एक शहीद के उद्गार…

माँ, जन्म तूने मुझे था दिया

आज अंतिम सफर पर मैं चल दिया

पर, दुखी न होना, कोख लजाई नहीं मैंने

तनकर सीने पर गोली खाई है मैंने

अंतिम समय भी गोद तेरी याद आई

छुटकी की तरह करनी पड़ेगी ,मेरी भी विदाई

लेकिन माँ मेरी, तुम आँसू बहाना नहीं

क्योंकि  तेरे बेटे ने हार जाना नहीं

मरकर भी किले फतह कर लिया

आज अंतिम सफर पर मैं चल दिया

पिता की ऊँगली पकड़ कर चला था मैं

एक पल में गिरा, पल में उठा था मैं

सोचा था, कंधों पर ले दुनिया घुमाऊँगा

श्रवण की कहानी सच कर दिखाऊँगा

पर अंतिम कर्ज भी चुक न सकेगा

कंधे पर फिर आपके ही जाना पड़ेगा

जानता हूँ, यह बोझ बहुत भारी है फिर भी

पापा , अंतिम बार इसे उठाना ही पड़ेगा

कैसी परीक्षा उसने तुमसे है लिया

आज अंतिम सफर पर मैं चल दिया

ले छुटकी, तेरी चुटिया मैंने छोड़ दी

राखी की कसम भी मैंने तोड़ दी

पर वचन रक्षा का मैंने निभाया

प्यारे वतन को अपने सीने में छुपाया

आखिरी लड़ाई भी तुझसे मैंने लड़ लिया

आज अंतिम सफर पर मैं चल दिया

प्रिय , आज एक पल भी गुस्साना नहीं

किसी की बात दिल से लगाना नहीं

देखना, माँ-बाबूजी कभी दुख से न हारें

क्योंकि छोड़ा है मैंने उन्हें तेरे सहारे

मुन्ने की लोरी में मुझे भी बुलाना

गर्व से चौड़ी हो छाती मेरी , इसे ऐसा बनाना

सोलह श्रृंगार तेरा कभी भी न छूटे

नहीं तो  रह न पाएगा मेरा दिल , बिना टूटे

मुन्ने ने इस विरह को मिलन बना दिया

आज अंतिम सफर पर मैं चल दिया…

                             ……वीणा

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