अम्मा सब्जी ले लो आज तुम्हारी पसंद की भिंडी लाया हूं एक दम ताजी और नरम ,और अम्मा तुम बनाती भी बहुत अच्छी हो ऐसी भिंडी मैने किसी के हाथ की नहीं खाई ।वैसे तो तुम सब खाना अच्छा बनाती हो पर भिंडी की बात ही अलग है एक ही साँस मै कमल बोलता चला गया।
निशा जी बोली अरे सांस तो ले लेले ये बता मुझे पसंद है कि तुझे खानी है ।
कमल हंसने लगा बोला मुझे भी मिल जाएगी और आराम से घर के चबूतरे पर बैठ गया ।
ये कमल का रोज का काम बन गया सुबह सब्जी बेचने के बाद वो निशाजी के पास आ जाता उनके लिए वो सब्जी अलग ही रख लेता था ये सिलसिला तब से चल रहा था जब कमल अपने
पिताजी के साथ सब्जी बेचने आता था तब से निशा जी को अम्मा कहता था तब मात्र दस साल का था ।
जब पहली बार निशा ने देखा तो बोला कि तू पढ़ाई क्यों नहीं करता तो उसने कहा मेरा मन नहीं लगता मैं तो सब्जी ही बेचूंगा ।अम्मा उसके भोलेपन पर हंस देती।
कमल के पिताजी कहते बहनजी सच में इसका मन नहीं है मैने बहुत कोशिश करी कि ये पढ़ ले लेकिन ये स्कूल छोड़ कर इधर उधर घूमता है तो मैने सोचा गलत संगत मै पड़ जाए उस से अच्छा अपने साथ ही रख लूं अब इसकी मां भी नहीं जो ध्यान रखे ।निशा बोली हां ये भी ठीक है उन्हें कमल से और हमदर्दी हो गई इतनी कम उम्र में उसकी मां नहीं है।
निशा जी के एक बेटा था अरुण वो कमल के साथ का ही निशा जी उसके कपड़े खिलौने और कभी कुछ खाना या कुछ स्पेशल बनाती तो दे देती कमल निशा को अम्मां जी बोलता था निशा को भी अच्छा लगता था मोहल्ले में सब कहते तुम सब्जी वाले को क्यों लपका रही हो इन लोगों को ज्यादा नहीं लपकाना चाहिए फिर पैसे मांगने लगते और गायब हो जाते पर निशा को ऐसा कभी नहीं लगा और उन्हें भी कमल से लगाव हो गया समय के साथ अरुण बड़ा हो कर नौकरी करने दूसरे शहर चला गया।इसी बीच निशा के पति भी चल बसे अरुण ने बहुत कहा कि मेरे साथ चलो पर निशा की यहां नौकरी थी सब पहचान के थे तो उन्होंने मना कर दिया शुरू में अकेलापन लगता था कुछ बनाने का मन नहीं करता था निशा कुछ भी खा कर पेट भर लेती इधर कमल भी बड़ा हो गया था अब साथ में उसके पिताजी नहीं आते थे ।अब कमल से सब्जी भी कम लेती थी निशा ।
कमल को सब्जी न बिकने दुख नहीं था पर निशा के गुमसुम और ना खाने का दुख था उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे उसे एक उपाय सुझा दूसरे दिन वो आया बोला अम्मा आज तो मेरा आपके हाथ की भिंडी खाने का मन है मैने कब से नहीं खाई।
पहले तो निशा का मन हुआ मना कर दे पर कमल की भोली सूरत देख मना नहीं कर पाई कमल ने जिद्द करके निशा को भी खाना खिलाया उस दिन निशा ने बहुत दिनों बाद अच्छे से खाना ।
अब अक्सर कमल खाने की फरमाइश करता दोनों बैठ कर बाते करते निशा को धीरे धीरे खाना बनाना अच्छा लगने लगा अब जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आ रही थी कमल पहले से ज्यादा अपनी अम्मा का ध्यान रखता पहले निशा को लगता था वो अकेले रह लेगी लेकिन अब उसे लगता कि जिंदगी को किसी के सहारे की जरूरत होती है वो खुश थी कि उसे कमल के रूप में बेटे का सहारा मिल गया और कमल भी खुश था उसे अम्मा के रूप में मां का प्यार मिल गया दोनों को एक दूसरे का सहारा था जो दोनों की जिंदगी मैं खुशी के रंग बिखेर रहा था ।
कई बार हमें लगता है कि हम इतने सक्षम है या व्यस्त है या अकेलेपन में जीना आ गया हम जी तो लेते है पर ये भी उतना सच है कि किसी का सहारा हमारी जिंदगी को खुशी देता है वो सहारा कोई भी हो सकता है ।।
स्वरचित
अंजना ठाकुर
#सहारा