बेटियाँ ससुराल में सुख से रहे। तो माँ के कलेजे को ठंडक मिल जाती है –  ज्योति आहूजा

केशव ये कुछ खाने पीने का सामान ले आओगे बाजार से आप प्लीज?

मां ढाई साल बाद हमारे पास कुछ दिन रहने आ रही है वो भी कितना बुलाने के बाद!

पापा को गुजरे एक साल हो गया केशव! उनके अचानक जाने के बाद उनका जीवन मानो रुक सा गया है! उनके सारे शौक ख़त्म से हो गए! ऊपर से वे अकेली रहती है!मैं फोन पर जब भी बात करती हूं उन्हें उदास ही पाती हूँ!सांची ने उदास मन से कहा!

अब पापा के जाने के बाद हम ही उनका सहारा है तो मैंने सोचा उन्हें अपने पास कुछ दिन बुला लेती हूं!

पर वे कहती है “माएँ बेटियों के घर आकर ज्यादा दिन नहीं रहती!

माँ भी ना! क्यूँ नहीं आ सकती माँ बेटी के पास! माँ तो माँ होती है! है ना केशव?

“बिल्कुल। हमारी शादी को ढाई साल होने को आए! एक बार बस हमारी शादी के बाद एक आधा दिन ही रहने आयीं थीं!पर वो भी क्या रहने में रहना हुआ? केशव ने कहा।

मैं भी दिल से चाहता था कि वे कुछ दिन रहने आए!केशव ने फिर कहा!

अगले दिन सुबह सुबह सांची की माँ सुनीता जी ट्रेन से बेटी के शहर आ गई! स्टेशन पर दामाद केशव उन्हें लेने पहुंचे थे!

बेटी के घर पहुंचते ही उसके मुख्य द्वार पर तरह-तरह के सुशोभित पौधे और गमले देख थोड़ा खुश हुई माँ के चेहरे के भावों को बेटी सांची भांप लेती है!

बेटी को गले लगते हुए माँ बेटी से कहते हुए”कैसी है मेरी बच्ची! तूने तो बड़े सुन्दर सुन्दर पौधे लगा रखे है! घर के प्रवेश द्वार पर ही इतने अच्छे गमले लगाए हुए हो तो अलग ही फिलिंग आती है बेटा!

सब आप से ही तो सीखा है माँ और मैं बिल्कुल ठीक हूं! एक प्यारी सी जादू की झप्पी देते हुए बेटी ने माँ को कहा!



आप कैसे हो माँ?

ठीक हूं। तेरे सामने हूं बेटी! तू ही बता कैसी लग रही हूँ! सुनीता जी ने बेटी को कहा!

ठीक ठीक ही लग रहे हो! पहले जैसी मेरी माँ कहाँ है! चेहरा तो देखो आप अपना!

अच्छा अच्छा अब अंदर चलो, केशव कहता है।

घर के अंदर प्रवेश करते ही माँ कहती है “सांची यह घर वो तो नहीं है बेटी जिसमें मैं आई थी तेरी शादी के बाद !

हां मां “मैंने तुम्हें बताया था ना कि 6 महीने पहले हमने घर बदल लिया है तो अब हमें यह घर ग्राउंड फ्लोर पर मिल गया और आपको पता है माँ इसके पीछे एक अच्छा सा लॉन भी है!

अच्छी बात है बेटी! तुम दोनों खुश रहो! माँ ने कहा!

माँ को चाय पिलाओ सांची! सफर कर के आयीं हैं!

और तुम आज मेरे नाश्ते और टिफिन की चिंता मत करना! मैं ऑफिस में कुछ मंगवा कर खा लूंगा!

आज मुझे थोड़ा जल्दी ऑफिस जाना है!कुछ जरूरी काम है!

मैं शाम को जल्दी घर आने की कोशिश करूंगा! ऐसा कहकर केशव तैयार होने चला गया!

फिर तीनों ने चाय पी ।

और केशव के जाते ही ,सांची ने कुछ घर के काम निबटाने और नाश्ते के बाद माँ बेटी बैठ कर बातें करने लगती है!

चलो माँ मैं घर दिखाती हूं आपको अपना!

जैसे ही सुनीता जी घर पर नजर डालती है उन्हें पूरे घर मे छोटे छोटे सजावट के समान दिखते है जो सांची ने काम ना आने वाली वस्तुओं से बनाया था! उसे देख सुनीता जी को काफ़ी खुशी होती है!

क्या देख रही हो माँ?

देख रही हूँ मेरे सिखाये हुए का तू कितना भली भांति उपयोग कर रही है माँ ने कहा!

“हाँ माँ! बचपन से ही आपको बागवानी एवं घर को ना काम में आने वाली वस्तुओं से तरह तरह का साज सज्जा का सामान व और भी बहुत कुछ बनाते देखा है।

“आप ही कहते थे ना कि जरूरी नहीं महंगे महंगे वस्तुओं को खरीद कर सजाने से ही घर की शोभा बढ़ती है! घर पर भी खुद से वस्तुओं को बनाकर और प्राकृतिक तरीके से घर को पेड़ पौधों से सजाकर भी आशियाने को खूबसूरत बनाया जा सकता है । तो देखो आज मैं भी बिल्कुल एसे ही कर रही हूं!

इतने में माँ कहती है “तू बेटी बहुत अच्छा कर रही है! मुझे बहुत अच्छा लगा देखकर!



इतने में सांची माँ को घर के पीछे वाले लॉन में ले जाती है। उसमे तरह तरह के फूल और सब्जियां देख कर माँ का दिल फुला नहीं समाया !

“माँ के चेहरे के उन सुंदर भावों को बेटी तुरंत परख जाती है और अपने द्वारा पिछले दिन खरीदे हुए पौधों और बीजों को अपनी माँ को दिखाते हुए कहती है!

“माँ देखो तो सही ये किन सब्जियों के बीज़ है और ये पौधे मैंने ठीक तो लिए है ना ! कुदरती कल ही खरीद कर लायी हूं ! अब आप से बेहतर मुझे कौन सही ज्ञान दे सकता है इन सब का? क्यों है ना माँ?

इस पर माँ के चेहरे पर इतने समय के बाद उदासी के जो बादल थे वो छंट कर आशा और खुशी की किरण देखने को मिल रही थी । वो एक बेटी के लिए अनमोल थी!

माँ सुनीता जी ने कहा “दिखा मुझे और दोनों माँ बेटी जुट गई बगिया सजाने में!

माँ तो माँ थी वह भी समझ रही थी कि बेटी के मन में क्या चल रहा है! पर कुछ बोली नहीं।

अच्छा माँ इस गमले में खाद कम हो गई है।जरा बताओ ना वो आप कैसे अपने घर मे बची हुई चाय पत्तियों से घरेलु खाद बनाते थे! वो ही तरीका मुझे भी सीखा दो ना!

हाँ हाँ क्यूँ नहीं! लिख ले एक कॉपी पेपर पर! नहीं तो भूल जाएगी!

माँ ने हंसते हुए कहा!

माँ हंसते हुए कितने अच्छे लगते हो!

भूल तो कुछ आप गए हों।

मुस्कुराना भूल गए हों आप!

पापा के जाने के बाद जीना भूल गए आप!

अपने शौक को दबा दिया माँ आपने!बागवानी आपकी जान थी माँ! क्यूँ बंद कर दी आपने?घर की साज सजावट का सामान कम और आसानी से मिलने वाली चीजों से कितना आसानी से बनाते थे आप कि जो कोई देखता आपके काम का दीवाना हो जाता था!

प्रकृति प्रेमी थे आप। लोगों को प्रेरणा देते थे कि पेड़ पौधे लगाए। वातावरण को स्वच्छ बनाए!

तुलसी ,धनिया, कड़ी पत्ता जैसी छोटी छोटी पौधे तो अवश्य लगाए ताकि इन्हें तुरंत घर से ही इस्तेमाल किया जा सके! बाजार से लेनी की आवश्यकता ही नहीं पड़े।

“पापा के जाने के बाद क्यूँ अपने को घर की चार दीवारी में कैद कर लिया, क्यूँ अपने शौक को खतम कर लिया!

बताओ माँ!

इतने में माँ की आँखों में आंसू छलक आते है और वह कहती है, “पापा के जाने के बाद बिल्कुल अकेली पड़ गई थी मैं!किसी काम में मन नहीं लगता था!

जीवन जैसे ठहर सा गया था!

तू भी कब तक मेरे पास रह सकती थी!बेटियाँ ससुराल में सुख से रहे। तो माँ के कलेजे को ठंडक मिल जाती है!

और बेटी के कलेजे की ठंडक का क्या? जब बेटी मां को उदास पाती है ! तो उसके दिल पर क्या बीतती है। मैं समझती हूं मां कि पापा के जाने के बाद आप बहुत उदास हो गए हो।उनकी कमी जीवन भर रहेगी। पर अपने आप को किसी तरह बिजी रखना होगा नहीं तो जीवन बहुत नीरस हो जाएगा! सांची ने माँ से कहा।



तभी बेटी की बात सुनकर मां कहती है” मैं समझ रही हूं सांची तुम क्या कहना चाह रही हो आज तुम्हें मेरी सीख को अमल करते देख मुझे बहुत खुशी हुई है । तुम अमल कर रही हो और मैं जैसे भूल ही गई। पिछले एक साल से मेरा जीवन नीरस सा हो गया था।मेरे सारे शौक इस एक साल मे दब गए थे! बागवानी मेरा शौक ही नहीं जुनून भी था।

आज तुझे बागवानी करते देख और अपने घर को इतने अच्छे तरीके से सुव्यवस्थित करते देख मुझे बहुत अच्छा लगा ।

बड़े तो बच्चों को बहुत कुछ सीखाते है। पर बहुत बार बच्चे भी बड़ो को बहुत कुछ सीखा देते है। आज तूने मुझे एक सीख दी कि चाहे जीवन में कुछ भी हो जाए अपने शौक अपनी हॉबी को कभी बंद मत कीजिए।

शौक है तो जीवन है ।नहीं तो जीवन नीरस हो जाता है। मैं बहुत खुश हूं बेटी कि तूने मेरे बारे में इतना सोचा। मैं तुझसे वादा करती हूं कि मैं अब तेरे यहां से वापस जाते ही फिर से अपने इस शौक को बरकरार रखूं!

इस पर सांची कहती है कि हाँ माँ, मैं जो चाहती थी आज वह पूरा हो गया! मैंने आपसे फोन पर बात करते समय हमेशा आपको उदास ही पाया तो आपको अपने पास इसी लिए बुलाया! मैं जानती थी आपकी उदासी दूर करने का क्या तरीका है। मैं चाहती तो फोन पर भी ये सब कह सकती थी पर मुझे लगा आप जब अपनी इस बेटी को ये सब अमल करते खुद देखेंगी और आमने सामने बैठकर जो बात होती है ना उसका अलग ही मजा है!

आज आपको मेरे घर के गमले और पौधे लगाते समय मैंने आपके चेहरे पर जो चमक देखी है ना उसी का मैं कब से इंतजार कर रही थी!

मुझे मेरी पहले वाली माँ मिल गई!

और हाँ माँ। अब अपने इस शौक को फिर से ख़तम नहीं करना!इसे अपने जीवन का आधार बना लेना!

धीरे धीरे क्या पता आपका ये शौक जीवन यापन मे भी सहयोग करे!

आप घर मे ही एक नर्सरी खोल लेना।

अच्छा मेरी माँ “हंसते हुए माँ ने बेटी को कहा।

माँ तो आप हो और आप ही रहोगे।सांची माँ को कहती है।

चलो खाना खाने का समय हो गया है। आपको भूख भी लगी होगी।

मैं रोटी बनाती हूँ और आप गर्म गर्म खाओ।

और हंसते हुए दोनों माँ बेटी जोर से गले लग जाती हैं।

दोस्तों ये कहानी आपको कैसी लगी।

पढ़कर अवश्य बताएं!

इसी इंतजार में।

ज्योति आहूजा।

 

 

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