आज पूरे छह महीने बाद उनकी लाडली बेटी शालिनी ससुराल से दो दिनों के लिए मायके आई थी। बेटी के आने की खुशी किसी भी मां के लिए दुनिया की सबसे बड़ी दौलत होती है। देवकी जी की आंखों में सिर्फ अपनी बेटी का चेहरा घूम रहा था—कैसे वह बचपन में उनके आंचल से लिपटी रहती थी, कैसे पूरे घर को अपनी चहक से सिर पर उठाए रखती थी।
देवकी जी ने बैठक में आकर सोफे की गद्दियां ठीक कीं और फिर ऊंची आवाज में पुकारा, “शालिनी… अरे ओ शालिनी! कहां रह गई मेरी बच्ची? बाहर निकल, धूप में बैठ जरा। कब से तुझे देखा नहीं, आंखें तरस गई थीं।”
लेकिन बैठक या बरामदे से कोई आवाज नहीं आई। देवकी जी ने सोचा शायद वह अपने पुराने कमरे में सामान व्यवस्थित कर रही होगी। वे कमरे की ओर बढ़ीं, पर कमरा खाली था। तभी उन्हें रसोई के भीतर से खुरचनी चलने और किसी के धीमी आवाज में खिलखिलाने की आहट सुनाई दी।
देवकी जी चौंककर रसोई के दरवाजे तक पहुंचीं। वहां का नजारा देखकर उनके माथे पर हल्की सी सिलवटें उभर आईं। शालिनी चूल्हे के पास खड़ी थी, हाथ में लकड़ी का चमचा लिए वह बड़ी सी कड़ाही में बेसन और मेवे भून रही थी। पास ही बड़ी बहू नैना खड़ी थी, जो गोंद और मखाने को सिलबट्टे पर दरदरा कूट रही थी। दोनों में इतनी गहरी बातें चल रही थीं कि उन्हें देवकी जी के आने की भनक तक नहीं लगी।
देवकी जी का ममतामयी मन अपनी बेटी को इस तरह काम में लगा देख आहत हो गया। वे तुरंत आगे बढ़ीं और शालिनी का हाथ पकड़ते हुए उलाहना भरे स्वर में बोलीं, “शालिनी! तू यहाँ क्या कर रही है री? दो दिन के लिए तो तू सांस लेने मायके आई है। ससुराल में चौका-बर्तन करते-करते कमर टूट जाती होगी, और यहाँ आते ही तू फिर इस धुएं और आंच के सामने आकर खड़ी हो गई? चल, बाहर निकल। आंगन में बैठ आराम से, मैं धूप में तेरी तेल मालिश करती हूँ। बहू बना देगी बेसन के लड्डू और गोंद का पाक… वह यहीं सब लेकर आ जाएगी।”
शालिनी ने चमचा कड़ाही के किनारे टिकाया, अपनी मां की ओर देखा और एक मीठी सी मुस्कान के साथ उनका हाथ थाम लिया। शालिनी बोली, “मां, आप भी ना… बस यही बात तो मैं भी कब से सोच रही थी। मैं तो यहां दो दिन के लिए आई हूँ आराम करने, लेकिन भाभी तो पूरे तीन सौ पैंसठ दिन इसी रसोई में खटती हैं। सुबह की चाय से लेकर रात के दूध तक, उनका एक भी दिन ऐसा नहीं होता जब उन्हें अपनी मर्जी से दो घड़ी बैठने को मिले। जब मैं आई, तो देखा भाभी अकेले इतनी बड़ी कड़ाही में सर्दियों की खुराक बनाने में पसीने-पसीने हो रही थीं। क्या इनका शरीर नहीं थकता मां? अगर मैं इनके साथ हाथ बंटा दूंगी, तो हम दोनों मिलकर यह काम आधे घंटे में खत्म कर लेंगे। फिर हम तीनों—आप, मैं और भाभी—धूप में बैठकर ढेर सारी गपशप करेंगे।”
शालिनी की यह सहज और खरी बात सुनकर देवकी जी के कदम जैसे वहीं जम गए। उनकी आंखों में एक गहरा संकोच तैर गया। वे अपनी बेटी के चेहरे को देखती रह गईं। जिस ममता को वे सिर्फ अपनी कोख से जन्मी संतान तक सीमित समझ रही थीं, उनकी अपनी बेटी ने उस ममता की परिधि को एक ही झटके में कितना बड़ा कर दिया था। देवकी जी ने मन ही मन सोचा—क्या सच में उन्होंने कभी नैना के थकने की परवाह की थी? क्या उन्होंने कभी सोचा था कि बहू भी किसी की लाडली बेटी है, जो अपने सारे सपने और अपनी मां का आंचल छोड़कर इस घर को अपना सर्वस्व सौंप चुकी है?
नैना ने झेंपते हुए शालिनी से कहा, “अरे नहीं शालिनी, तुम मां जी की बात सुनो। जाओ, बाहर बैठो। मुझे तो आदत है, मैं सब संभाल लूंगी। तुम इतने दिनों बाद आई हो, तुम रसोई में खड़ी रहोगी तो मां जी को बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा।”
तभी देवकी जी ने एक गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर छाई कठोरता और चिंता पिघलकर एक बेहद कोमल मुस्कान में तब्दील हो गई। उन्होंने आगे बढ़कर शालिनी के हाथ से खुरचनी नहीं ली, बल्कि रसोई के कोने में रखे एप्रन को उठाया और अपने गले में डाल लिया।
“नहीं नैना,” देवकी जी की आवाज में एक गजब का ठहराव और अपनापन था, “शालिनी ने आज मेरी बंद आंखें खोल दी हैं। ठीक तो कह रही है यह। घर की जिम्मेदारियां और रसोई की आंच किसी एक की बपौती नहीं होती। जब हम तीनों मिलेंगी, तो कड़ाही भी जल्दी उतरेगी और बातें भी चौगुनी होंगी। ला, यह गोंद मुझे दे, मैं कूटती हूँ। तू बेसन चला और शालिनी, तू इलायची कूटकर मेवों को बारीक काट ले।”
रसोई का माहौल एक पल में बदल गया। नैना ने चौंककर अपनी सास की ओर देखा। उसकी आंखों के कोरों में हल्की सी नमी चमक उठी। पिछले तीन सालों में यह पहला मौका था जब देवकी जी खुद रसोई में बहू के साथ कंधे से कंधा मिलाकर किसी काम में जुटी थीं। वह भी किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि पूरे प्यार और अधिकार के साथ।
तीनों औरतों की चूड़ियां खनकने लगीं। बेसन की सोंधी महक पूरे घर में फैल गई। शालिनी अपनी ससुराल के मजेदार किस्से सुना रही थी, नैना अपने मायके की खट्टी-मीठी यादें साझा कर रही थी, और देवकी जी बीच-बीच में दोनों को जीवन के तजुर्बे सिखाते हुए हंस पड़ती थीं। उस छोटी सी रसोई में ऐसा लग रहा था मानो बरसों की जमी बर्फ पिघल रही हो।
देवकी जी मन ही मन एक गहरे आत्ममंथन में डूब गई थीं। वे सोच रही थीं कि आखिर समाज ने बहू और बेटी के बीच यह अदृश्य दीवार क्यों खड़ी कर दी है? बेटी जब मायके आती है, तो मां चाहती है कि वह रानी बिटिया बनकर हुक्म चलाए, उसे पलकों पर बिठाया जाए। लेकिन वही मां जब सास बनती है, तो बहू से यह उम्मीद क्यों करने लगती है कि वह बिना थके, बिना उफ किए मशीन की तरह खटती रहे? क्या बहू का कोई मन नहीं होता? क्या उसके सपनों, उसकी थकान और उसके आत्मसम्मान की कोई कीमत नहीं? आज अगर शालिनी ने यह कदम न उठाया होता, तो शायद वे कभी इस बात को समझ ही न पातीं कि घर का असली सुख किसी एक पर हुक्म चलाने में नहीं, बल्कि सबके सुख-दुख को साझा करने में है।
बातों-बातों में लड्डू का मिश्रण तैयार हो गया। तीनों ने मिलकर एक बड़ी सी परात में उसे निकाला और गोल-गोल लड्डू बांधने लगीं। काम इतनी जल्दी और इतने हल्के-फुल्के अंदाज में निपट गया कि किसी को थकान का अहसास तक नहीं हुआ।
शालिनी ने पहला गरम लड्डू उठाकर अपनी मां के मुंह में डाला, “बताओ मां, कैसा बना है?”
देवकी जी ने स्वाद चखा और उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने शालिनी का माथा चूमा और फिर दूसरा लड्डू उठाकर नैना के मुंह में डालते हुए बोलीं, “स्वाद तो बहुत लाजवाब है बेटी, लेकिन इस लड्डू में बेसन और मेवों से ज्यादा उस प्यार की मिठास है जो आज इस रसोई में घुली है। आज मुझे समझ आया कि जब तक हम बहू को सिर्फ ‘बहू’ समझते रहेंगे, तब तक वह घर को सिर्फ एक जिम्मेदारी समझेगी। लेकिन जिस दिन हम उसे बेटी मानकर उसका हाथ थाम लेंगे, वह घर सच में स्वर्ग बन जाएगा।”
नैना अपने आंसुओं को रोक न सकी। उसने आगे बढ़कर देवकी जी के कंधे पर सिर रख दिया। देवकी जी ने अपनी दोनों बांहों में एक तरफ बहू को और दूसरी तरफ बेटी को समेट लिया। उस आलिंगन में कोई परायापन नहीं था, कोई औपचारिकता नहीं थी। सिर्फ एक मां का अगाध वात्सल्य था, जो अब दो हिस्सों में नहीं बंटा था, बल्कि दोगुना हो चुका था।
दोपहर को जब घर के पुरुष काम से लौटे, तो उन्होंने घर का नजारा ही बदला हुआ देखा। आंगन में धूप खिली हुई थी। बीच में एक बड़ी मेज पर गरमा-गरम चाय और घर के बने ताजे लड्डू रखे थे। देवकी जी, शालिनी और नैना तीनों एक साथ बैठी धूप सेक रही थीं और किसी बात पर खिलखिलाकर हंस रही थीं। घर के हर कोने में एक ऐसी सकारात्मक ऊर्जा और खुशहाली तैर रही थी, जो शब्दों से परे थी।
शालिनी ने अगले दिन जब विदा ली, तो उसने अपनी मां के कान में धीरे से कहा, “मां, अब मुझे ससुराल लौटते हुए कोई फिक्र नहीं होगी। मुझे पता है कि मेरी मां के पास अब एक नहीं, बल्कि दो बेटियां हैं जो एक-दूसरे की ढाल बनकर इस घर को संभाले हुए हैं।”
देवकी जी ने मुस्कुराते हुए बेटी को विदा किया और मुड़कर जब उन्होंने घर के भीतर कदम रखा, तो नैना ने आगे बढ़कर उनके हाथ से उनका शॉल लिया और बोली, “मां जी, चलिए भीतर बैठिए, हवा ठंडी हो गई है। मैं आपके लिए अदरक की चाय बनाती हूँ।”
देवकी जी ने नैना के गाल को प्यार से सहलाया और कहा, “अकेले नहीं बनाएगी मेरी बच्ची… चल, हम दोनों मिलकर बनाते हैं।”
एक विचार आपके लिए: अक्सर हमारे घरों में यह देखा जाता है कि बेटी के आते ही बहू पर काम का बोझ दोगुना हो जाता है, क्योंकि मां चाहती है कि बेटी सिर्फ आराम करे। लेकिन क्या एक समझदार बेटी और संवेदनशील मां का यह फर्ज नहीं बनता कि वे बहू को भी वही सम्मान और विश्राम दें जिसकी वे अपनी बेटी के लिए उम्मीद करती हैं? आपकी नजर में क्या एक सास सच में बहू को अपनी बेटी का दर्जा दे सकती है? अपने अनमोल विचार कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : लतिका श्रीवास्तव