राधिका ने हाथ जोड़ते हुए अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा, “मेरे सास-ससुर ने मुझे वही गृहलक्ष्मी का पावन पद दिया है। वे मुझे किसी नौकरानी की तरह नहीं, बल्कि इस घर की स्वामिनी और रानी की तरह रखते हैं। अगर मैं अपने परिवार के लिए भोजन बनाती हूँ या बर्तन साफ करती हूँ, तो यह मेरा शोषण नहीं, यह अपने मंदिर की सेवा है। मुझे मेरे अधिकारों का भी पूरा ज्ञान है और अपने कर्तव्यों का भी पूरा भान है। इसलिए आंटी जी, हाथ जोड़कर मेरी आपसे विनती है कि अपने मन का यह मैल और फूट डालने वाली बातें हमारे घर की चौखट के बाहर ही रखें। दोबारा इस पवित्र आंगन में ऐसा जहर घोलने का प्रयास मत कीजिएगा।”
विश्वनाथ जी और मनोरमा जी के दो सुपुत्र थे—बड़ा बेटा मयंक, जो शहर की एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत था, और छोटा बेटा मयूर, जो सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा था। दो वर्ष पूर्व जब मयंक का विवाह राधिका से हुआ, तो इस परिवार की खुशियों में जैसे चार चांद लग गए। राधिका साधारण परिवार की, उच्च शिक्षित और संस्कारों से परिपूर्ण कन्या थी। उसकी माँ ने विदाई के समय उसके आंचल में केवल एक ही सीख बांधी थी—”बेटी, मायका सिर्फ जन्म देता है, लेकिन ससुराल वह पावन धरती है जहाँ स्त्री अपनी साधना से स्वर्ग रचती है। वहाँ सबको अपना मानना, छोटी-मोटी बातों को दिल से मत लगाना और कभी किसी तीसरे के बहकावे में आकर अपने घर की मर्यादा की चौखट को मत लांघना।”
राधिका ने अपनी माँ की इस सीख को अपने जीवन का मूलमंत्र बना लिया था। विवाह के दो वर्षों में उसने कभी यह महसूस ही नहीं होने दिया कि वह इस घर में किसी दूसरे परिवार से आई है। वह सुबह सबसे पहले उठकर घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करती, फिर पूरे परिवार की पसंद-नापसंद का ख्याल रखते हुए रसोई का जिम्मा संभालती। ससुर विश्वनाथ जी के बिना शक्कर वाले काढ़े से लेकर, सासु माँ मनोरमा जी के पूजा के ताजे फूलों तक, हर छोटी बात उसके ध्यान में रहती। मयंक के दफ्तर जाने की तैयारी और देवर मयूर की पढ़ाई के दौरान उसे समय पर बादाम वाला दूध या नाश्ता पहुंचाना, यह सब वह किसी बोझ की तरह नहीं, बल्कि सच्चे मनोयोग से करती थी।
राधिका अपने देवर मयूर को हमेशा ‘मयूर भैया’ कहकर सम्मान से बुलाती और उसकी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल एक बड़ी बहन की तरह रखती। परिवार में मयंक की एक बड़ी बहन भी थी, जिनका नाम वंदना था। वंदना जी का विवाह ग्वालियर में हुआ था। जब कभी भी वंदना जी अपने बच्चों के साथ मायके आतीं, तो घर में उत्सव जैसा माहौल बन जाता। राधिका उनके आने से पहले ही उनका कमरा फूलों से सजा देती, उनकी पसंदीदा कचौड़ियां और रबड़ी तैयार रखती। इतना ही नहीं, अपनी अलमारी से नई और कीमती साड़ियां निकालकर बड़े मनुहार और मान के साथ ननद को पहनाती। वंदना जी जब भी विदा होतीं, उनकी आँखें नम हो जातीं और वे हमेशा अपनी माँ से कहतीं, “माँ, आप सचमुच बहुत भाग्यशाली हैं जो आपको राधिका जैसी बहू मिली, उसने तो मुझे कभी यह लगने ही नहीं दिया कि भाभी आने के बाद मायका पराया हो जाता है।”
मनोरमा जी भी अपनी बहू पर जान छिड़कती थीं। उन्होंने कभी सास होने का रौब नहीं दिखाया। जब भी राधिका रसोई में काम करती, मनोरमा जी खुद सब्जियां काटने या आटा गूंथने में हाथ बंटाने आ जातीं। अगर कभी राधिका की तबीयत थोड़ी भी नासाज होती, तो मनोरमा जी उसे डांटकर बिस्तर पर लिटा देतीं और खुद दलिया बनाकर अपने हाथों से खिलातीं। सास-बहू का यह रिश्ता सास-बहू का कम, और दो सखियों या माँ-बेटी का ज्यादा लगता था।
पूरे मोहल्ले में ‘सदाशिव निवास’ की सुख-शांति और राधिका के उत्तम संस्कारों के कसीदे पढ़े जाते थे। कॉलोनी की सत्यनारायण कथा हो या कोई मांगलिक उत्सव, हर महिला मनोरमा जी से यही कहती, “मनोरमा बहन, आपने पिछले जन्म में जरूर कोई बहुत बड़ा पुण्य किया होगा जो ऐसी गुणवान और सेवाभावी बहू आपके आंगन में आई है। हमारे घरों में तो दिन-रात कलह ही नहीं थमती।”
परंतु, संसार का यह कड़वा सच है कि जहाँ प्रकाश होता है, वहाँ छाया भी होती है, और जहाँ सुख-शांति होती है, वहाँ ईर्ष्या की आग में जलने वाले लोग भी मिल ही जाते हैं। ‘सदाशिव निवास’ के ठीक सामने रहने वाली दमयंती देवी के लिए यह सब देखना असहनीय था। दमयंती जी का स्वभाव बड़ा ही कटु, शक्की और दूसरों के मामलों में टांग अड़ाने वाला था। उनके अपने घर में कभी शांति का वास नहीं रहा। उनकी अपनी इकलौती बहू श्वेता के साथ चौबीसों घंटे खटपट चलती रहती थी। कभी चाय में चीनी कम होने पर कलेश मचता, तो कभी श्वेता के देर से उठने पर ताने कसे जाते। घर में हर समय महाभारत छिड़ी रहती थी।
एक शाम दमयंती जी के पति हरीश बाबू ने तंग आकर अपनी पत्नी को खरी-खोटी सुना दी। उन्होंने बाहर बालकनी की ओर इशारा करते हुए कहा, “दमयंती, कभी सामने वाले विश्वनाथ जी के घर को भी देख लिया करो! उनकी बहू राधिका को देखो, पूरा दिन मुस्कराते हुए सबका ध्यान रखती है। मनोरमा जी और उनकी बहू में कितना मान-सम्मान और तालमेल है। और एक तुम्हारा यह घर है, जिसे तुमने और तुम्हारी बहू ने अखाड़ा बना रखा है। इंसान घर में सुकून ढूंढने आता है, पर यहाँ कदम रखते ही सिरदर्द शुरू हो जाता है। कुछ सीखो अपने पड़ोसियों से!”
हरीश बाबू की यह बात दमयंती जी के कलेजे में तीर की तरह चुभ गई। एक तो अपने पति के ताने और ऊपर से मनोरमा की बहू की तारीफ—दमयंती जी की ईर्ष्या की ज्वाला भड़क उठी। आत्ममंथन करने और अपने स्वभाव में सुधार लाने के बजाय, उनके मन में एक कुटिल और विषैला विचार कौंधा। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया कि वह इस ‘सदाशिव निवास’ के झूठे स्वर्ग को उजाड़कर रहेंगी। जब तक वे मनोरमा और राधिका के बीच शक और कलह का बीज नहीं बो देंगी, तब तक उन्हें चैन नहीं मिलेगा। वे बस सही मौके की तलाश में थीं।
आखिरकार वह मौका एक मंगलवार की दोपहर को आ ही गया। विश्वनाथ जी और छोटा बेटा मयूर किसी जरूरी पारिवारिक कार्य से पास के कस्बे में गए हुए थे। मयंक अपने दफ्तर में था। दोपहर के समय मनोरमा जी मोहल्ले के मंदिर में दर्शन करने और पास के बाजार से शाम की पूजा का सामान लाने के लिए घर से निकलीं। घर में राधिका बिल्कुल अकेली थी।
दमयंती जी अपनी खिड़की से सब देख रही थीं। जैसे ही उन्होंने मनोरमा जी को गली के मोड़ से ओझल होते देखा, उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी चुन्नी संभाली और दबे पांव ‘सदाशिव निवास’ के मुख्य द्वार की ओर बढ़ गईं। दरवाजा खुला हुआ था।
अंदर आंगन के एक कोने में राधिका बैठी थी। दोपहर के भोजन के बाद के कुछ बड़े पीतल के भगोने और बर्तन वह साबुन से साफ कर रही थी। उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें थीं, लेकिन होठों पर कोई शिकन नहीं थी।
दमयंती जी ने खंखारते हुए घर में प्रवेश किया, “अरे राधिका बहू! अकेली ही सारा मोर्चा संभाले बैठी हो?”
राधिका ने चौंककर सिर उठाया। सामने पड़ोस की दमयंती आंटी को देखकर उसने तुरंत हाथ पानी से धोए, साड़ी का पल्लू सिर पर ठीक किया और आगे बढ़कर झुकते हुए उनके चरण स्पर्श किए।
“प्रणाम आंटी जी! आइए न, बैठिए। मैं आपके लिए ठंडा पानी लाती हूँ।” राधिका ने अत्यंत शालीनता से कहा।
दमयंती जी ने बैठते हुए राधिका के दोनों हाथों को जबरन अपने हाथों में थाम लिया। उन्होंने बड़े बनावटी दुख और सहानुभूति का नाटक करते हुए अपनी आँखें सिकोड़ीं और बोलीं, “अरे-अरे… राम-राम! जरा अपने इन हाथों को तो देख बहू! शादी को अभी जुम्मा-जुम्मा दो साल हुए हैं और तेरे ये कोमल हाथ बर्तन मांज-मांज कर कितने खुरदुरे और कड़क हो गए हैं! रीते बर्तनों की तरह तेरी जवानी भी घिस रही है।”
राधिका ने सहजता से मुस्कुराते हुए हाथ छुड़ाने की कोशिश की और कहा, “अरे नहीं आंटी जी, ऐसा कुछ नहीं है। परिवार बड़ा है और यह तो रोजमर्रा का सामान्य काम है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं।”
दमयंती जी ने अपनी आवाज को और धीमा व रहस्यमयी बना लिया, जैसे कोई बहुत बड़ा राज खोलने जा रही हों। वे राधिका के कंधे पर हाथ रखकर जहरीले स्वर में बोलीं, “तू बहुत भोली है री राधिका! दुनिया देखी नहीं है तूने। तू चाहे इनके लिए अपना खून-पसीना एक कर दे, दिन-रात खटती रहे, लेकिन मेरी एक कड़वी बात हमेशा अपनी गांठ में बांध ले—’बहू चाहे अपनी चमड़ी की जूती भी बनाकर सास-ससुर को पहना दे, पर वह कभी उस घर की बेटी नहीं बन सकती!’ पराए खून में कभी अपनापन नहीं होता। तू तो बस इन लोगों के लिए एक बिना वेतन की नौकरानी बनकर रह गई है। देख, सास आराम से मंदिर और बाजार घूमने निकल गई और तुझे बर्तनों के ढेर के आगे झोंक दिया!”
राधिका के चेहरे की सहजता एक पल में समाप्त हो गई। उसके नयनों में स्वाभिमान और संस्कारों की एक ऐसी चमक कौंधी, जिससे दमयंती जी का कपटी चेहरा फीका पड़ने लगा। राधिका एक कदम पीछे हटी और उसने पूरी गरिमा, दृढ़ता और नपे-तुले शब्दों में जवाब देना शुरू किया।
“आंटी जी! आपने बिल्कुल ठीक कहा कि बहू कभी बेटी नहीं बन सकती। लेकिन शायद आप यह भूल गईं कि हमारे भारतीय संस्कारों और शास्त्रों में बहू को बेटी से कम नहीं, बल्कि उससे भी कहीं ऊंचा और पवित्र दर्जा दिया गया है—उसे ‘गृहलक्ष्मी’ कहा गया है!”
दमयंती जी हक्की-बक्की होकर उसका चेहरा देखने लगीं। राधिका ने अपनी बात जारी रखी:
“आंटी जी, जब एक बेटी विदा होकर ससुराल आती है, तो उसके ससुर जी उसके चरण पूजकर, उसे अपनी कुल की प्रतिष्ठा मानकर अपने घर में सादर स्थान देते हैं। सासु माँ अपने हाथों से आरती उतारती हैं, कुमकुम के थापे और लाल महावर से उसके पाँव पूजकर, कंकू के पगल्ये घर के आंगन में डलवाती हैं। पूरे परिवार के सामने यह घोषणा की जाती है कि आज से हमारे घर का अन्नपूर्णा भंडार, हमारे मान-सम्मान की चाबियां और हमारे कुल का भविष्य इस लक्ष्मी के हाथों में है। बेटी तो अपने माता-पिता के आंगन की चिड़िया होती है जो एक दिन उड़ जाती है, लेकिन बहू वह मजबूत नींव बनती है जिस पर आने वाली कई पीढ़ियों का महल खड़ा होता है।”
दमयंती जी की जबान मानो तालू से चिपक गई थी। राधिका का हर एक शब्द उनके अंतर्मन पर हथौड़े की तरह पड़ रहा था।
राधिका ने हाथ जोड़ते हुए अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा, “मेरे सास-ससुर ने मुझे वही गृहलक्ष्मी का पावन पद दिया है। वे मुझे किसी नौकरानी की तरह नहीं, बल्कि इस घर की स्वामिनी और रानी की तरह रखते हैं। अगर मैं अपने परिवार के लिए भोजन बनाती हूँ या बर्तन साफ करती हूँ, तो यह मेरा शोषण नहीं, यह अपने मंदिर की सेवा है। मुझे मेरे अधिकारों का भी पूरा ज्ञान है और अपने कर्तव्यों का भी पूरा भान है। इसलिए आंटी जी, हाथ जोड़कर मेरी आपसे विनती है कि अपने मन का यह मैल और फूट डालने वाली बातें हमारे घर की चौखट के बाहर ही रखें। दोबारा इस पवित्र आंगन में ऐसा जहर घोलने का प्रयास मत कीजिएगा।”
दमयंती जी का चेहरा अपमान और शर्मिंदगी से काला पड़ गया। जिस बहू को वे बहकाकर सास के खिलाफ भड़काना चाहती थीं, उसी ने उन्हें संस्कारों का ऐसा आईना दिखा दिया था कि उनके पास वहां एक पल भी खड़े रहने की हिम्मत नहीं बची। उनके सारे मंसूबे मिट्टी में मिल चुके थे। वे बिना एक शब्द बोले, नजरें चुराते हुए उलटे पांव बाहर की तरफ भाग खड़ी हुईं।
दमयंती जी के जाते ही मुख्य दरवाजे के पीछे से एक सिसकारी की आवाज आई।
राधिका चौंककर दरवाजे की ओर बढ़ी। देखा तो सामने सासु माँ मनोरमा जी खड़ी थीं। दरअसल, मनोरमा जी जब बाजार पहुंची थीं, तो उन्हें अहसास हुआ कि वे पैसों का बटुआ और जरूरी पर्ची घर के मंदिर वाले आले में ही भूल गई हैं। इसलिए वे तुरंत घर लौट आई थीं। जब वे मुख्य द्वार पर पहुंचीं, तो अंदर से दमयंती की विषैली बातें सुनाई दीं। वे वहीं ठिठक कर रुक गई थीं और उन्होंने दमयंती के जहर से लेकर राधिका के स्वाभिमान भरे एक-एक उत्तर को अपने कानों से सुना था।
मनोरमा जी की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उनका रोम-रोम अपनी बहू के प्रति गर्व और असीम वात्सल्य से भर गया था।
“माँ जी! आप कब आईं?” राधिका ने घबराते हुए पूछा, “आप रो क्यों रही हैं माँ जी? क्या हुआ?”
मनोरमा जी ने बिना कुछ कहे आगे बढ़कर राधिका को कसकर अपनी बाहों में समेट लिया। एक माँ और बहू का वह आलिंगन समाज के हर खोखले ताने और दुर्भावना पर संस्कारों की सबसे बड़ी विजय था।
“मेरी बच्ची… मेरी लक्ष्मी!” मनोरमा जी का गला भर आया था। उन्होंने राधिका के माथे को चूमते हुए कहा, “आज तूने केवल उस दमयंती का मुँह बंद नहीं किया, बल्कि मेरे मातृत्व और इस घर की प्रतिष्ठा को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। दमयंती सही कहती थी राधिका… तू मेरी बेटी कभी नहीं बन सकती, क्योंकि तू तो मेरी बेटी से भी हजार गुना बढ़कर है! बेटी तो सिर्फ मेरी कोख से जन्मी थी, पर तू तो मेरे पूरे कुल का मान, मेरी आत्मा और मेरा अभिमान बनकर आई है। जब तक तेरे जैसी बहू इस घर में है, दुनिया की कोई भी ताकत इस परिवार में दरार नहीं डाल सकती।”
राधिका की आँखें भी छलक पड़ीं। उसने अपनी सासु माँ के चरण छुए और उनकी गोद में सिर रख दिया, “माँ जी, यह सब मेरी माँ की दी हुई सीख और आपके दिए हुए असीम प्यार का फल है। जब सास में माँ का रूप दिखने लगे, तो बहू को बेटी बनने की होड़ करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। बस आप अपना यह आशीर्वाद और विश्वास हमेशा मेरे सिर पर बनाए रखिएगा।”
शाम को जब विश्वनाथ जी, मयंक और मयूर घर लौटे और मनोरमा जी ने दोपहर का पूरा वृत्तांत सुनाया, तो विश्वनाथ जी की आँखें भी गर्व से चमक उठीं। उन्होंने राधिका के सिर पर हाथ रखकर कहा, “बहू, आज तुमने यह साबित कर दिया कि जिस घर में संस्कारों की मजबूत दीवारें होती हैं, वहाँ किसी के विषैले बोल की एक ईंट भी नहीं खिसक सकती।”
उस दिन ‘सदाशिव निवास’ का आंगन केवल दीयों की रोशनी से नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, सम्मान और अटूट प्रेम के दिव्य उजास से जगमगा रहा था।
विचारणीय प्रश्न: आज के समाज में जहाँ छोटी-छोटी गलतफहमियों और बाहर वालों की बातों में आकर संयुक्त परिवार बिखर जाते हैं, वहाँ क्या राधिका की तरह हर बहू को अपने ससुराल को अपना सर्वस्व मानकर बाहर के बहकावों का डटकर सामना नहीं करना चाहिए? और क्या हर सास को मनोरमा जी की तरह अपनी बहू को बेटी से भी ऊंचा ‘गृहलक्ष्मी’ का सम्मान नहीं देना चाहिए? इस पावन रिश्ते पर आपकी क्या राय है, कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर साझा करें।
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