नजरिया

मनोरमा जी ने अपने बेटे को देखा, तो उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्हें लगा कि बेटा बहू के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। उन्होंने बेटे को अपनी ओर खींचते हुए तीखे स्वर में कहा, “आकाश, तू बहुत भोला है रे! यह कोई बच्ची नहीं है, पूरी बीस साल की जवान लड़की है। मैं जब से इस घर में आई हूं, अपनी आंखों से सब देख रही हूं। कभी यह तेरे साथ सोफे पर बैठकर घंटों बतियाती है, कभी तुझसे हंसी-मठोली करती है, कभी तेरे सिर में तेल की मालिश करने बैठ जाती है, तो कभी तुझे अपने हाथ से नाश्ता परोसती है। मुन्नी को संभालने के बहाने हमेशा तेरे इर्द-गिर्द मंडराती रहती है। बहू, रिश्तों के बीच की डोर बहुत नाजुक और कच्ची होती है, इसलिए मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींचना बहुत जरूरी है।”

 मनोरमा जी आरामकुर्सी पर शॉल लपेटे बैठी थीं। तभी उनकी नजर किचन से निकलती एक दुबली-पतली लड़की पर पड़ी। वह हाथ में नाश्ते और गर्म अदरक वाली चाय की ट्रे थामे सीधे उन्हीं की ओर बढ़ रही थी। उस लड़की का नाम पल्लवी था—मनोरमा जी की बहू अंजलि की छोटी बहन। मनोरमा जी के माथे पर सिलवटें गहरी हो गईं। करीब बीस दिन पहले जब से वे अपने बेटे आकाश और बहू अंजलि के पास आई थीं, तब से पल्लवी की मौजूदगी उनके सीने में एक कांटे की तरह खटक रही थी। उन्हें लग रहा था कि यह लड़की उनके बेटे की कमाई पर मुफ्त की रोटियां तोड़ रही है और उनके पारिवारिक सुकून में बेवजह दखल दे रही है।

पल्लवी ने बेहद अदब और सहज मुस्कान के साथ चाय की प्याली और नाश्ते की प्लेट टेबल पर रखी और धीमी आवाज में कहा, “मां जी, आपकी चाय। थोड़ा गर्म है, संभालकर पीजिएगा।”

मनोरमा जी ने चाय की चुस्की ली, फिर तिरछी नजरों से पल्लवी को सिर से पांव तक देखा। आज वे अपने भीतर के उबलते गुस्से को और ज्यादा दबाकर नहीं रख सकीं। तल्ख लहजे में बोलीं, “अरे पल्लवी, एक बात बताओ, तुम्हारी छुट्टियां खत्म नहीं हुईं क्या? अंजलि ने तुम्हें फिर से बुला लिया या तुम्हारा खुद का ही यहां से बोरिया-बिस्तर समेटने का कोई इरादा नहीं है? हफ्ते-दस दिन की बात समझ आती है, पर तुम तो जैसे यहीं की होकर रह गई हो।”

पल्लवी के हाथ वहीं ठिठक गए। उसका चेहरा फक पड़ गया। उसने अपनी नजरें झुका लीं और सधे हुए स्वर में सफाई देने की कोशिश की, “नहीं मां जी… दीदी ने जबरदस्ती नहीं बुलाया। दरअसल, यहां शहर में मेरी बैंकिंग की मुख्य परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग शुरू हुई है। इसलिए आई हूं… अगले पांच-छह महीने यहीं रहकर पढ़ाई पूरी करनी है।”

मनोरमा जी की त्योरियां और चढ़ गईं। उन्होंने हाथ का कप जोर से तश्तरी पर पटका, “क्या? पांच-छह महीने? होश में तो हो तुम? तुम्हारी मां वहां छोटे कस्बे में अकेली रहती हैं, उनका ध्यान कौन रखेगा? और अपनी पढ़ाई वहीं रहकर क्यों नहीं की जा सकती? क्या अब छोटे शहरों में किताबें नहीं मिलतीं या वहां बच्चे अफसर नहीं बनते? खामखाह यहां आकर खर्च बढ़ाने की क्या जरूरत थी? वैसे भी तुम लोगों के सिर पर न तो पिता का साया है और न कोई कमाने वाला भाई। ऐसे हालात में तो इंसान को पैर देखकर चादर फैलानी चाहिए, न कि बड़े शहरों के महंगे शौक पालने चाहिए।”

पल्लवी के गले में आंसुओं का एक भारी गोला अटक गया। उसके पिता का साया बचपन में ही उठ चुका था। मां ने सिलाई-कढ़ाई करके दोनों बेटियों को जैसे-तैसे पाला-पोसा था। पिता और भाई के न होने की बात सुनकर उसका आत्मसम्मान बुरी तरह आहत हुआ। वह कुछ बोल पाती, इससे पहले ही रसोई से निकलकर अंजलि वहां आ पहुंची। अंजलि ने अपनी सास के तेवर भांप लिए थे। उसने स्थिति को संभालते हुए हाथ जोड़कर कहा, “मां जी, मैंने तो पल्लवी को आने से मना किया था, पर आकाश ने ही जोर देकर कहा था कि पल्लवी होनहार है और अगर वह यहां रहकर तैयारी करेगी, तो उसका भविष्य संवर जाएगा।”

मनोरमा जी अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुईं और अपनी बहू पर बरस पड़ीं, “बहू, मेरा बेटा सीधा है, इसलिए तुम लोगों ने उसे अपनी उंगलियों पर नचाना शुरू कर दिया है! यह मेरे बेटे का घर है, कोई धर्मशाला नहीं कि जिसका जब मन चाहे, अपना झोला उठाकर यहां डेरा डाल दे। पहले जब तुम दोनों अकेले थे, तब की बात अलग थी। अब मैं भी यहां आ गई हूं। अगर इसे इतनी ही बड़ी अफसर बनने की सनक सवार है, तो बाहर किसी हॉस्टल या पीजी में रहकर पढ़ाई करे। मेरे बेटे के सिर पर बोझ बनने की क्या जरूरत है?”

अंजलि की आंखों में बेबसी के आंसू छलक आए। उसने रुंधे गले से कहा, “मां जी, किताबों और कोचिंग की भारी फीस किसी तरह मां ने अपनी बचत तोड़कर भरी है। उसके बाद हर महीने हॉस्टल और मेस का खर्च उठाने की हमारी बिल्कुल हैसियत नहीं थी… इसलिए आकाश ने खुद कहा कि घर में एक कमरा खाली ही तो पड़ा है, बच्ची यहीं रहकर पढ़ लेगी।”

मनोरमा जी ने एक उपहास भरी हंसी हंसते हुए ताना मारा, “अरे मेरी अकलमंद बहू, जब तुम्हारी मां की औकात ही नहीं थी इतना बड़ा खर्च उठाने की, तो फिर इसे इतने बड़े शहर में भेजने का सपना ही क्यों देखा? अपने इलाके में रहकर कोई छोटी-मोटी नौकरी तलाशती, कंप्यूटर चलाती या फिर किसी भले घर में इसकी शादी करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़तीं समधन जी। पराए घर में बैठकर मुफ्त की रोटियां तोड़कर कोई रानी लक्ष्मीबाई नहीं बन जाता।”

सास के मुंह से ‘औकात’ शब्द सुनकर अंजलि का कलेजा छलनी हो गया। पल्लवी की आंखों से आंसू बहकर गालों पर आ गिरे। वह चुपचाप अपना सिर झुकाए खड़ी कांप रही थी।

अंजलि अपनी बात पूरी करने ही वाली थी कि बेडरूम का दरवाजा खुला। आकाश, जो ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था, पिछले दस मिनट से हॉल में चल रही हर एक बात को खामोशी से सुन चुका था। उसके चेहरे पर नाराजगी और दुख के मिले-जुले भाव थे। वह तेजी से हॉल में आया और सीधे अपनी मां के सामने आकर खड़ा हो गया।

“मां, आपको पल्लवी के यहां रहने से आखिर इतनी क्या तकलीफ है? वह कोई गैर नहीं है, हमारी अपनी बच्ची है। सिर्फ अपनी जिंदगी बनाने के लिए पढ़ाई ही तो कर रही है, उसे शांति से पढ़ने क्यों नहीं देतीं आप?” आकाश की आवाज में एक दृढ़ता थी।

मनोरमा जी ने अपने बेटे को देखा, तो उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्हें लगा कि बेटा बहू के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। उन्होंने बेटे को अपनी ओर खींचते हुए तीखे स्वर में कहा, “आकाश, तू बहुत भोला है रे! यह कोई बच्ची नहीं है, पूरी बीस साल की जवान लड़की है। मैं जब से इस घर में आई हूं, अपनी आंखों से सब देख रही हूं। कभी यह तेरे साथ सोफे पर बैठकर घंटों बतियाती है, कभी तुझसे हंसी-मठोली करती है, कभी तेरे सिर में तेल की मालिश करने बैठ जाती है, तो कभी तुझे अपने हाथ से नाश्ता परोसती है। मुन्नी को संभालने के बहाने हमेशा तेरे इर्द-गिर्द मंडराती रहती है। बहू, रिश्तों के बीच की डोर बहुत नाजुक और कच्ची होती है, इसलिए मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींचना बहुत जरूरी है।”

आकाश और अंजलि दोनों सन्न रह गए। मनोरमा जी यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने अपनी संकीर्ण सोच का सबसे जहरीला तीर छोड़ते हुए कहा, “कहने को तो पल्लवी तेरी साली लगती है, लेकिन दुनिया जानती है कि जीजा-साली का रिश्ता समाज में कितना बदनाम और चटखारेदार माना जाता है! अगर यह जवान लड़की महीनों तेरे घर में रहेगी, तो पास-पड़ोस और नाते-रिश्तेदार तरह-तरह की बातें बनाएंगे। मैं अपने खानदान की इज्जत पर कोई दाग नहीं लगने दूंगी। मैं तो बस तुम लोगों को सचेत कर रही हूं ताकि कल को बदनामी का घूंट न पीना पड़े।”

यह सुनते ही पल्लवी जोर-जोर से सुबकने लगी। उसके लिए अपनी ही बड़ी बहन के घर में ऐसे गंदे लांछन की कल्पना करना भी नामुमकिन था। उसे लगा मानो धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए। अंजलि के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसकी नजरों के सामने अंधेरा छाने लगा कि उसकी अपनी सास उसकी सगी मासूम बहन के चरित्र पर ऐसा घिनौना आरोप लगा रही हैं।

आकाश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने अपनी मां की ओर देखा। उसकी आंखों में मां के प्रति आदर तो था, लेकिन इस गिरी हुई सोच के लिए रत्ती भर भी सहमति नहीं थी। उसने गहरी सांस ली, अपनी आवाज को पूरी तरह संयमित किया और आगे बढ़कर पल्लवी के सिर पर अपना हाथ रख दिया।

“मां, ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना’!” आकाश ने बेहद गंभीर और वजनदार आवाज में कहा। “लेकिन मां, दुनिया क्या कहती है, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि हमारे अपने दिल और नीयत में क्या है। मेरी नीयत में कोई खोट नहीं है और न ही पल्लवी के मन में कोई मैल है। मेरे लिए जैसे मेरी अपनी सगी बहन श्वेता है, वैसे ही पल्लवी है। मैंने कभी इन दोनों बहनों में कोई फर्क नहीं समझा और न कभी मरते दम तक करूंगा। जिस रिश्ते में पवित्रता और विश्वास की नींव हो, उसे दुनिया की कोई गंदी जुबान हिला नहीं सकती।”

मनोरमा जी बेटे का यह रूप देखकर हक्की-बक्की रह गईं। वे तुनककर बोलीं, “अच्छा! तो अब तू अपनी मां को मर्यादा का पाठ पढ़ाएगा? एक पराई लड़की के लिए तू अपनी मां की बात को ठुकरा रहा है?”

“पराई लड़की नहीं है मां, वह इस परिवार का हिस्सा है!” आकाश ने स्पष्ट शब्दों में कहा। “जब मेरे पिता नहीं रहे थे, तब आपने दिन-रात मेहनत करके, समाज के ताने सहकर मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया था। तब आपने ही मुझे सिखाया था कि बिना सहारे के जीना कितना मुश्किल होता है। आज जब पल्लवी की मां अपने सीमित साधनों में अपनी बेटी को अपने पैरों पर खड़ा करने का संघर्ष कर रही हैं, तो एक दामाद और बड़े भाई होने के नाते क्या मेरा कोई फर्ज नहीं बनता? अगर आज श्वेता किसी दूसरे शहर में अपने जीजा के घर रहकर पढ़ती और उसके ससुराल वाले उस पर ऐसे लांछन लगाते, तो क्या आपके कलेजे पर सांप न लोटता मां?”

आकाश के इस तीखे सवाल ने मनोरमा जी के पैरों के नीचे की जमीन हिला दी। उनके पास कोई जवाब नहीं था। वे गुस्से में पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गईं और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।

हॉल में सन्नाटा पसर गया था। पल्लवी रोते हुए अपने कमरे की ओर भागी और अलमारी से अपना बैग निकालकर उसमें अपने कपड़े ठूंसने लगी। अंजलि उसके पीछे-पीछे गई और उसे सीने से लगाकर रोने लगी। “पल्लवी, शांत हो जा मेरी बच्ची… मां जी की बातों को दिल पर मत ले। तू कहीं नहीं जाएगी।”

“नहीं दीदी, मुझे जाने दो,” पल्लवी हिचकियों के बीच बोली। “मैं यहां आप दोनों के हंसते-खेलते संसार में आग नहीं लगाना चाहती। जीजा जी मेरे लिए भगवान जैसे हैं, उन्होंने मुझे हमेशा अपनी छोटी बहन श्वेता जैसा प्यार और मान दिया। पर मां जी की नजरों में मेरा यहां रहना गुनाह है। मैं वापस मां के पास चली जाऊंगी। मैं कोई छोटी-मोटी सिलाई सीख लूंगी, पर अपनी वजह से आप दोनों के रिश्ते और जीजा जी के सम्मान पर आंच नहीं आने दूंगी।”

तभी आकाश कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। उसने आगे बढ़कर पल्लवी के हाथ से बैग छीन लिया और उसे एक तरफ रख दिया।

“पल्लवी, इधर देखो मेरी तरफ,” आकाश ने एक बड़े भाई के अधिकार से कहा। पल्लवी ने रोते हुए नजरें उठाईं। आकाश ने कहा, “अगर आज तुम यह घर छोड़कर चली गईं, तो इसका मतलब होगा कि तुम उन संकीर्ण और झूठे तानों के आगे हार गईं। तुम यहां कोई चोरी करने नहीं आई हो, तुम यहां अपनी तकदीर बदलने आई हो। तुम्हारी मां ने तुम्हारे लिए अपने कंगन तक गिरवी रखे हैं। क्या तुम उनकी उम्मीदों को इस तरह बीच रास्ते में तोड़ दोगी? जब तक तुम्हारा यह भाई तुम्हारे साथ खड़ा है, तुम्हें किसी से डरने या अपनी नजरें झुकाने की जरूरत नहीं है। तुम यहीं रहोगी, इसी टेबल पर बैठकर पढ़ोगी और उस दिन तक चैन से नहीं बैठोगी जब तक तुम अपना मुकाम हासिल नहीं कर लेतीं।”

आकाश के इन शब्दों ने पल्लवी के भीतर एक नई जान फूंक दी। उसने अपने आंसू पोंछे और अपनी किताबों को सीने से लगा लिया। उसने मन ही मन संकल्प लिया कि वह अपनी मेहनत से अपनी योग्यता साबित करके दिखाएगी।

उस दिन के बाद से घर का माहौल काफी बदल गया। मनोरमा जी ने पल्लवी और अंजलि से बात करना लगभग बंद कर दिया था। वे सिर्फ अपने मतलब भर के लिए बोलतीं और पल्लवी को देखकर मुंह फेर लेती थीं। लेकिन पल्लवी ने उनके इस रूखे व्यवहार का जवाब कभी किसी कड़वाहट से नहीं दिया। उसने सुबह चार बजे उठना शुरू किया। वह चुपचाप अपनी पढ़ाई करती, फिर उठकर रसोई में दीदी का हाथ बंटाती। नाश्ता बनाती, घर की सफाई करती और फिर मनोरमा जी के लिए समय पर गर्म काढ़ा और दवाइयां उनके कमरे के बाहर रख आती। जब भी मनोरमा जी के घुटनों में तेज दर्द उठता, पल्लवी बिना कुछ कहे धीरे से उनके पैरों के पास बैठ जाती और चुपचाप सरसों के गर्म तेल से उनकी मालिश करने लगती।

शुरुआत में मनोरमा जी अपने पैर झटक देती थीं, लेकिन पल्लवी मुस्कुराकर कहती, “मां जी, थोड़ा सा सेंक लगने दीजिए, आराम मिलेगा।” उसके चेहरे पर न कोई शिकायत थी, न कोई शिकन। वह दिन-रात केवल दो ही चीजों में रमी रहती—किताबों की दुनिया और घर के बड़ों की खामोश सेवा। धीरे-धीरे मनोरमा जी का दिल पल्लवी के इस निस्वार्थ समर्पण को देखकर पिघलने लगा, हालांकि उनका अहंकार उन्हें यह स्वीकार करने से रोकता था।

दिन, हफ्ते और महीने पंख लगाकर उड़ते गए। करीब सात महीने बीत गए। पल्लवी की लिखित परीक्षा और साक्षात्कार दोनों पूरे हो चुके थे। अब केवल अंतिम परिणाम का इंतजार था। पूरा घर एक अजीब सी बेचैनी और उम्मीद के दौर से गुजर रहा था।

एक दिन दोपहर के समय, जब आकाश ऑफिस में था और अंजलि रसोई में दोपहर का खाना बना रही थी, तभी अचानक बाहर के कमरे से मनोरमा जी की चीख सुनाई दी। अंजलि और पल्लवी दोनों बदहवास होकर दौड़ीं। मनोरमा जी बाथरूम से बाहर निकलते वक्त गीले फर्श पर बुरी तरह फिसल गई थीं। उनके दाहिने कूल्हे और पैर में असहनीय दर्द हो रहा था और वे जमीन से उठ भी नहीं पा रही थीं।

अंजलि घबराकर रोने लगी, “मां जी! यह क्या हो गया? हे भगवान, अब क्या करें? आकाश भी ऑफिस में हैं।”

पल्लवी ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपनी घबराहट पर काबू पाया। उसने तुरंत अपने फोन से पास के एक निजी अस्पताल की एम्बुलेंस को कॉल किया और सटीक पता नोट कराया। फिर उसने आकाश को फोन करके स्थिति की गंभीरता बताई और सीधे अस्पताल पहुंचने को कहा। एम्बुलेंस आने तक पल्लवी ने बड़ी सावधानी से मनोरमा जी के पैर के नीचे तकिया लगाया और बर्फ की सिकाई की ताकि सूजन ज्यादा न बढ़े।

पल्लवी और अंजलि दोनों मनोरमा जी को लेकर तुरंत अस्पताल पहुंचीं। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि कूल्हे की हड्डी में हल्का हेयरलाइन फ्रैक्चर हुआ है, जिसके लिए तुरंत प्लास्टर और सख्त आराम की जरूरत है। अस्पताल की कागजी कार्रवाई से लेकर दवाइयों की पर्चियां संभालने और डॉक्टरों से बातचीत करने तक, पल्लवी हर मोर्चे पर मुस्तैदी से डटी रही। जब शाम को आकाश हांफता हुआ अस्पताल पहुंचा, तो उसने देखा कि सारी व्यवस्था पहले ही सुचारू रूप से हो चुकी थी।

घर लौटने के बाद मनोरमा जी पूरी तरह बिस्तर पर आ गईं। उन्हें करवट बदलने के लिए भी किसी के सहारे की जरूरत थी। अंजलि घर के कामकाज और अपनी छोटी बेटी की देखभाल में उलझ जाती थी, ऐसे में पल्लवी ने मनोरमा जी की तीमारदारी का पूरा जिम्मा अपने कंधों पर उठा लिया।

पल्लवी रात-रात भर जागकर उनके सिरहाने बैठी रहती। कभी उन्हें समय पर दवा देती, तो कभी उनके गंदे कपड़े बदलती। उसने कभी मुंह नहीं बनाया, कभी माथे पर एक शिकन तक नहीं आने दी। जिस लड़की को मनोरमा जी ने ‘मुफ्तखोर’ और ‘बोझ’ कहा था, वही लड़की आज उनकी अपनी सगी बेटी से बढ़कर उनकी सेवा कर रही थी।

एक रात, जब कमरे में हल्की रोशनी थी, मनोरमा जी की नींद खुली। उन्होंने देखा कि पल्लवी उनके पैरों को हल्के-हल्के दबा रही थी और उसकी आंखें नींद से बोझिल थीं। मनोरमा जी का कलेजा मुंह को आ गया। उनकी आंखों से पश्चाताप के गरम आंसू बहकर तकिए में समाने लगे।

उन्होंने धीरे से पल्लवी का हाथ थाम लिया। पल्लवी चौंक गई, “मां जी, क्या हुआ? दर्द ज्यादा बढ़ गया क्या? मैं डॉक्टर साहब को फोन करूं?”

मनोरमा जी ने रोते हुए ना में सिर हिलाया। उन्होंने कांपते हाथों से पल्लवी का चेहरा अपने दोनों हाथों में थाम लिया और भर्राए हुए स्वर में बोलीं, “नहीं बेटी… दर्द जिस्म में नहीं, मेरी आत्मा में हो रहा है। आज मुझे समझ आया कि असली गंदगी किसी रिश्ते में नहीं, मेरी अपनी बूढ़ी और संकीर्ण सोच में थी। मैंने जिस फूल जैसी बच्ची पर इतना घिनौना लांछन लगाया, जिसके स्वाभिमान को सरेआम कुचला, वही आज अपनी ममता से मेरे घावों पर मरहम लगा रही है। मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… मुझे अपनी नीच सोच के लिए माफ कर दे।”

पल्लवी की आंखों से भी आंसुओं की धार बह निकली। उसने मनोरमा जी के सीने से अपना सिर सटा दिया और बोली, “नहीं मां जी, ऐसा मत कहिए। आप तो घर की बुजुर्ग हैं, मां समान हैं। मां अगर किसी बात पर डांट भी दे, तो क्या औलाद उससे नाराज होती है? बस आप जल्दी से ठीक हो जाइए, मेरे लिए यही सबसे बड़ा आशीर्वाद है।”

दरवाजे की ओट में खड़े आकाश और अंजलि ने जब यह दृश्य देखा, तो दोनों की आंखें नम हो गईं। आज घर के भीतर खड़ी अविश्वास और पूर्वाग्रह की दीवार हमेशा-हमेशा के लिए ढह चुकी थी।

ठीक दस दिन बाद, जब पूरा परिवार नाश्ते की मेज पर बैठा था और मनोरमा जी व्हीलचेयर पर बैठी धूप का आनंद ले रही थीं, तभी पल्लवी के फोन की घंटी बजी। उसने कांपते हाथों से फोन उठाया। स्क्रीन पर रिजल्ट की पीडीएफ फाइल खुली थी।

अचानक पल्लवी के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। वह एक पल के लिए पूरी तरह स्तब्ध हो गई।

“क्या हुआ पल्लवी? क्या आया रिजल्ट?” अंजलि ने धड़कते दिल से पूछा।

पल्लवी की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। वह दौड़कर मनोरमा जी के चरणों में गिर पड़ी और जोर से चिल्लाई, “मां जी… मेरा चयन हो गया! मैं प्रोबेशनरी ऑफिसर बन गई हूं… पूरे राज्य में मेरी दसवीं रैंक आई है!”

घर में जैसे खुशियों का सैलाब आ गया। आकाश ने खुशी से उछलकर पल्लवी को अपनी सगी बहन की तरह गले से लगा लिया और उसकी पीठ थपथपाई। अंजलि रोते हुए अपनी बहन को चूमने लगी। मुन्नी तालियां बजाकर नाचने लगी।

मनोरमा जी ने अपनी व्हीलचेयर से झुककर पल्लवी को उठाया और अपने सीने से कसकर भींच लिया। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से उसके आंसू पोंछे और आकाश की ओर देखकर गर्व से कहा, “देखा आकाश, मैंने कहा था ना कि हमारी बेटी एक दिन हमारा नाम पूरे शहर में रोशन करेगी! यह केवल तुम्हारी बहन नहीं है, यह इस पूरे घर की शान और मेरा मान है।”

आकाश ने मुस्कुराते हुए अपनी मां की ओर देखा। आज एक संकीर्ण नजरिए पर पवित्र नीयत और अटूट विश्वास की जीत हो चुकी थी। जिस घर में कभी लांछन की गूंज थी, आज वहां सम्मान और गर्व की शहनाई बज रही थी।

क्या आज के आधुनिक समाज में भी जीजा-साली या देवर-भाभी के पवित्र और सहज रिश्तों को संकीर्ण नजरिए से देखना सही है? अगर एक दामाद अपनी ससुराल के बच्चों का सहारा बनता है, तो समाज उसे संदेह की नजर से क्यों देखता है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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