इति एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रही थी। कोरोना के बाद से लगातार उसका वर्क फ्रॉम होम चल रहा था। माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण बहुत ही नाजों से पली थी। बेटी विवाह योग्य होने पर किसी भी माता-पिता का उसके विवाह के लिए चिंतित होना लाजिमी हैं। चाहे बेटी नौकरी करती हो, या घर में रहती हो।
इधर-उधर काफी ढ़ूंढ़ने के बाद उन्हें एक लड़का जंच गया उसका नाम था उज्जवल….!
उज्जवल अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। वह भी एक प्रतिष्ठित कंपनी ने मैनेजर था। उज्जवल के पिता गौरव जी बैंक मैनेजर से रिटायर हुए थे। माता नैना जी घर संभालती थी। दोनों लोग बहुत हंसमुख स्वभाव एवं खुले विचारों के थे।
इति हमेशा ससुराल को लेकर भयभीत रहती, कि पता नहीं … ससुराल के लोग कैसे होंगे, उनका व्यवहार मेरे प्रति कैसा होगा, ऐसे अनेकों सवाल मन मस्तिष्क में हमेशा तांडव करते रहते ….??
अक्सर ऐसा देखा जाता है कि ससुराल वालों का विवाह से पहले बातचीत करने का तरीका कुछ और, एवं विवाह के बाद कुछ और हो जाता है।
कुछ दिनों के पश्चात इति और उज्जवल दोनों विवाह के बंधन में बंध गए। इति विवाह होने के पश्चात ससुराल गई। धीरे-धीरे विवाह में सम्मिलित सभी रिश्तेदार अपने-अपने घर चले गए…।
इति की सास नैना जी ने इति को अपने पास बैठाकर समझाते हुए बोला…बेटा! अब यह घर तुम्हारा अपना घर है। तुमको अपने घर में कैसे रहना है, यह तुम पर निर्भर करता है। भविष्य में तुम्हारा व्यवहार ही इस परिवार को रिप्रेजेंट करेगा।
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इस घर के सभी रिश्तेदार अब तुम्हारे अपने रिश्तेदार हुए सभी के साथ मिलजुल कर रहना, यह तुम पर निर्भर करता है।
कभी भी तुम्हें कोई बात पसंद न आए, तो बाहर किसी को बताने से अच्छा है…. हमें ही बोलना, जिससे हम उसे सुलझा सकें।
बाहर किसी को बताओगी तो वह बात दुगनी वेग से लोगों तक पहुंच जाएगी जिससे समस्या हल होने की बजाए और जटिल हो जाएगी।
इति ने सासू मां की बात बहुत ध्यानपूर्वक सुनते हुए मन ही मन गांठ बांध ली, और उनकी बातों पर विचार करने लगी। सचमुच..! सासू मां बिल्कुल सही कह रही है। जब समस्याएं घर में सुलझ जाए तो बाहर वालों को बोलने का क्या फायदा। घर की बातों को घर में ही रखना उचित है।
आज इति की ससुराल में पहली रसोई थी लेकिन इति को कुछ बनाना नहीं आता था। वह संकोच में पड़ गई कि- सासू मां को कैसे बोले….?
सासू मां ने इति को परेशान देखते हुए कहा तुम्हें हलवा कैसा लगता है। इति ने कहा मुझे हलवा बहुत पसंद है सासू मां ने कहा ठीक है तुम हलवा ही बनाओ…!
मां हलवा कैसे बनाती थी, याद करते हुए ठीक उसी प्रकार से बनाने की कोशिश करने लगी। हलवा जब बन गया तो वह प्लेटो में सजाकर सास ससुर और पति को देने गई। सासू मां ने कहा चौथी प्लेट कहांँ है…??
जी… लाती हूंँ।
एक प्लेट लेकर सासू मां ने इति को साथ ले जाकर भगवान को भोग लगाया…. हे ईश्वर…!! यह मेरी बहू की पहली रसोई है इसे स्वीकार करिए।
तत्पश्चात चारों ने बैठकर हलवा खाया। सास- ससुर ने प्रशंसा के पुल बांध दिए। नैना जी बोली..जाओ बेटा! अब तुम अपना आफिस का काम करो।
और हाँ! रसोई की चिंता मत करना, हम गीता के साथ मिलकर सँभाल लेंगे।
इति ने चैन की सांस ली..!
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गीता पहले से ही खाना बनाना और घर के अन्य काम करती थी। सुबह, शाम अपना काम करके चली जाती, और जो थोड़ा बहुत काम बचता था वह सास- ससुर मिलकर निपटा लेते थे।
वह सुबह जब सोकर उठती तो सास ससुर मॉर्निंग वॉक से आकर चाय पीते हुए दिखते। सुबह की चाय कभी ससुर बनाते और कभी सासू मां बनाती थी। अक्सर दोनों बातें करते हुए हंसते हुए नजर आते थे।
माँ ने फोन मिलाया उन्हें उत्सुकता थी की ससुराल के लोग कैसे हैं…?? मेरी बेटी उस घर में एडजस्ट कर पा रही है या नहीं। उधर से इति की आवाज सुनाई पड़ी।
इति चहकते हुए बोली.. हांँ मांँ!! उसके बोलने के अंदाज से ही मांँ ने राहत की सांस ली। इति ससुराल में बिल्कुल ठीक-ठाक है। काफी दिन के बाद बेटी से बात करते हुए ऐसा लग रहा था जैसे सारे जहां मिल गया हो।
बातों-बातों में इति ने घरवालों की पूरी दिनचर्या अपनी मां को बताई और बोली…. मां अब मैं सचमुच तनाव मुक्त हो गई हूंँ।
जैसे तुम्हें अपने ससुराल वालों के लिए तनाव था उसी प्रकार हर सास को भी यह चिंता रहती है कि उसकी होने वाली बहू कैसी होगी…??
बेटा…! थोड़ा जल्दी उठकर अपने सास ससुर को अपने हाथ से चाय दिया करो।
मांँ…! कितना स्नेह हो गया है मुझे इस परिवार से।
कभी सोचा भी नहीं था एक अनजाना सा परिवार और उसमें रहने वाले सदस्य सब अपने हो जाएंगे।
मां मुझे यहां बहुत अच्छा लगता है…??
समय निकलता गया। इति के मायके और ससुराल में अच्छा सामंजस्य था। सभी एक दूसरे का आदर करते किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी। इति और उज्जवल दोनों परिवारों का पूरी तरह से ख्याल रखते।
एक दिन उज्जवल ने अपने माता-पिता के सामने एक बात रखी।
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क्यों न…! इति के माता-पिता को अपनी ही सोसाइटी में फ्लैट दिलवा दिया जाए। वहां भी वह लोग किराए के मकान में ही रहते हैं। यहां रहने से सब लोग आसपास रहेंगे।
नैना जी बोली- यह तो बहुत अच्छा विचार है। इति का भी मन लगा रहेगा। वह अपनी मम्मी-पापा के लिए परेशान नहीं होगी….! आखिर, वह भी तो अपने मां-बाप की इकलौती संतान है।
कुछ दिनों के बाद उज्जल ने इति के माता-पिता को भी अपनी सोसायटी में फ्लैट खरीद कर दे दिया। इति अपने माता-पिता को अपने आस-पास पाकर बहुत खुश हुई।
उज्जवल मेरे माता पिता का कितना ख्याल रखते है…! सच मैं बहुत भाग्यशाली हूंँ ऐसा ससुराल पाकर।
मैं अपने आप से वादा करती हूं कि मैं ससुराल की गरिमा हमेशा बनाए रखूंगी।
इति अपने सास- ससुर का बहुत सम्मान करती थी और हमेशा कोशिश करती थी कि उसके व्यवहार से उन्हें कोई ठेस न पहुंचे।
इति और उज्जवल दोनों ऑफिस के काम से कुछ महीनो के लिए कनाडा गए, उन दोनों के माता-पिता आसपास थे इसलिए वह निश्चिंत थे। इति के माता-पिता अक्सर कुशल- क्षेम जानने के लिए इति की ससुराल आते रहते थे। गौरव और नैना जी भी इति के माता-पिता से खूब मन भर कर बातें करते हुए चारों खूब ठहाके लगाते थे।
एक दिन नैना जी बाथरूम से निकलते समय अचानक गिर गई, जिससे उनका पर फैक्चर हो गया। इति के माता-पिता तुरंत आकर उन्हें अस्पताल ले गए। पैर में प्लास्टर चढ़ाने के पश्चात तीन दिन के बाद छुट्टी दे दी गई।उज्जवल और इति दोनों बहुत परेशान थे, लेकिन इति की मां ने कहा तुम लोग अपने काम पर ध्यान दो…! हम लोग एक दूसरे की देखभाल करने के लिए यहां है न…! तुम लोग परेशान मत हो और अपना ऑफिस का काम निपटाकर ही आना। इति की मां ने नैना जी की बहुत सेवा की और दो महीने में वह फिर से चलने लगी।
नैना और गौरव जी को अपने बेटे की बुद्धिमानी पर गर्व हुआ जो इति के माता-पिता को भी इसी सोसायटी में फ्लैट दिलवा दिया। रिश्तेदारी के साथ-साथ चारों में बहुत मित्रता थी कोई भी समस्या होने पर चारों मिलकर सुलझा लेते।
सच ही कहा जाता है बेटा, बेटी के विवाह में दो दिलों का मिलन ही नहीं… बल्कि दो परिवारों का भी मिलन होता है।
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कुछ दिनों के बाद इति और उज्जवल दोनों लौट कर भारत आए। वह अपने परिवार से मिलकर फूले नहीं समा रहे थे। आज उनके दोनों परिवार एक स्नेह के धागे में बंधे हुए थे, जहां किसी एक को चोट लगने से दर्द सभी को होता था।
इति और उज्जवल दोनों ढेर सारी शॉपिंग करके लाए थे इति सभी को खुशी-खुशी उपहार दे रही थी। चारों माता-पिता बहुत खुश थे। नैना जी बोली हमारे घर की असली चमक तो तुम हो बहू रानी…!!
उस दिन सभी मिलकर बाहर घूमने गए और रात का खाना बाहर खाकर आए। यह छोटे-छोटे खुशी के पल ही हमारे जीवन में नई उमंग भरते हैं।
थोड़ा बहुत मतभेद तो सभी परिवारों में होता है लेकिन थोड़ी समझदारी दिखाने से परिवारों के बीच स्नेह निरंतर बना रहता है।
– सुनीता मुखर्जी “श्रुति”
स्वरचित, मौलिक अप्रकाशित
हल्दिया, पश्चिम बंगाल