प्रज्ञा एक शिक्षित, विवाहित महिला थी, जिसकी शादी को दस साल हो चुके थे। उसके दो प्यारे बच्चे, राहुल और प्रिया, उसकी दुनिया थे। लेकिन इन दिनों प्रज्ञा का मन अशांत था। घर में माहौल तनावपूर्ण था, और उसकी परेशानी की वजह थी उसके पति और ससुराल वालों का लगातार उस पर दबाव बनाना कि वह अपने पिता की संपत्ति में से अपना हिस्सा ले।
यह सब तब शुरू हुआ जब प्रज्ञा के पिता की तबीयत खराब रहने लगी। वे उम्रदराज़ थे और प्रज्ञा का भाई, जो उनके साथ ही रहता था, उनकी देखभाल कर रहा था। प्रज्ञा के पति अनिल को यह बात खटकने लगी कि यदि पिता की संपत्ति भाई के नाम हो गई, तो प्रज्ञा को कुछ नहीं मिलेगा। अनिल ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया और प्रज्ञा से कहा, “आजकल बेटियों का भी अपने पिता की संपत्ति में बराबर का अधिकार होता है। तुम्हें अपनी हिस्सेदारी मांगनी चाहिए।”
प्रज्ञा ने यह सुनकर विरोध किया, “अनिल, पापा ने हमें कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी। उन्होंने मुझे और भाई को हमेशा बराबर प्यार और सम्मान दिया। आज जब वह बीमार हैं, तो उनसे संपत्ति की बात करना गलत है।”
लेकिन अनिल और उनके परिवार के लिए यह सिर्फ नैतिकता का सवाल नहीं था। वे इसे एक अधिकार के रूप में देख रहे थे। अनिल ने कहा, “यह कोई नैतिकता की बात नहीं है। यह तुम्हारा कानूनी हक है। तुम्हें यह लेना ही होगा।”
प्रज्ञा इस बात को लेकर बहुत असमंजस में थी। उसे अपनी बचपन की यादें याद आने लगीं। उसके पिता ने उसे हमेशा प्यार दिया था। उन्होंने उसे और उसके भाई को समान रूप से पाला। प्रज्ञा को अच्छी शिक्षा दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने हमेशा कहा था, “बेटा, तुम लड़का हो या लड़की, यह मायने नहीं रखता। तुम हमारे लिए एक समान हो।”
लेकिन शादी के बाद सब बदल गया। प्रज्ञा अब ससुराल की हो गई थी। जब भी वह मायके जाना चाहती, उसे अपने पति और सास-ससुर से अनुमति लेनी पड़ती। अपने पिता की बीमारी के दौरान भी वह ज्यादा समय उनके पास नहीं बिता सकी। उसकी मां की मृत्यु के समय भी वह सिर्फ कुछ घंटों के लिए मायके जा पाई थी।
पिछले कुछ दिनों से प्रज्ञा हर रात इसी उधेड़बुन में थी कि उसे क्या करना चाहिए। एक तरफ उसका ससुराल था, जो उसे संपत्ति के लिए अपने अधिकार का दावा करने के लिए दबाव डाल रहा था। दूसरी तरफ, उसका दिल कह रहा था कि यह गलत है।
वह सोचने लगी, “क्या मुझे पापा की संपत्ति पर अधिकार जताने का हक है, जब मैं उनकी देखभाल के लिए वहां नहीं हूं? भाई ने ही उनके हर सुख-दुख में साथ दिया है। मैं तो उनकी सेवा भी नहीं कर पाई। ऐसे में संपत्ति मांगना क्या सही होगा?”
प्रज्ञा का यह द्वंद्व उसके पति और ससुराल वालों को समझ में नहीं आ रहा था। उनके लिए यह सिर्फ कानूनी अधिकार का मामला था। लेकिन प्रज्ञा के लिए यह एक नैतिक प्रश्न था।
एक रात, प्रज्ञा ने तय किया कि वह अपने दिल की सुनेगी। उसने महसूस किया कि अगर वह अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा लेगी, तो यह उसके भाई के लिए अन्याय होगा। वह जानती थी कि उसके भाई ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा अपने माता-पिता की देखभाल में बिताया है।
उस रात वह शांति से सो गई। उसके मन में कोई द्वंद्व नहीं बचा था। उसने तय कर लिया था कि वह अपने ससुराल वालों के दबाव में आकर कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगी, जो उसके नैतिक मूल्यों के खिलाफ हो।
सुबह प्रज्ञा देर से उठी। घर में पहले से ही हंगामा मचा हुआ था। सास कह रही थीं, “महारानी जी को तो आराम फरमाने की आदत है।
अनिल ने भी चिढ़कर कहा, “तुम्हारी यही लापरवाही हर बात को बिगाड़ देती है। तुम कब समझोगी कि हमें अपने भविष्य के लिए सोचना होगा?”
लेकिन इस बार प्रज्ञा शांत थी। वह सब कुछ सुन रही थी, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। उसने धीरे-धीरे खुद को संभाला और पूरे परिवार के सामने जाकर कहा, “मुझे आप सबसे बात करनी है।”
सब उसकी ओर देखने लगे। प्रज्ञा ने गहरी सांस ली और कहा, “मैंने फैसला कर लिया है। मैं अपने पिता की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं लूंगी।”
यह सुनते ही अनिल ने गुस्से में कहा, “तुम्हें हो क्या गया है? यह तुम्हारा अधिकार है।”
प्रज्ञा ने दृढ़ता से जवाब दिया, “यह अधिकार तभी सही है, जब मैं अपने कर्तव्यों को पूरा करती। मैंने अपने पिता की सेवा नहीं की। मैं उनके साथ नहीं रही। उनके सुख-दुख में उनका साथ मेरे भाई ने दिया है। ऐसे में संपत्ति पर अधिकार जताना मेरे लिए नैतिक रूप से गलत है।”
प्रज्ञा के इस फैसले से ससुराल वाले नाराज हो गए। सास ने ताने देते हुए कहा, “तुम तो हमेशा से अपने भाई की तरफदारी करती आई हो। तुम्हें अपने परिवार की कोई परवाह नहीं है।”
अनिल भी नाराज था। उसने कहा, “तुम्हें अपनी भावनाओं को काबू में रखना चाहिए। यह कानूनी मामला है।”
लेकिन प्रज्ञा ने शांत रहते हुए कहा, “मैंने यह फैसला सोच-समझकर लिया है। मेरे लिए नैतिकता और आत्मसम्मान अधिक महत्वपूर्ण हैं। मैं कोई ऐसा कदम नहीं उठाऊंगी, जिससे मेरे पिता की आत्मा को ठेस पहुंचे।”
प्रज्ञा के इस फैसले के बाद घर में कुछ दिनों तक माहौल तनावपूर्ण रहा। लेकिन धीरे-धीरे सब सामान्य होने लगा। प्रज्ञा ने अपने बच्चों की परवरिश और घर के कामों में खुद को व्यस्त कर लिया।
उसके इस फैसले ने उसे एक आंतरिक शांति और संतोष दिया। उसने महसूस किया कि उसने सही किया है। वह जानती थी कि उसके पिता जहां भी होंगे, उसके इस फैसले पर गर्व करेंगे।
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन बनाना कितना जरूरी है। संपत्ति के अधिकार को कानूनी दृष्टि से देखना एक बात है, लेकिन नैतिकता और भावनाओं के आधार पर निर्णय लेना एक अलग बात है।
प्रज्ञा ने यह साबित कर दिया कि कभी-कभी सही निर्णय लेना कठिन होता है, लेकिन जब हम अपने दिल और मूल्यों की सुनते हैं, तो वह हमें सच्ची शांति और संतोष देता है।
इस कहानी का संदेश हर उस व्यक्ति के लिए है, जो अधिकारों और कर्तव्यों के बीच उलझा हुआ है। अधिकार तभी सही होते हैं, जब हम अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाते हैं।
लेखिका : वर्तिका दुबे