डाक चाचा – डॉ. उर्मिला सिन्हा

डाकिया—एक शब्द नहीं, एक युग की धड़कन। हमारे जीवन के वे अभिन्न अंग थे, जिनकी उपस्थिति पारिवारिक सदस्य से भी बढ़कर थी। उनका हमारे साथ न रहना गौण था, क्योंकि वे तो उन अपनों का प्यार भरा संदेशा लाते थे, जो हमसे कोसों दूर, क्षितिज पार बसे थे। वे संदेशवाहक नहीं थे, वे तो भावनाओं … Read more

क्या सारी जिम्मेदारी बहुओं की ही है! – कुमुद मोहन

“बहू!तुमने सिया को फोन कर के उसकी सास  का हाल चाल नहीं लिया” रमाजी झुंझलाती हुई अपनी बहू अवनी से बोली जो ऑफिस से आकर घर में घुसी ही थी! “मम्मी!आप दिन में कई बार दीदी को फोन करती हैं आप ही पूछ लेतीं? मेरे ऑफिस में आज मीटिंग थी मुझे जरा सा भी टाइम … Read more

उसे समझाती भी तो क्या – रत्ना पांडे

दीपावली पर इस वर्ष मेरे घर वह दीये बेचने वाली कुम्हारन नहीं आई। वह भी क्या करती! वह तो हर वर्ष आती ही थी, किंतु विदेशी चमक-दमक की चकाचौंध ने मुझे इस तरह आकर्षित कर लिया था कि उसे देखते ही मेरा चेहरा बिगड़ जाता था और मैं दीये लेने से इनकार कर देती थी। … Read more

अधूरा सत्य – लतिका पल्लवी  

रवीश ऑफिस से आया तो उसनें देखा कि घर का दरवाजा पूरा खुला हुआ है।वह यह कहते हुए अंदर गया कि दरवाजा खुला क्यों है? अँधेरा हो गया है कोई अंदर घुस जाएगा और कुछ दुर्घटना घट जाएगी तभी सब को समझ आएगा। तभी उसकी भाभी की आवाज आई भैया बत्ती जला दीजिए और ज़रा … Read more

बेटीयों को कितनी आज़ादी  दें – शिव कुमारी शुक्ला 

महिमा जी का परिवार पूर्णतया आधुनिक रंग में रंगा हुआ था। आलीशान कोठी सभी आधुनिक सुख-सुविधाओं से सुसज्जित, नौकर -चाकर, गाड़ियों की फौज।सब कुछ तो था उनके पास। उनके बच्चे दो बेटियां एवं एक बेटा जब आधुनिक परिधान पहन कर चमचमाती गाड़ियों में बैठकर जाते तो आस-पास के लोगों में उन्हें देखकर एक आह निकलती … Read more

निरादर – मनीषा सिंह

मां जी!दोपहर के 12:00 बज गए अभी तक ये आए नहीं•••?  घड़ी की सुइयां देखते हुए राधा अपनी सासू मां जानकी जी,जो दोपहर का खाना खा रही थीं से बोली।  12:00 बज गए क्या करना है? इतनी देर इंतजार किया है तो कुछ दे और सही!  अपनी अंतिम निवाले को खा उंगलियां चाटते हुए जानकी … Read more

हत्या या आत्महत्या – परमादत्त झा 

आज अचानक रमेश के घर में कोहराम मच गया।शंभू चाचा की रोड दुर्घटना में मृत्यु हो गई। मैं भी देखने गया। दीपावली से पहले का धनतेरस ,उसकी तैयारी का सारा समान कल खरीद लाये थे।हार्ट एटैक भी एक साल पहले हुआ था मगर बायपास सर्जरी से सामान्य जीवन जी रहे थे।जो भी हो हमीदिया विद्यालय … Read more

क्या? परिवार की सारी जिम्मेदारी बहू की होती है – विनीता सिंह

मासी हाथ में चाय का कप हाथ में लिए।ओ आसमान की तरफ देख रही थी और सोच रही क्या यही मेरी जिंदगी है सच या सपना तभी मोहित आया। और बोले माही तुम सारा दिन क्या करते हो, सारा घर बिखरा पड़ा है, संभाल नहीं सकती तुम क्या घर पर रहती हो फिर भी ठीक … Read more

जो मरता नहीं वो प्यार है – रवीन्द्र कान्त त्यागी

छुट्टी के अब मात्र पांच दिन बचे हैं. जब से ऑस्ट्रेलिया से लौटा हूँ, कॉलेज के ज़माने के एक भी मित्र से मुलाकात नहीं हुई. पांच साल लंगे समय के थपेड़ों ने सब को जहां तहां बखेर दिया है. हर शाम उदास सा इस रेस्टोरेंट की टेबल पर घंटों बैठकर उन बिंदास दिनों की याद … Read more

क्या सारी जिम्मेदारी बहू की ही है? – मधु वशिष्ठ

—————— क्या सारी जिम्मेदारी बहुओं की ही है? कैसी मां हो आप? खुद तो बिना जिम्मेदारी के अकेली आराम से रही, आपको क्या पता कि ससुराल  में मुझे कितना काम करना पड़ता है? मैंने रवि को कह दिया था कि मैं अब कुछ दिन बाद ही घर आऊंगी, परंतु आपको अपनी बेटी के ही मायके … Read more

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