आशीर्वाद

“वाह री नई बहू! सुबह-सुबह सोफे पर पैर चढ़ाकर बैठी है, हाथ में मोबाइल, सामने लैपटॉप… और सासू माँ वहाँ किचन में बर्तन खटखटा रही हैं। ज़रा-सा भी ख्याल नहीं कि घर में बड़ों की भी कोई ज़रूरत होती है कि नहीं!”

शारदा चाची ने ड्राइंग रूम से ही ऊँची आवाज़ में कहा ताकि उनकी बात सीधे रसोई तक पहुँचे और थोड़ा-बहुत तंज माला के कानों तक भी।

नीमा ने किचन से ही मुस्कुरा कर जवाब दिया,
“अरे चाची, माला ऑफिस का काम कर रही है, पता है ना आपको? उसके क्लाइंट्स बाहर के हैं, तभी तो सुबह से लैपटॉप खोलकर बैठी रहती है।”

“काम?” शारदा चाची ने भौंहें चढ़ाकर कहा,
“हमारे ज़माने में भी औरतें काम ही करती थीं। घर का काम सुबह से रात तक, पूरा ‘ऑफिस’ अकेले संभालती थीं। तब तो किसी ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ का नाम नहीं लिया। ये आजकल का नया बहाना है, ‘लैपटॉप पर काम है’, और रसोई खाली पड़ी रहती है।”

सोफे पर बैठी माला ने इतना ही कहा,
“चाची, बस दस मिनट में कॉल खत्म हो जाए तो चाय बना देती हूँ सबके लिए।”

“ना बहू, तू काम कर, चाय तो नीमा बना ही लेगी,”
शारदा चाची ने बड़ी मीठी-सी मगर चुभती हुई आवाज़ में कहा,
“वैसे भी अब तो सब कुछ बदल ही गया है, सासू माँ रसोई में रहें, बहू कंपनी में। नई रीति है, अपनानी तो पड़ेगी ही।”

नीमा ने बात टालने की कोशिश की,
“चाची, आप चाय पीजिए, मैं अभी बनाकर भेजती हूँ, फिर आराम से बैठकर बातें करते हैं।”

शारदा जी दो दिन पहले ही छोटे भाई के घर आई थीं। उनका अपना घर पास के कस्बे में था, जहाँ दो बेटे, दो बहुएँ और चार पोते-पोती थे, पर वहाँ से भरपेट शिकायतें लेकर ही तो आई थीं।

“कितना बदल गया है सारा ज़माना री,” वो आते ही नीमा से बोली थीं,
“मेरी बहुएँ तो बस अपने-अपने कमरे, अपने बच्चे और अपना मोबाइल जानती हैं। हमने तो सोचा था बुढ़ापे में बहुओं के हाथ का खाना खाएँगे, साथ बैठकर रोटियाँ सेंकेंगे, लेकिन यहाँ भी आकर देख रही हूँ, तू भी अब अकेली किचन में लग गई है।”

नीमा ने हँसते हुए कहा था,
“चाची, यहाँ तो मुझे अच्छा लगता है काम करना। माला ऑफिस का काम देख लेती है, बाहर की दुनिया समझती है, बैंक, ऑनलाइन पेमेंट सब वही संभालती है। मैं घर का देख लेती हूँ। बाँटकर चलें तो आसान लगता है सब।”

“अच्छा लगता होगा तुम्हें,”
शारदा चाची ने गर्दन हिलाकर कहा था,
“पर मेरी माँ कहती थीं—घर का काम बहुएँ करती हैं मिलकर, नौकरी हो या ना हो। ये लैपटॉप-वैपटॉप बस बहानों की दुनिया है।”

आज तीसरी सुबह थी। हर रोज़ की तरह माला जल्दी उठकर सबसे पहले बरामदे में रखे गमलों में पानी देती, नीम के पेड़ के नीचे रखी छोटी-सी तुलसी पर हाथ जोड़ती, फिर किचन में आकर दूध चढ़ा देती। उसके बाद वो नाश्ते की तैयारी में नीमा के साथ लग जाती, पर आज एक क्लाइंट की मीटिंग थी, तो नीमा ने खुद ही उसे बाहर भेज दिया था।

“तू जा न, बेगम साहिबा, मीटिंग कर,”
कल रात वो हँसते हुए बोली थी,
“चाची के सामने मुझे थोड़ा आपकी माँ बनकर अच्छा भी लगेगा।”

आज वही मज़ाक चाची के कानों में चुभ रहा था।
उन्हें लगता—“लड़की जितनी पढ़-लिख जाती है, उतनी ही हाथ की पकौड़ी छूट जाती है।”


दोपहर को खाना खाकर सब अपने-अपने कमरे में आराम करने चले गए। नीमा बुखार-सा महसूस कर रही थी, शरीर थोड़ा भारी लग रहा था।

“चल न जरा लेट जा,”
माला ने उसके कंधे को सहलाते हुए कहा,
“मैं किचन संभाल लूँगी। शाम की चाय मैं बना दूँगी, तुम बस आराम करो।”

“शाम की चाय?”
दरवाज़े से ही शारदा चाची की आवाज़ आई,
“अभी सुबह की चाय का कांड याद नहीं रहा तुम्हें? बहू को तो ठंडा दूध पीना था बस, किसी को पूछना नहीं था। अब शाम की चाय बनाकर क्या बड़ी कृपा करोगी घर पर?”

माला मुस्कुरा कर बोली,
“चाची, मैंने पूछा था नीमा से, आपने ही मना कर दिया था कि बहू ऑफिस जा रही है, उसे मत रोको। और रही बात दूध की, तो खाली पेट बिना कुछ पिए इतनी देर बैठ नहीं पाती न, इसलिए…”

“हाँ… हाँ… अच्छा है, तुम अपनी सफ़ाई खुद दे रही हो, मुझे क्या,”
शारदा ने नाक सिकोड़ी,
“हमारे ज़माने में तो सास के सामने पानी भी पूछकर पीते थे। ये भी कोई बात हुई कि सास बैठी रह जाए और बहू खुद जाकर फ्रिज से बोतल, दूध, सब निकाल ले।”

नीमा कुछ बोलती, उससे पहले माला ने बहुत शाँत स्वर में कहा,
“चाची, अलग-अलग ज़माने हैं न, रीतियाँ भी थोड़ी बदल गई हैं। आप जब जवान थीं, तब आपने अपने सास-ससुर के लिए जो किया, वही हम भी अपने तरीके से करना चाह रहे हैं। पर तरीका थोड़ा बदल गया है, बस इतना ही।”

“तरीके बदल जाएँ तो भी आदर नहीं बदलना चाहिए, बहू,”
शारदा ने कठोरता से कहा,
“और आदर सुबह सबसे पहले चाय और पानी से ही शुरू होता है। तुम्हारी जगह मेरी बहू होती न, तो मैं दो दिन में दिमाग ठिकाने लगा देती उसका।”

नीमा ने धीरे से माला का हाथ पकड़ा—“तू छोड़ न, बहस मत कर।”

माला ने सिर्फ इतना कहा,
“ठीक है चाची, कल से आपकी चाय सबसे पहले, वादा।”


अगले दिन रविवार था। ऑफिस की छुट्टी, लेकिन माला का एक ऑनलाइन ट्रेनिंग सेशन था जो सुबह दस बजे से दो घंटे चलना था।

नीमा सुबह-सुबह ही उठकर किचन में लग गई।
“आज तो मैं ही सब करूँगी,”
उसने मन ही मन ठान लिया था,
“कम से कम चाची को लगेगा कि बहू अकेली नहीं बैठी है।”

माला ने भी आठ बजे तक चाय, पराठा, सब में हाथ बँटाया।
दस बजते ही वो कमरे में चली गई और लैपटॉप ऑन कर लिया।
शारदा चाची बीच-बीच में झाँकती रहतीं—
“बंद कमरे में क्या कर रही है? पता नहीं सच में क्लास है या…?”
वो खुद ही सोचकर रह जातीं।

बारह बजे के करीब अचानक किचन से बर्तन गिरने की आवाज़ आई, साथ ही नीमा की हल्की-सी चीख।

माला ने मीटिंग बीच में छोड़कर लैपटॉप बंद किया और दौड़ती हुई किचन पहुँची।
नीमा गैस के पास कुर्सी पर खिसक कर बैठ गई थी, चेहरा पीला, हाथ काँप रहे थे।

“माँ!” माला लगभग चिल्ला ही पड़ी,
“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं बेटा, चक्कर-सा आ गया बस…”
नीमा ने संभलने की कोशिश की, पर आँखें बंद हो गईं।

“चाची! पापा!”
माला की आवाज़ पूरे घर में गूँज गई।

गौरव, माला का पति, दूसरे कमरे से भागकर आया।
शारदा भी घबराकर किचन की तरफ दौड़ीं।

“गौरव, पानी लाओ, माला, गैस बंद करो,”
शारदा ने झट से नीमा की पीठ सहलानी शुरू कर दी,
“अरे दबाव जरा कम हुआ है इसका, डर मत…”

माला ने तुरंत पानी के छींटे मुँह पर मारे, नीमा को कमरे में लिटाया।
गौरव डॉक्टर को फोन करने लगा, माला ने पैर के तलवों पर तेज़ी से मालिश की, थोड़ी देर में नीमा की आँखें खुलीं।

“कुछ नहीं हुआ माँ, बस कमजोरी है,”
माला ने मन ही मन खुद को शांत करते हुए कहा,
“आपकी छुट्टी हो गई आज की, अब एक हफ्ता आप बस आराम।”

डॉक्टर ने आकर ब्लड प्रेशर, शुगर चेक किया।
थोड़ी कमजोरी और थकान की वजह से नीमा को बेड रेस्ट की सलाह दी।

डॉक्टर जाते ही माला ने दरवाज़ा बंद किया, गौरव से कहा,
“आज से किचन मैं संभालूँगी, तुम बस माँ के साथ रहना।”

“पर तुम्हारा ऑफिस?”
गौरव ने चिंता जताई।

“ऑफिस इधर भी चल सकता है, पर माँ की देखभाल कहीं और से नहीं होगी,”
माला ने दृढ़ता से कहा।

शारदा चाची दरवाज़े पर ही खड़ी सब सुन रही थीं।
कुछ पल के लिए वो चुप रहीं, फिर खुद से बड़बड़ाईं—
“देखें, दो दिन में कितना चल पाता है ये नाटक। नौकरी वाली बहुएँ दो दिन घर संभालें, तो तीसरे दिन थक कर सब छोड़ देती हैं।”


अगले तीन दिन घर का पूरा नक्शा बदल गया।
सुबह पाँच बजे अलार्म बजते ही माला उठ जाती—
पहले दूध गरम, फिर चाय, फिर सब्ज़ी काटना, पराठे बेलना, गौरव के टिफिन की सब्ज़ी अलग, नीमा के लिए हल्का दलिया, चाची के लिए सादा पराठा और दही।
उसके बाद माला अपना लैपटॉप डाइनिंग टेबल पर रखकर काम शुरू कर देती, बीच-बीच में किचन में झाँकती रहती।
दोपहर को खाना, शाम को नाश्ता, रात को सूप…

एक दिन चाची ने धीरे से गौरव से कहा,
“इतना काम कर रही है तुम्हारी बीवी, कुछ मदद कर दिया करो। सारे काम और नौकरी भी… बहुत थक जाती होगी।”

गौरव मुस्कुराया,
“आप कहती हैं तो करूँगा चाची, वरना तो ये खुद मुझे रोक देती है। कहती है, ‘तुम माँ के साथ बैठो, बात करो, ये मेरे हिस्से का काम है।’”

शारदा अवाक रह गईं।
जो बातें वो अपने घर में सुनने को तरस जाती थीं—“माँ तुम बैठो, मैं करती हूँ”—वो यहाँ एक नौकरी वाली बहू खुद कह रही थी।
उनके मन में हल्की-सी चुभन हुई—अपने दो बेटों की याद आ गई, जो टिफिन ले जाते समय पूछते भी नहीं, “माँ, तुमने खाया या नहीं?”

चौथे दिन सुबह की बात है।
माला नीमा को दलिया खिला रही थी, तभी शारदा कमरे में आईं।
उन्होंने हल्के से नीमा के बालों पर हाथ फेरा, फिर सहज स्वर में बोलीं,
“मीरा… ओह, माफ करना… नीमा, आज बहुत थक गई होगी ये, पूरे हफ्ते से भाग-दौड़ कर रही है। तू आज सुबह का काम छोड़ दे बहू, मैं चाय बना देती हूँ सबके लिए।”

माला ने चौंककर उनकी तरफ देखा।
पहली बार उनके स्वर में कोमलता थी, ताना नहीं।

“नहीं चाची, मैं कर लूँगी,”
उसने आदत के अनुसार कहा।

“नहीं बहू,”
शारदा ने उसके हाथ थाम लिए,
“हर काम बाँट लेने से घर चलता है, किसी एक के ऊपर सब छोड़ देने से नहीं।
और तूने ये बात कर के दिखा दी है, सिर्फ कह कर नहीं।”

नीमा ने भी मुस्कुराकर कहा,
“चाची को मौका दीजिए न, कितने दिनों बाद उनके हाथ की चाय पीने का दिल कर रहा है।”

माला ने धीरे से कहा,
“जैसा आप दोनों कहें।”

शाम को जब नीमा बिस्तर पर बैठकर पुराने फोटो अल्बम देख रही थी, शारदा उनके पास आकर बैठ गईं।
काफी देर तक चुप्पी रही, फिर अचानक उन्होंने कहा,
“नीमा, मैं कल वापस अपने घर जाऊँगी।”

“इतनी जल्दी?”
नीमा ने चौंककर पूछा,
“अभी तो आपका मन लगा ही नहीं होगा।”

“मन तो… यहीं अटकने लगा है, बहन,”
शारदा ने हँसने की कोशिश की,
“पर वहीं भी तो घर है मेरा।
हाँ, जाते-जाते एक बात कहे बिना नहीं जा सकती।”

“क्या?”
माला भी वहीं आकर बैठ गई थी।

“मुझे लगा था, तुम जैसी लड़कियाँ सिर्फ अपने आप में रहती हैं,”
शारदा ने माला की तरफ देखते हुए कहा,
“मोबाइल, लैपटॉप, नौकरी… और घर के बुज़ुर्ग सिर्फ बोझ बन जाते हैं।
कल तक मैं तुम्हें अपनी बहुओं से कम समझती थी—सोचती थी, ‘मेरी बहुएँ तो कम से कम खुद बनाकर खिलाती हैं, ये तो महाराजिन का हाथ दिखाती है।’
पर इन चार दिनों में मैंने एक चीज़ समझी—रोटी बनाने से बड़ा काम है रिश्ते संभालना, और तू वो बखूबी कर रही है।”

माला की आँखें भर आईं।
“चाची, आप तो मुझे डाँटने का ही हक रखती हैं,”
उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,
“इतनी तारीफ़ एक साथ सुनने की आदत नहीं है मुझे।”

“डाँटने का हक तभी होता है जब इंसान खुद सही हो,”
शारदा ने धीरे से कहा,
“मैंने अपने घर में हमेशा यही किया—तुलना… कि ‘देखो, फलाँ की बहू ऐसा करती है, तुम क्यों नहीं?’
और आज नतीजा देख रही हूँ—सब अपने-अपने कमरों में बंद हैं।
तुम्हें देखकर लग रहा है, शायद मैं ग़लत मापदंड लेकर बैठी थी।
बहू को घर के काम से नहीं, उसके मन से, उसके रवैये से परखना चाहिए।”

नीमा भी भावुक हो गई।
“जीजी, जो हो गया सो हो गया, अब भी देर नहीं हुई है। दोबारा शुरू कीजिए सब।”

“शुरू तो करूँगी ही,”
शारदा ने आँखें पोंछते हुए कहा,
“पर पहले यहाँ से सीख ले जाऊँगी।
नीतू… ओह, माला, नाम भी पुराना ले रही हूँ,”
उन्होंने हँसते हुए अपनी ही गलती सुधारी,
“तू कल सुबह मेरे लिए चाय बनाएगी? और… एक निवाला तेरे हाथ की जो भी बन जाए, वही खाऊँगी।
शगुन नहीं दूँगी, आज नहीं—लेकिन अपने दिल से तेरा सम्मान ज़रूर दूँगी, जो शायद पहले नहीं दे पाई।”

“चाय तो रोज़ बनेगी चाची,”
माला ने झुककर उनके पैर छुए,
“पर शगुन आप लीजिएगा—आपके अनुभव का, आपके पूरे जीवन का। हम जैसे लोग तो उसी से सीखते हैं।”

अगले दिन जब शारदा अपने घर पहुँचीं, तो दोनों बहुओं ने औपचारिक-सी मुस्कान के साथ उनका स्वागत किया।
दोपहर को जब खाना कमरे में ही भेजा गया, तो उन्होंने पहली बार आवाज़ देकर कहा,
“रानी, अंजू… एक काम करोगी? आज सब साथ बैठकर खाएँगे, पुराने ज़माने की तरह।”

दोनों हैरान हुईं,
“पर माँजी, बच्चों के टेस्ट हैं, कमल ऑफिस से…”

“जितना हो सकता है, उतना ही सही,”
शारदा ने शांत स्वर में कहा,
“मुझे बस इतना करना है कि मैं जो गलती यहाँ तक करती आई हूँ, वो आगे ना हो।
तुम दोनों का भी एक-एक दिन बुढ़ापा आएगा, तब याद आएगा, साथ में बैठकर खाते हुए कितनी बातें रह गईं थीं जो हम कह ही नहीं पाए।”

दोनों बहुओं ने धीरे-धीरे ही सही, पर हामी भर दी।
पिज्ज़ा की जगह आज घर का सादा खाना था, पर प्लेट के साथ-साथ माहौल भी थोड़ा गरम था—प्यार से, उम्मीद से।

रात को अपने कमरे में लेटी शारदा ने मोबाइल उठाया, व्हाट्सऐप खोला।
‘फैमिली ग्रुप’ में एक मैसेज लिखा—

“आज समझ आया कि संस्कार सिर्फ रसोई नहीं, नीयत से पहचानो जाते हैं।
जिस बहू को मैं नौकरी की वजह से कम समझ रही थी, वही मुझे परिवार जोड़ने का सही तरीका सिखा आई।
ज़माना बदलता है, पर सम्मान का मानक वही रहना चाहिए—जो सभी के दिल को जोड़ दे, तो सही है।”

मैसेज भेजकर उन्होंने मन ही मन नीमा और माला को आशीर्वाद दिया।
दूर एक और शहर में, नीमा और माला भी उसी समय छत पर बैठे चाँद देख रही थीं—
और शायद तीनों के दिलों में एक साथ यही बात चल रही थी—

“रिश्ते काम बाँटने से नहीं, एहसास बाँटने से मज़बूत होते हैं।”

लेखिका : गरिमा चौधरी

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