंकि उन्हें पहले ही हृदय की समस्या थी। ऐसे में यह सूचना उनके लिए घातक हो सकती थी।
एक सप्ताह के उपरांत अजय अस्पताल से घर आ चुका था परंतु अभी भी चिकित्सकों ने उसे लगभग 2 महीने “बेड रेस्ट” की सलाह दी थी। माधवी पूरे मनोयोग से उसकी सेवा सुश्रुषा में लगी रहती थी। पहले तो अजय थोड़ा चिढ़ा चिढ़ा रहता था लेकिन अब धीरे-धीरे शांत रहने लगा था। माधवी की अनवरत सेवा और प्रेम भाव से उसके अंदर का हिमखंड स्वत: धीरे-धीरे पिघलने सा लगा था।
उस दिन माधवी उसके लिए सूप लेकर आई थी। लेकिन सूप बहुत गर्म था तो वह उसे पिलाने से पहले धीरे-धीरे फूंक मार कर उसे ठंडा करने का प्रयास कर रही थी।
अजय चुपचाप उसकी तरफ देख रहा था। आज पहली बार उसने माधवी को इतने ध्यान से देखा। उसकी बड़ी-बड़ी पलकों में ढेर सारी उदासी छिपी हुई थी। मासूमियत और निश्छलता उसके चेहरे से छलक रही थी। आज अजय को बहुत प्यारी लगी वह! अजय की मनोवस्था से अनभिज्ञ वह चम्मच में सूप लेकर उसे फूंक मार रही थी।
बालों की एक लट उसके गालों पर झूल रही थी। अचानक अजय ने हाथ बढ़ाकर उसके उस लट को उसके कानों के पीछे कर दिया। उसने चौंक कर अजय की तरफ देखा तो अजय मुस्कुरा दिया। अजय के मुस्कुराने भर से लगा जैसे ढेर सारा सिंदूर उसके गालों पर बिखर गया हो। एकदम से सकपका गई वह। सूप ठंडा हो चुका था तो वह पलकें झुकाए अजय को सूप पिलाने लगी।
तभी दरवाजे की घंटी बज उठी। माधवी ने उठकर दरवाजा खोला। अजय का मित्र हिमेश आया था उसे देखने। दोनों मित्र बातें करने लगे और माधवी चाय बनाने के लिए अंदर चली गई।
बातों बातों में अजय ने हिमेश से रचित का समाचार पूछा तो हिमेश ने कहा, “- अरे रचित का तो कुछ पूछो ही मत। बहुत बुरा हुआ उसके साथ.. उसकी पत्नी सदैव से अपने महंगे शौक पूरे करने के लिए उसे उल्टे सीधे तरीकों से पैसे कमाने के लिए विवश करती थी और स्टेटस बढ़ाने की चकचौंध में आकर रचित भी उसी में बहकर रह गया।
ऑफिस में भी उसने कई उल्टे सीधे काम किए। लेकिन एक दिन एक जरा सी चूक से सब कुछ सामने आ गया। उसकी नौकरी भी जाती रही और बदनामी हुई वो अलग…. जब घर में पैसों की कमी होने लगी तो उसके घर में लड़ाई झगड़ा आम बात हो गई और फिर एक दिन उसकी पत्नी घर छोड़कर चली गई। अब वह शायद किसी और के साथ रह रही है और उसने तलाक की अर्जी भी दे रखी है। किसी ने सच ही कहा है कि यदि घर की स्त्री सही हो तो घर स्वर्ग बन जाता है वरना जीवन को नर्क बनते देर नहीं लगती…”
अजय भौंचक्का रह गया उसकी कहानी सुनकर! आज उसे अनुभव हुआ कि जिस चकाचौंध के पीछे वह भी पागल हुआ जा रहा था वह एक मृग मरीचिका के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। वह कितना भाग्यवान था कि उसे माधवी जैसे संस्कारी पत्नी मिली और वह हीरे को कोयला समझ कर ठुकराता रहा। तभी माधवी चाय लेकर आ गई। थोड़ी देर बातें करने के उपरांत हिमेश चला गया।
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दरवाजा बंद करके माधवी उसके पास आ गई उसने मृदुल स्वर में कहा,”- अब आप थोड़ा लेट जाइए। बहुत देर से बैठे हैं, थकान हो गई होगी। आपकी दवा का भी समय हो गया।”…उसने आंख उठाकर माधवी की ओर देखा और अकस्मात ही उसे खींचकर हृदय से लगा लिया। उसकी आंखों से अविरल अश्रुप्रवाह होने लगा। अस्फुट स्वर में उसने कहा, “-मुझे क्षमा कर दो माधवी! मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया। मैं दिखावटी चकाचौंध में अंधा हो गया था। लेकिन अब और नहीं… अब तुम्हें ढेर सारी खुशियां और प्यार दूंगा। सदैव स्वयं को भाग्यहीन कहता रहा परंतु आज कहता हूं कि मुझे बड़ा भाग्यवान इस दुनिया में कोई न होगा जो तुम मेरे जीवन में आई। “
अजय के वक्ष से लगी माधवी आज नि:शब्द हो गई थी। आज उसे प्रतीत हो रहा था मानो संपूर्ण आकाश उसके आंचल में समा गया हो। उसकी आंखों से आंसू बहकर अजय के वक्ष पर विलीन होते जा रहे थे मानो अजय के हृदय में जो प्रेम का नवांकुर फूटा है उसे सिंचित कर लहलहा कर गगन का स्पर्श कर देना चाहते हों।
निभा राजीव निर्वी
सिंदरी धनबाद झारखंड
स्वरचित और मौलिक रचना