अच्छे दिन का कोइछा – कंचन श्रीवास्तव आरजू

 

अभी कल ही तो तेरहवीं बीती है और आज …..ही हिस्सा बांट की बात वो भी सुजाता के मुंह से ,कुछ अच्छा तो नहीं लगा कमल को फिर भी कर ही क्या सकता है ,भाई अब तो कोर्ट ने भी आडर दे दिया है कि बाप की दम्पत्ति में बेटा और बेटी का बराबर का हक है तो भला वो क्या बोलता।

खचाखच मेहमानों से घर भरा था।और ऐसे में दीदी ने ऐसी बात कर दी,जिसकी की उनसे किसी को कभी कोई उम्मीद नहीं थी,होती भी कैसे अच्छे खासे सम्पन्न घर से जो है।

ढेरों जमीन जायदाद की मालकिन के साथ साथ सरकारी नौकरी पेशा मर्द की पत्नी हैं और सबसे बड़ी बात खुद की उम्र ही साठ की हो रही । दो बच्चे हैं जो अपने अपने में सेटेल है पढ़ लिखकर नौकरी भी कर रहे और बाल बच्चे दार भी है।

कुछ माजरा समझ में नहीं आ रहा।फिर भी उनके आगे बोले कौन?

सारे रिश्तेदारों के सामने तीनों भाइयों और दोनों बहनों के साथ मां और वकील दोनों को बैठाया गया।

सारी सम्पत्ति घर जमीन जेवर पैसा सभी का बंटवारा तीन भाइयों में बराबर बराबर कर दिया गया।

ये देख सबको आश्चर्य हुआ कि ये तो होना ही था।

फिर दीदी ने ऐसा क्यो किया।

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इस पर छोटे भाई ने कहा,दीदी आपने अपनी दोनों बहनों का तो हिस्सा लगाया नहीं तो वो बोली लगाती हूं लगाती हूं ठहरो अभी लगाती हूं कहती हुई मां के बगल में बैठती हुई बोली ।

वकील साहब मां को मिलने वाली पेंशन ‘ अनाथालय में दान दे दीजिए ‘

और हां सुनो तुम लोगों का अपना अपना परिवार है जिम्मेदारी है , फिर बाहर भी रहते हो।

ऐसे में मां को चार चार महीने अपने अपने घर बांटने की जगह तुम हमारे पास छोड़ दो।हम रखेंगे।

क्योंकि मां बांटी नहीं बाची जाती है

जो तुम लोग नहीं कर सकोगे।कहती हुई जो धोती मां ने पहनी थी उसी धोती में सबकुछ पीछे छोड़कर अपने साथ जाने को हुई तो छोटी बहु ने पैर पकड़कर सास के कहा ‘ दीदी का जो फर्द था उन्होंने किया।अब हमें भी अपना फर्ज निभाने दीजिए आप हमारे साथ रहिए ‘ मां हमें ऐसे अनुशासन हीन करके मत जाइए।

जिस घर में बड़े नहीं होते उस घर से अगर कुछ जाता है तो सबसे प ले अनुशासन।कहते हुए गले ने सास और ननद दोनों को लगा  ‘ मां जैसी उसे सम्पत्ति को अपने आंचल में समेट लिया जिसके आशीर्वाद से उसका हर हमेशा हरा भरा रहेगा। 

और एक बेटी का मन शांत की मां अकेली नहीं हैं।उसके अपने उसके साथ है।

सोच भाभी को गले लगा ,कार में बैठी और अच्छा चली हूं अच्छा दिन देखकर कोइछा डलवाने आऊंगी ।कहते हुए नमः आंखों से रुखसती लिया।

 

स्वरचित

कंचन श्रीवास्तव आरजू

 

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