आग(स्वतंत्र) – परमा दत्त झा : Moral Stories in Hindi

बाबूजी आप देखकर नहीं चल सकते क्या?-बहू घर में आते ही चिल्लाते हुए बोली।

क्यों क्या हुआ?-वे सहज भाव से पूछे।

अभी पोंछा लगाया था,अभी सारा काम फिर से करना होगा।

-अच्छा,वे बात को विराम देते हुए बोले।

अचानक हुए हमले से वे चौंक गये ।अब मैं परिचय दे दूं। श्वसुर हैं डाक्टर योगेश जो फिजिक्स के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं और अभी प्रख्यात कोचिंग में पढ़ा रहे हैं।इनकी पत्नी करीब दस साल पहले गुजर गयी जब ये सेवानिवृत्त हुए थे।तब से अपने एक मात्र बेटे रमण और उसकी पत्नी सुधा संग रहते हैं।आज भी सुबह सात से ग्यारह और चार से आठ बजे तक कक्षा लेते हैं।पेंशन और कोचिंग मिलाकर एक लाख रूपए महीने से ज्यादा कमाते हैं, मगर बेटा आलसी है,बी टेक करके बेकार बैठा है।बहू इनकी बहुत बोलती है मगर घर चलाती है।इधर कुछ दिनों से छोटी छोटी बातों पर जुबान ज्यादा चलने लगी है।

एक तो बुढ़ापा,दूसरा पत्नी के निधन ने तोड कर रख दिया है।सो आज घर में घुसते के साथ ही चिल्लाने लगी।

बेटे ने प्रेम विवाह किया था और दस साल के शादीशुदा जीवन में अभी तक कोई औलाद नहीं थी जिससे और दुखी थी।ये नोयडा का यह फ्लैट पत्नी के समय में ले लिया था।रोज मेट्रो से आना जाना करते थे। सुबह सबेरे निकल जाते।चाय नाश्ता वहीं करके बारह एक के बीच आते थे।तब तक मुश्किल से बेटे बहू उठकर चाय पीते या फिर बहू घर सफाई कर रही होती।

मगर आज हद हो गई जब इतनी बुरी लगी।ये कपड़े बदलकर खाने का पूछे तो आज तबियत ठीक नहीं है जुमैटो से मंगवा ले-कहती बहू हंसती हुई चली गई।

संयोगवश उसी समय उसका मायके से फोन आया-हां भाभी,रोज बूढ़े को दो चार सुनाती हूं।आज भी सुना दिया।अभी पोंछा लगाया अभी गंदगी फैला दी।

अच्छा यह बात है,-यह समझकर मुस्कुराने लगे।देवी जी को मायके से आपरेट किया जा रहा है।

अचानक ही ये उठे और खाना मंगाकर खा लिए।

फिर बिस्तर पर सो लिए। दोपहर में बेटे बहू ने खाना मंगाकर पे करना चाहा तो एकाउंट ब्लांक था‌।

पापा,यह क्या है -बेटा चिल्लाते हुए दरवाजा पीटने लगा।

क्यों क्या हुआ?-

मेरा पेटीएम ब्लाक है।

नहीं ,आप अब मेरा पैसा नहीं ले सकते,जो करना है अपने पैसे से करो‌।-ये सहज भाव से बोले।

अरे पापा ,आपको पता है मैं कमाता नहीं हूं -वह चिड़चिड़ा होकर बोला।

ठीक बेटा-अब मैं बूढ़ा हो गया, मैं अपना खर्च मुश्किल से उठा पाता हूं।आप कमाओ और खर्च करो। मैं खाना बनाने के लिए बाईं लगा लूंगा,जो मेरा खाना और बाकी काम कर देगी।-ये सहज भाव से बोले।

फिर उत्तर की प्रतिक्षा किए बिना गेट बंद कर सो गए।

अब दोनों को दिन में तारे नज़र आने लगे।यदि बूढ़े ने ऐसा किया तो हम भूखे मर जाएंगे।

अब क्या करें,-बहू चिंतित होकर बोली।

कुछ नहीं पापा से माफी मांग लो-बेटे बहू गिड़गिड़ाने लगे। उन्हें उनकी औकात समझ में आ गई थी।

बस आपका सारा काम करूंगी,आप हमारा ख़र्च उठालो।

नहीं बेटा, मुझे जरूरत नहीं है। जहां अपने घर में गाली मिले।बेटा बहू होते हुए जोमैटो से खाना मंगाकर खायें, फिर ज़रूरत क्या है?

सो बेटा जी आप कहीं और व्यवस्था जमा लो,अलग रहो, अपना कमाओ खाओ,इतने दिन मैंने संभाला अब और नहीं।-ये शांत स्वर में बोलकर चले गए।मगर बेटे बहू के मन में #आग लगा गये। उन्हें दिन में तारे नज़र आ रहे थे।

(रचना मौलिक और अप्रकाशित है इसे मात्र यहीं प्रेषित कर रहा हूं।)

#दिनांक-28-8-2025

#कुल शब्द-700कम से कम 

#रचनाकार-परमा दत्त झा, भोपाल।

#साज़िश

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