बेसहारों का सहारा – गीता वाधवानी

 मालती अपनी मां सुषमा के गले रखकर रो पडी और कहने लगी-” मम्मी, यह आप क्या कह रही हो, पापा आप कह दो यह सब झूठ है। ” 

 मम्मी और पापा दोनों ने कहा-” नहीं मालती, यह सब झूठ नहीं है सच है। ” 

 मालती -” नहीं मैं नहीं मानती इस सच को? ” 

 मम्मी-”  मालती बेटा, तुम्हारे ना मानने पर भी  सच तो सच ही रहेगा। ” 

 मालती -” आपने मुझे यह बताया ही क्यों, जैसा चल रहा था वैसे ही चलने देते। ” 

 पापा-” मालती तुम इतनी परेशान क्यों हो रही हो, सच बताने से क्या हमारे रिश्ते बदल जाएंगे? ” 

 मम्मी-” बेटी एक न एक दिन तो तुम्हें सच बताना ही था क्योंकि तुम अब पढ़ लिखकर समझदार हो गई हो, बड़ी हो गई हो। ” 

 मालती -” लेकिन मुझे यकीन नहीं हो रहा कि आप मेरे मम्मी पापा नहीं हो और आपने मुझे गोद लिया है, मुझे तो कभी महसूस ही नहीं हुआ । ” 

 पापा-” तुम ऐसा क्यों सोच रही हो कि हम तुम्हारे मम्मी पापा नहीं है, हम तुम्हारे ही मम्मी पापा हैं  ” 

 मालती-” माफ करना पापा, मैं यह नहीं कहना चाह रही थी, पता नहीं क्यों मैं आपको समझा नहीं पा रही हूं। ” 

 मम्मी पापा -” हां हम तुम्हारी दुविधा को समझ रहे हैं। तुम परेशान मत हो। तुम्हारा सच जानना जरूरी था ताकि तुम्हें कहीं और से पता लगे तो तुम्हें ऐसा ना लगे कि मेरे मम्मी पापा मुझसे झूठ बोलते हैं और बातें छुपाते हैं। सिर्फ इसीलिए हमने तुम्हें यह सच बताया। वरना हम तो यह भूल ही चुके थे कि हमने तुम्हें गोद लिया है। तुम तो हमारी जान से भी प्यारी बिटिया हो। ” 

 मालती मम्मी पापा के गले से लग गई और पूछने लगी-” मम्मी पापा मुझे पूरी बात बताओ” 

 पापा ने बताया-” शादी के बाद 12 साल तक हम लोग बच्चों के लिए तरसते रहे। हमने हर जगह जाकर भगवान से अरदास करी। हमने ना कोई मंदिर छोड़ा और ना कोई गुरुद्वारा, लेकिन न जाने क्यों भगवान हमारी प्रार्थना सुन ही नहीं रहे थे। डॉक्टर को भी दिखाया था, कहीं कोई कमी नहीं थी। कमी थी तो सिर्फ भाग्य की। एक बार हम बहुत दूर एक गुरुद्वारे से वापस आ रहे थे। कहते हैं कि वहाँ की बासी रोटी और कच्चा प्याज जिसे मिल जाए उसे संतान जरूर होती है और उस दिन हमें यह प्रसाद मिल गया था। हम लोग वहां से वापस लौट रहे थे तो रात हो चुकी थी। हम लोग बहुत थक चुके थे और आते ही सो गए क्योंकि हमने यह निश्चय कर लिया था कि कल सुबह होते ही हम लोग अनाथ आश्रम जाएंगे। ” 

       सुबह होते ही हम लोग अनाथ आश्रम गए, लेकिन वहां जाकर हमें पता लगा कि बच्चे को गोद लेना, कोई आसान काम नहीं है। कई तरह के डॉक्यूमेंट फाइल में लगाने होते हैं और उसके बाद काफी इंतजार करना पड़ता है क्योंकि गोद लेने वाले लोगों की बहुत लंबी लिस्ट होती है। जब आपका नंबर आएगा तभी आपको कोई बच्चा या बच्ची मिल सकता है। ” 

 मम्मी-” तब हमने अपने सारे कागजात जमा करवा दिए और इंतजार करने लगे। सात आठ महीने बीत चुके थे, तब हमारे पास एक कॉल आया और फिर हमें तुम मिली। वह दिन हमारे लिए सबसे बड़ा खुशी का दिन था। ” 

 तभी पापा एक फाइल लेकर आए और मालती के हाथ में देते हुए बोले-” यह देखो मालती, इस फाइल में एक लिफाफा है, जो कि हमने आज तक खोला नहीं है क्योंकि अनाथ आश्रम के लोगों ने हमें बताया कि जब तुम उन्हें झूले में मिली थी तब यह तुम्हारे पास ही पड़ा था। उन्होंने कहा कि मालती के बड़े होने पर उसे दे देना। अब तुम इसे खोल कर देख सकती हो। ” 

    मालती ने उसे खोल कर देखा तो उसमें एक पत्र था। उसमें लिखा था-” मेरी प्यारी बिटिया, मुझसे नाराज मत होना, तुम्हारी मां तुम्हें जन्म देते ही चल बसी और मैं तुम्हारा बदनसीब बाप इस दुनिया में थोड़े दिन का मेहमान हूं। समझ नहीं आ रहा कि तुम्हें किसके पास छोडूं इसीलिए मैं तुम्हें इस आश्रम के झूले में रख रहा हूं। मैंने सुना है कि यहां से अच्छे लोग बच्चों को गोद ले लेते हैं। बेटी, जो कोई भी माता-पिता तुम्हें गोद लें, उन्हें जीवन भर कोई शिकायत होने मत देना। हमेशा उनका कहना मानना और उनका सम्मान करना। तुम्हारा पिता अजय। 

 पत्र पढ़कर मल्टी रोने लगी। मम्मी पापा ने उसे गले लगा कर चुप करवाया। 

 मालती ने कहा-” मम्मी पापा मैं तो बेसहारा थी आपने मुझे सहारा दिया अब मैं भी बेसहारों का सहारा बनना चाहती हूं। ” 

 पापा-” मालती, तुम क्या करना चाहती हो? ” 

 मालती -” पापा मैं सोच रही हूं कि मैं कोई एनजीओ ज्वाइन कर लूं और बेसहारा बुजुर्ग, जिनका कोई नहीं होता,उनका सहारा बनूँ। ” 

 मम्मी-”  यह तो बहुत अच्छा सोचा तुमने। क्या तुम किसी एनजीओ के बारे में जानती हो? ” 

 मालती ने कहा -नहीं, जानती तो नहीं हूं पर पता लगा लूंगी। ” 

 पापा ने कहा-” ठीक है बेटा, जो कुछ भी अच्छा करना चाहती हो,करो, मैं भी तुम्हारी मदद करूंगा। ” 

 जल्द ही मालती ने एक ऐसी संस्था का पता लगा लिया जो कि बेसहारा कमजोर बुजुर्गों को सहारा देती थी। उन्हें अपने पास रखती थी और बीमार होने पर उनका इलाज भी करवाती थी। 

 एक दिन मालती जब अपने ऑफिस से वापस आ रही थी, तब उसने एक बुजुर्ग को बस स्टैंड पर लाचार बैठे देखा। उसने उनसे पूछा-” अंकल आप यहां अकेले क्यों बैठे हैं, क्या मैं आपको आपके घर तक छोड़ दूं? ” 

 उस बुजुर्ग ने कहा-” बेटी मुझे कुछ याद नहीं आ रहा, मैं कौन हूं और कहां रहता हूं, कुछ भी याद नहीं। ” 

      मालती उन्हें लेकर अपनी संस्था में गई। वहां उनके रहने का इंतजाम किया और उनका फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। लगभग एक हफ्ते बाद उनके घर वाले उन्हें लेने आ गए। मालती बहुत खुश थी कि वह अपने घर जा रहे हैं। इसी तरह उसके बेसहारों का सहारा बनने की मुहिम शुरू हुई और आज 10 साल बाद वह अपनी संस्था में बुजुर्गों की प्यारी बेटी बन चुकी है। 

 अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली 

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