जिस दिन से रवीना को यह पता लगा कि वह इस परिवार की अपनी बेटी नही, गोद ली गई है, उसी दिन से से उसके स्वभाव में अजीब सा परिवर्तन आ गया। हर समय चहकने वाली सतरह वर्षीय चुलबुली रवीना जैसे गुमसुम सी हो गई।कालिज में इसी साल प्रवेश लिया।नया माहौल, कुछ नई पुरानी सहेलियां, दोस्त , आजादी सब कुछ कितना सुहाना था।
कालिज में स्कूलों जैसी बंदिश नहीं होती। कभी मन किया तो क्लास में न भी जाओ तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन रवीना ऐसी नहीं थी, उसे तो किताबों से प्यार था, मन में कुछ बनने की इच्छा थी, मां बाप का लाड , सहयोग और बड़े भाई वीरेन का साथ, और हर सुख सुविधा तो थी उसके पास।
लेकिन कुछ दिन पहले किसी ने उसके मन रूपी स्वच्छ तालाब में जैसे कंकर फेंक दिया और वो उसी की हलचल में डूब उतर रही है।
चार पांच दिन पहले की बात है कि उनके घर मेहमान आए, तब वो अपने कमरे में मोबाईल पर किसी सहेली से बातें कर रही थी तो वह फोन सुनते सुनते बाहर की और आई और ड्राईगं रूम में बैठे दो लोगों को नमस्ते करके निकल ही रही थी कि उसके कानों में ये आवाज पड़ी “ अरे नीतू, यह वही लड़की है न जो मंदिर के दरवाजे से उठाई थी”।
उसके कदम वहीं ठिठक गए। लेकिन तभी मां नीतू की आवाज सुनाई दी,स्वरा, लो चाय पियो, शायद मां ने उस मेहमान औरत को कुछ इशारा किया था।उसके बाद क्या बात हुई उसे कुछ सुनाई नहीं दिया। वो धम्म से आकर अपने बिस्तर पर गिर गई, और फिर देर रात तक बाहर नहीं निकली।
नीतू और गिरीश को शक तो हो गया थी कि शायद रवीना ने स्वरा की बात सुन ली है, लेकिन अब क्या किया जाए, नीतू उसे खाने पर बुलाने गई तो उसने भूख न होने का बहाना बना दिया। अगले दिन से ही उसे बुखार हो आया था। फूल सी बच्ची जैसे मुर्झा गई थी। भाई वीरेन कालिज टूअर पर गया हुआ था।
भाई बहन की आपस में खूब बनती थी। दो साल उम्र का अंतर था। रवीना को लग रहा था कि वीरेन भी इस सच्चाई से अनजान है, रवीना के मन को चैन नहीं था। किसी की किसी से इस विषय पर कोई बात नहीं हो पा रही थी।
नीतू और गिरीश बहुत कुछ कहना चाह रहे थे लेकिन कह नहीं पा रहे थे, इधर रवीना अंदर ही अंदर घुट रही थी। आखिर सच्चाई का पता कैसे लगाए। दूसरे शहरों में मौसी, मामा, चाचा , दादी सब थे , लेकिन कभी किसी के मुंह से कोई बात नहीं सुनी। सब उसे खूब प्यार करते थे,
कई बार तो वीरेन मजाक मजाक में कह भी देता कि सब रवीना को उससे ज्यादा प्यार करते है। रवीना रूप, गुण, पढ़ाई सब में आगे थी और सस्कांर तो दोनों भाई बहन में कूट कूट कर भरे हुए थे। आज कल ऐसे बच्चे कम ही मिलते है।
लेकिन जो उसने सुना, उसे भी तो झुठलाया नहीं जा सकता। कौन है उसके असली माता पिता, उसका परिवार और क्यों छोड़ दिया उसे मंदिर के आगे, ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न उसके दिमाग में दिन रात घूमते, सब सोच सोच कर उसका सिर दुःखने लगा। कितनी बदनसीब है वो, दूसरों के टुकड़ों पर पल रही है।
अपने मुँह पर फीकी हंसी का लबादा ओढ़कर उसने कालिज जाना शुरू कर दिया और खुश रहने का बहाना करने लगी।अगर इस सच्चाई का उसे बचपन से ही पता होता तो शायद उसे इतना दुःख न होता। लेकिन उसे कभी भी परिवार में कुछ महसूस नहीं हुआ। मनीषा उसकी एकमात्र पक्की सहेली थी।
दोनों एक दूसरे से सब बातें शेयर करती थी लेकिन रवीना अपनी इस प्रकार की बदकिस्मती की बात कैसे बताती उसे। मनीषा को भी रवीना उदास सी लगती, उसकी हँसी उसे खोखली सी लगती, बातों में बनावटी पन की बू आती, उसने कई बार उससे पूछा लेकिन वो बात बदल देती।
एक दिन दोनों सहेलियां कालिज की लाईब्रेरी में बैठी थी, मनीषा अखबार के पन्ने पलट रही थी, तभी उसने गुस्से से अखबार को परे फेंकते हुए कहा, न जाने कैसे कैसे कठोरदिल लोग रहते हैं इस दुनिया में। रवीना जो कि किताब पढ़ रही थी, चौंक कर बोली, क्या हुआ, क्यूं इतना गुस्सा हो रही है। ये देख, ये खबर, ऐसी खबरें पढ़ कर मेरा तो खून खौल उठता है।
जब बच्चे पाले नहीं जाते तो पैदा क्यूं करते है और पैदा हो भी गए तो कूड़े में मरने के लिए छोड़ देते है। अरे इतने अनाथ आश्रम, पालना घर बने हुए हैं , अगर इतना ही मुँह छुपाना है तो किसी धार्मिक स्थल या किसी ऐसी सुरक्षित जगह रखे जहां उनकी जान बच जाए। शायद किसी का घर रोशन हो जाए, दुनिया में कितने मां- बाप बच्चे की किलकारी को तरसते हैं।
रवीना ने अखबार पर नजर डाली तो पढ़ा कि शहर में कूड़े के ढ़ेर में मरी हुई नवजात बच्ची की लाश मिली।कुछ देर के लिए तो रवीना भी अपने होश खो बैठी, उसकी आंखों में आसूं टपक आए।मनीषा ने उसकी और देखा तो उसे लगा कि उसे भी ये खबर पढ़ कर रूलाई आ गई।
सिर दर्द का बहाना करके रवीना कालिज छोड़कर घर आ गई। उसके दिमाग में एक विचार आ रहा था, एक जा रहा था। आखिर वो इस नतीजे पर पहुँची कि वो बदकिस्मत नहीं, बदकिस्मत वो हैं, जिन्होंने उसे ठुकराया, पर क्या पता उनकी कुछ मजबूरी रही हो, समाज के भी नियम कानून है, क्या पता क्या हुआ।
लेकिन फिर भी कुछ इंसानियत तो दिखाई कि उसे कूड़े में तो नहीं फेंका मरने के लिए, भगवान के दर पर छोड़ा, शायद तभी वो बच गई। सवाल तो मन में रवीना के बहुत थे लेकिन जिस परिवार ने उसे अपनाया, उसे कुछ नहीं बताया , वो कितना महान है। वो तो खुशकिस्मत है कि उसे ऐसा परिवार मिला वरना तो ऐसे कितने बच्चे हैं जो अखबार की न्यूज की तरह दम तोड़ जाते होंगे।
अब रवीना का मन हल्का हो चुका था, वो अपने आप को बदकिस्मत नहीं खुशकिस्मत समझ रही थी, अब कभी ये सच सबके सामने आ भी गया तो वो नहीं घबराएगी। बहुत दिनों बाद जब उसने माँ के गले में लाड से बांहे डाली तो नीतू की आंखों में आंसू आ गए लेकिन वो खुशी के आंसू थे।
विमला गुगलानी
चंडीगढ़
वाक्य- मेरे जैसे बदनसीब दुनिया में कोई नहीं।