बेटा…! इस बार होली पर आ रहा है ना..?
रितेश: नहीं मां..! 1 दिन ही छुट्टी है… कहां 1 दिन के लिए इधर उधर दौड़ भाग करूं..?
साधना जी: बेटा…! ना जाने कितनी ही होली दिवाली गई, पर तेरा चेहरा नहीं दिखा…. बेटा..! हमारी भी उम्र बढ़ रही है, हम हमेशा तो नहीं रहेंगे ना… कहीं तेरी राह तकते तकते ही, इस दुनिया से विदा ना हो जाऊं…?
रितेश: क्या मां..? एक तो पूरे दिन ऑफिस का प्रेशर, ऊपर से आपका यह इमोशनल ड्रामा… तंग आ चुका हूं…
साधना जी: ठीक है बेटा…! तू ज्यादा परेशान ना हो… मैं तुझे अब कभी भी परेशान नहीं करूंगी और हां… मेरा गुस्सा खाने पर मत निकालना… खाना खा लेना… ठीक है बेटा…! अलविदा..! अलविदा..!
रितेश हड़बड़ाकर उठ बैठता है और बार-बार उसे अलविदा शब्द ही याद आ रहा था… ओह यह सब सपना था..? लेकिन बड़ा अजीब सपना था… मानो हकीकत ही हो….
फिर रितेश होली की छुट्टी पर घर जाने को तैयार होता है… और सोचता है यह खबर मां पापा को दे दूं… मां कितनी खुश होगी…! यह सोचकर रितेश सुबह-सुबह अपने पापा को फोन करता है….
हेलो पापा..!
पापा: हेलो बेटा…! कैसा है तू…? तू तो बस अपनी मां से ही बात करके फोन रख देता है… पापा से भी बात कर लिया कर कभी….
रितेश: पापा…! आ रहा हूं होली पर… जी भर कर बातें करेंगे….
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पापा: क्या बात है बेटा…? तेरी मां तो बहुत खुश होगी यह सुनकर… कल ही तुझे देखे कितना दिन हो गया..? कह रही थी…
रितेश: कहां है मां..? ज़रा उन्हें भी फोन दीजिए ना….
पापा: हां रुक… मैं अभी वॉक से आया हूं… वह उठी ही नहीं हैं शायद अब तक… रुक, उठाता हूं उसे… यह कहकर रितेश के पापा कमरे में जाते हैं और कहते हैं… अरे… साधना… उठो भी… देखो रितेश ने फोन किया है… वह होली पर घर आ रहा है…
साधना..! साधना…! कोई हलचल नहीं…. फिर रितेश का फोन रख, उसके पापा रोने चिल्लाने लगते हैं….
रितेश भी समझ जाता है, मम्मी तो तभी चली गई थी… जब वह मेरे सपने में आई थी… बस मुझसे आखरी बार मिलने आई थी…और अलविदा कहने आई थी…. मां है ना..? बच्चों का मोह मरनोपरांत भी रह ही जाता है….
दोस्तों… हम अपनी व्यस्तता में यह भूल जाते हैं, कि हमारे माता-पिता आजीवन हमारे साथ नहीं रहेंगे… सिर्फ आपका काम ही नहीं, उनकी उम्र भी बढ़ रही है… काम तो कभी खत्म नहीं होंगे, पर उम्र..? वह तो खत्म होगी ही… इसलिए वक्त रहते उन्हें वक्त दीजिए…
#5वां जन्मोत्सव
स्वरचित/मौलिक/अप्रकाशित
धन्यवाद
रोनिता कुंडू