मैं भी तो एक बेटी हूं – सुदर्शन सचदेवा
शाम के पाँच बज रहे थे। बारिश की हल्की-हल्की बूँदें छत पर पड़ते हुए एक अजीब-सी बेचैनी पैदा कर रही थीं। डोरबेल बजी, और गीता ने दरवाज़ा खोला। सामने एक लड़की खड़ी थी—भीगी हुई, डर से कांपती, और आँखों में अजीब-सा दर्द। “आंटी… क्या मैं अंदर आ सकती हूँ? मैं… मैं और कहीं नहीं जा … Read more