“मम्मा,आप बैठो मैं बुआ के लिए चाय लेकर आती हूं।”नेहा की छोटी बेटी बोली।
“सच नेहा,तू बड़ी किस्मत वाली है..तेरी दो बेटियां हैं,दोनों कितनी सेवा करती हैं तेरी?शादी के बाद भी तेरे दुख सुख में साथ खड़ी रहती हैं।” नन्द स्नेहा की बात सुनकर नेहा कुछ पलों के लिए अतीत में खो गईं..
नेहा को जब दूसरी बेटी हुई तो सब लोगों के साथ साथ स्नेहा ने भी नेहा को बहुत सुनाया था -“दूसरी भी लड़की हो गई..कैसे उठाएगी दोनों लड़कियों की पढ़ाई लिखाई और शादी की भार? भाई की भी इतनी तनख्वाह नहीं है..एक लड़का हो जाता तो कम से कम बुढ़ापे का सहारा बनता।मेरे तो दो बेटे हैं मुझे किसी बात की चिंता नहीं है।”
नन्द की बातों से नेहा भी एक पल को रुआंसी हो गई।पर नेहा की सास बहुत समझदार थी..वो नेहा से बोली -“बहु तू अपनी नन्द की बातों से दुखी मत हो सब बच्चे अपना नसीब लेकर आते हैं..देखना तेरी दोनों बेटियां कितनी काबिल बनेगी..अपने परिवार का नाम रोशन करेंगी और तेरे बुढ़ापे का सहारा बनेंगी।”
नेहा के पति ने भी अपनी माँ की बातों का समर्थन किया।नेहा और उसके पति ने अपनी दोनों बेटियों की अच्छे से परवरिश की…नेहा के पति को भी अच्छी नौकरी मिल गई थी..
दिन रात मेहनत करते रहने से उन्हें बड़ा पद प्राप्त हो गया और तनख्वाह भी अच्छी हो गई।नेहा की दोनों बेटियां पढ़ाई में अव्वल आती थीं..सभी लोग उनकी बहुत प्रशंसा करते तो नेहा गर्व से फूले नहीं समाती..दोनों बेटियां इंजिनियर बन गईं।
वक्त कब बीत गया पता ही नहीं चला..नेहा की सास जो हर पल उसके साथ खड़ी रहती थीं..उसकी लिए प्रेरणा थीं वो अब ये दुनिया छोड़कर जा चुकी थीं..पर उनका आशीर्वाद सदा ही नेहा की बेटियों के साथ रहा.. दोनों की अच्छे परिवार में शादियां हो गईं थीं।बेटियां तो नेहा की परवाह करती हीं थीं पर दामाद भी बेटों से कम नहीं थे वो भी उसको उतना ही सम्मान व स्नेह देते थे क्योंकि अब नेहा बिल्कुल अकेली रह गई, उसके पति का देहांत हो गया था।
नेहा की नन्द भी हर दो दिन बाद उसके घर आ जाया करती थी..नेहा का हाल तो कम पूछती पर अपने दुखड़े ज्यादा सुनाया करती।कहने को नेहा की नन्द के दो बेटे थे पर दोनों अपने ऑफिस के काम और परिवार में इतना व्यस्त रहते,कि उसको ज्यादा वक्त नहीं दे पाते थे।दोनों बहुएं भी अपने बच्चों में व्यस्त रहती थीं..
यानि उम्र के इस पड़ाव पर जहां किसी के साथ की बहुत जरूरत होती है..नेहा की नन्द बिल्कुल अकेली पड़ गई थी..कहने को सब साथ थे..फिर भी कोई पास ना था..नेहा के नंदोई का भी कुछ समय पहले देहांत हो गया था..इसलिए उसकी नन्द अपने को बहुत अकेला महसूस करती थी और यदा कदा नेहा के पास मन बहलाने को आ जाया करती थी।
नेहा के पति के जाने के बाद उसकी बेटियों ने कभी उसे अकेला नहीं छोड़ा।दोनों दूसरे शहरों में रहती थीं फिर भी उसके पास आती रहती थीं।ऐसे ही एक दिन नेहा की छोटी बेटी उसके पास आ हुई थी,कि स्नेहा भी उसके घर आ गई।नेहा की बेटी को उसकी इतनी फिक्र करते देख अपना दुखड़ा लेकर बैठ गई
तो नेहा से रहा नहीं गया,बोली -“दीदी,मैंने आज तक आपसे कुछ नहीं कहा..इसी बेटी के जन्म पर जमाने के साथ साथ आपने भी मुझसे सवाल किए थे ना,कि कौन बनेगा तेरे बुढ़ापे का सहारा?दूसरी भी लड़की हो गई।एक पल को तो मैं भी टूट गई थी..पर माजी के स्नेह व साथ ने मुझे फिर से हिम्मत दी थी।”
“सच कह रही है तू नेहा,मैं गलत थी..वैसे तो बेटे भी ख्याल रखते हैं पर बेटियां माता पिता के दिल के बहुत करीब होती हैं वो उनके दर्द को महसूस करती हैं और उन्हें कभी तन्हा महसूस नहीं होने देतीं।काश !मेरी भी एक बेटी होती।” स्नेहा ठंडी आह भरते हुए बोली।
“अरे बुआ जी,आप दुखी क्यों होती हो..मैं भी तो आपकी बेटी जैसी हूं ना..अब से मम्मा के साथ साथ मैं आपका भी ख्याल रखूंगी।” भतीजी की बात सुनकर स्नेहा की आंखों में आसूं आ गए।वो सोचने लगी..जिसके होने पर उसने खुशी नहीं जताई बल्कि बातें बनाई थीं वही आज उसका सहारा बनने की बात कर रही थी..सच में कितनी प्यारी होती हैं बेटियां?दूर रहकर भी दिल के करीब होती हैं बेटियां।स्नेहा ने भतीजी को प्यार से गले लगा लिया और आशीर्वाद दिया -“जुग जुग जिओ मेरी बच्ची..ईश्वर तुझे सदा सुखी रखे।”
दोस्तों हमें कभी बेटी और बेटे में फर्क नहीं करना चाहिए।बेटियां भी माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा होती हैं।
कमलेश आहूजा
#सहारा