जब से राधे और उसके काका रामेश्वर जी के बीच खेत का बटवारा हुआ है। तबसे राधे का मन काका के उस खेत के हिस्से पर आ चुका था। वह दिन रात तरकीब लगाते रहता कि किस तरह अपने काका से वह खेत की जमीन हथिया ले।
मगर ठीक इसके विपरीत राधे जितना बेईमान कुटिल स्वभाव का उतना ही उसकी पत्नी केतकी उतनी ही ईमानदार और सरल स्वभाव वाली यहां तक की बेईमानी से उसका दूर-दूर तक कोई नाता ही नहीं था। शादी को दस बरस बीत गए मगर उनके कोई संतान नहीं हुई थी।
राधे को तो अपने संतान की कमी भी इतनी कोई खास ज्यादा महसूस नहीं होती थी क्योंकि वह दिन भर अपने कुटिल चाल में व्यस्त रहता मगर केतकी को अपनी संतान न होने की कमी बहुत खलती इसीलिए वह राधे के रामेश्वर काका की बेटी फुल्की को अपनी संतान मानकर उसे बहुत स्नेह देती। जब भी कुछ बनाती तो उसे अपने हाथों से खिलाने बैठ जाती थी ।
जबकि राधे के मन में फुलकी के प्रति ऐसा कोई भाव नहीं था और ना ही फुल्की को पसंद करता था। उसे तो बस दिन-रात एक ही लगन थी कि कैसे अपने काका का खेत का हिस्सा उसके हिस्से में आ जाए।
आज भी केतकी ने बड़े चाव से सहजन की तरकारी और रोटी बनाई थी इसीलिए केतकी ने फुल्की को पुकारा। फुल्की मैंने तेरी पसंद का खाना बनाया है इसीलिए आजा मैं तुम्हें अपने हाथों से खिलाती हूं।
फुलकी अपनी चाची की बात सुनकर तुरंत आ गई।
अपनी घरवाली केतकी के मुंह से फुल्की को खाना खिलाने वाली बात सुनकर आज राधे से रहा नहीं गया और गुस्से में बोल पड़ा। यह तुझे फुल्की को रोज-रोज खिलाने की क्या आदत पड़ गई है।
फुल्की कौन सी अपनी बेटी है। जो तू उसका इस तरह लाड़ चाव करती है। मैं कह देता हूं, आज के बाद ऐसा नहीं चलेगा कहकर उसने फुल्की का हाथ पकड़ा और घर के बाहर निकालने लगा।
यह देखकर केतकी का खून खौल उठा वह तुरंत अपने पति राधे से फुल्की का हाथ छुड़वाकर कहने लगी। छोड़ो फुल्की का हाथ…. यह आप क्या कर रहे हो। मैं सब जानती हूं, आपका काका की खेत के हिस्से के लिए मन बिगड़ गया है । मगर आप इतना जान लीजिए।
मैं ऐसा होने नहीं दूंगी। मैं आपको कोई गलत काम करने नहीं दूंगी क्योंकि यह आप भी जानते हैं अंत समय में हमारे साथ कोई जमीन जायदाद कुछ साथ में नहीं जाने वाली है, तो क्यों इसके लिए बेवजह हमारे रिश्ते बिगाड़ने हैं। मैं कहती हूं कुछ दिन संतोष और प्रेम से गुजार के तो देखो।आपके मन को कितना संतोष मिलेगा।
अरे यह मासूम अपना और पराया क्या जाने। यह मासूम तो मेरे प्रेम के चलते चली आती है। ये हमेशा याद रखना, अपने और पराए वक्त ने बतलाए हैं ।
ये वक्त ही है जो अपने पराए की पहचान कराता है। मुझे शर्म आ रही है आज आपकी सोच पर… आज आप फुलकी के अपने होकर भी पराए हो गए और मैं एक पराए घर से आकर भी इसे अपना मान बैठी।
केतकी की बात सुनकर राधे को अपनी सोच पर बड़ी शर्म महसूस हुई और वह धीमे से बोल उठा। देख केतकी तू सही कह रही है। तू पराए घर से आकर भी से फुल्की को अपना मान बैठी और मैं इसका खुद का काका होकर भी इसे पराया कर बैठा।
सच कहूं तो इंसान का मन जैसा सोचता है । वही तो वक्त हमें दिखाता है कि कौन अपना है कौन पराया।
आज के बाद फुल्की सिर्फ तेरी बेटी नहीं, हम दोनों की बेटी है और बड़ी होने के बाद इसका हम ब्याह भी करेंगे और काका का खेत का हिस्सा मुझे नहीं चाहिए।
मुझे क्षमा कर दे। सच कहूं तो तेरे जैसी पत्नी अगर नहीं मिलती तो कौन मुझे सही राह दिखाता कहकर राधे फिर फुल्की के माथे पर स्नेह से हाथ फेरने लगा। केतकी यह सब देखकर बहुत खुश हो गई और तुरंत बोल उठी। जो हो गया अब भूल जाइए कहकर वह भी फुलकी के सर पर हाथ फेरने लगी। आज केतकी का मन बड़ा खुश था की चलो,उसके पति ने सही राह ले ली।
स्वरचित
सीमा सिंघी
गोलाघाट असम