त्याग का आँचल

रागिनी का कलेजा मुँह को आ गया। उसने पिता हरिशंकर जी की ओर देखा, “बाबूजी, क्या भाभी को सच में यहाँ नहीं लाया गया?”

हरिशंकर जी ने अपनी पगड़ी ठीक करते हुए बेहद सहज भाव से कहा, “अरे बेटा, इतनी भारी भीड़ में उसका यहाँ क्या काम था? औरत जात का काम घर की व्यवस्था देखना होता है। जब घर चलोगी तो मिल लेना, वो कहीं भागी थोड़ी जा रही है। चलो, मीडिया वाले बाइट लेने के लिए खड़े हैं, ज़रा मुस्कुराओ।”

लोहे की भारी पटरियों पर रेंगती हुई ट्रेन की हर एक गूँज के साथ रागिनी का दिल भी अपनी पुरानी स्मृतियों के गलियारों में उसी रफ़्तार से पीछे दौड़ रहा था। खिड़की से बाहर भागते हुए बिजली के खंभे, खेत-खलिहान और पेड़ों की कतारें मानों उसके संघर्ष के वे कठिन दिन थे, जो एक-एक करके पीछे छूटते चले जा रहे थे। रागिनी ने अपनी गोद में रखे मखमली डिब्बे को अपने दोनों हाथों से कसकर भींच लिया। उस डिब्बे के भीतर चमकता हुआ वह स्वर्ण पदक सिर्फ़ एक धातु का टुकड़ा भर नहीं था, बल्कि उसमें पिछले तीन वर्षों का पसीना, लहूलुहान घुटनों का दर्द, समाज के तीखे ताने और सबसे बढ़कर उसकी भाभी के अनगिनत आंसुओं व मौन साधना की तपस्या जड़ी हुई थी। रागिनी की आँखें भर आईं और वह अनजाने ही उन दिनों की गहराई में डूबती चली गई जब उसके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष शुरू हुआ था।

यह बात आज से लगभग तीन वर्ष पहले की थी। जबलपुर शहर के एक छोटे से शांत मुहल्ले में रागिनी का संयुक्त परिवार रहता था। पिता हरिशंकर जी पुराने ख्यालों के बेहद कड़क और अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे, जिनके लिए कुल की झूठी मर्यादा ही सब कुछ थी। माँ यशोदा जी की पूरी ज़िंदगी घर की चौखट और रसोई के चूल्हे तक सिमट कर रह गई थी। बड़ा भाई विवेक भी अपने पिता के ही पदचिह्नों पर चलने वाला लड़का था, जो परंपराओं के नाम पर किसी भी नई सोच को कुचलना अपना धर्म समझता था। लेकिन उस पूरे घर में अगर कोई एक हवा का ताज़ा झोंका था, तो वह थी रागिनी की नवविवाहिता भाभी, अर्चना। अर्चना केवल ससुराल की बहू बनकर नहीं आई थी, बल्कि उसने पहले ही दिन से रागिनी को अपनी छोटी बहन मानकर उसके हर सुख-दुख को अपना बना लिया था।

उस दिन रागिनी जब कॉलेज की बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीतकर हाथों में चमचमाती हुई शील्ड लिए दौड़ते हुए घर आई थी, तो उसका पूरा अस्तित्व एक नई ऊर्जा से दमक रहा था। उसने दरवाज़े की कुंडी खटखटाते हुए ज़ोर से आवाज़ लगाई थी, “माँ, बाबूजी, भैया… अरे कहाँ हैं आप सब? जल्दी बाहर आइए, देखिए तो मैं आज क्या जीतकर लाई हूँ!”

यशोदा जी रसोई से हाथ पोंछते हुए बाहर निकलीं और रागिनी के चेहरे पर लगी हल्की सी खरोंच देखकर घबराते हुए बोलीं, “अरे रागिनी, ये क्या हाल बना रखा है? और ये इतना शोर क्यों मचा रही है?”

रागिनी ने उत्साह से उछलते हुए शील्ड आगे बढ़ाई और कहा, “माँ, देखिए! मैं अंतर-महाविद्यालयीन मुक्केबाजी में प्रथम आई हूँ। मेरे मुख्य कोच सर ने कहा है कि मेरे पंचों में गजब की ताक़त है। अगर मुझे सही प्रशिक्षण मिले, तो मैं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकती हूँ।”

रागिनी की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सामने के कमरे का पर्दा हटाकर हरिशंकर जी बाहर निकले। उनके चेहरे की त्योरियाँ चढ़ी हुई थीं और आँखें गुस्से से लाल थीं। उन्होंने उस चमचमाती हुई शील्ड को एक हिकारत भरी नज़र से देखा और गरजते हुए बोले, “बस, बहुत हुआ यह तमाशा! आज के बाद यह मुक्केबाजी और खेल-कूद का नाटक हमारे घर की दहलीज पार नहीं करेगा। अच्छे और संभ्रांत घरों की लड़कियाँ मुक्के बरसाने रिंग में नहीं उतरतीं और न ही लड़कों की तरह हाफ पैंट पहनकर कुदकती हैं। सीधे-सीधे बी.ए. की पढ़ाई पूरी करो और फिर घर पर बैठकर चौका-चूल्हा सीखो। अगले साल तुम्हारी शादी तय करनी है।”

पिता के इन कठोर शब्दों ने रागिनी के भीतर की सारी उम्मीदों को एक पल में चकनाचूर कर दिया। वह कांपते होंठों के साथ भाई विवेक की ओर देखने लगी, लेकिन विवेक ने भी पिता का समर्थन करते हुए सख्त लहजे में कहा, “बाबूजी बिल्कुल सही कह रहे हैं, रागिनी। हमारे खानदान की आज तक किसी लड़की ने ऐसे मर्दों वाले खेल नहीं खेले। बाज़ार में खड़े चार लोग हँसेंगे तो क्या हम अपना मुँह छुपाते फिरेंगे? खेल का यह भूत अपने दिमाग से निकाल फेंको।”

माँ ने भी सिर हिलाकर मौन सहमति दे दी। रागिनी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। शील्ड उसके हाथों से छूटकर फर्श पर गिर पड़ी और उसकी खनखनाहट के साथ ही रागिनी फूट-फूटकर रोने लगी। उसका दिल टूट चुका था, ऐसा लगा जैसे किसी ने उड़ने से पहले ही उसके पंख बेरहमी से कतर दिए हों।

तभी उस भारी सन्नाटे को चीरती हुई एक शांत मगर अडिग आवाज़ गूँजी, “बाबूजी, रागिनी के हाथों में हुनर की ताक़त है, इसे कमज़ोरी मत बनाइए। इसे एक अवसर तो देकर देखिए, यह पूरे परिवार का सर गर्व से ऊँचा कर देगी।”

सबने चौंककर पीछे मुड़कर देखा। यह आवाज़ अर्चना भाभी की थी। वे आँचल संभालते हुए ससुर के सामने दोनों हाथ जोड़कर खड़ी थीं। एक बहू का बड़ों के फैसले के बीच में बोलना उस घर की रीत के ख़िलाफ़ था। हरिशंकर जी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें तरेरते हुए कहा, “अर्चना बहू! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई बड़ों के फैसले के बीच ज़बान लड़ाने की? लगता है मायके से यही सब सीखकर आई हो। समाज में जब लोग थू-थू करेंगे, तो क्या तुम उनका सामना करोगी? चुपचाप अंदर जाओ और अपने काम से काम रखो।”

अर्चना की आँखों में आँसू छलक आए, पर उनके कदमों में ज़रा भी डगमगाहट नहीं आई। उन्होंने सिर झुकाए हुए ही बेहद शालीनता और दृढ़ता से कहा, “माफ़ कीजिएगा बाबूजी, मर्यादा लांघना मेरा मकसद नहीं है। लेकिन अगर मैरी कॉम के परिवार ने भी यही सोचा होता कि लोग क्या कहेंगे, तो क्या भारत को कभी विश्व चैंपियन बॉक्सर मिल पाती? जब पूरा देश बेटियों की उपलब्धियों पर गर्व करता है, तो हम अपनी ही बेटी के पर क्यों काट रहे हैं? समाज तब भी बातें बनाएगा जब बेटी की प्रतिभा घर के कोने में घुटकर मर जाएगी। आप एक पिता हैं, समाज की परवाह किए बिना अपनी बेटी की ढाल बनिए।”

अर्चना के उस तर्क और उसकी आँखों में छलकते सच्चे विश्वास ने हरिशंकर जी के कदमों को ठिठकने पर मजबूर कर दिया। कुछ पल के लिए कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। हरिशंकर जी ने अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए लंबी साँस ली और बोले, “ठीक है, अगर तुम्हें इस पर इतना ही भरोसा है तो मैं इसे एक साल का वक़्त देता हूँ। इस एक वर्ष में यदि यह राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर पाई, तो उसी दिन इसका दस्ताना उतरेगा और इसकी शादी कर दी जाएगी। और याद रखना अर्चना, अगर इसकी वजह से खानदान पर कोई आँच आई, तो उसकी ज़िम्मेदार सिर्फ़ तुम होगी।”

उस दिन रागिनी को एक नई ज़िंदगी और अपने सपनों को सच करने का पंख मिल गया था। लेकिन यह रास्ता काँटों से भरा था। घर से किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिली, क्योंकि पिता और भाई का रुख अब भी बेरुखी से भरा हुआ था। वे केवल तमाशा देख रहे थे कि कब एक साल पूरा हो और रागिनी की हार हो। ऐसे मुश्किल वक़्त में अर्चना रागिनी की ढाल, उसकी माँ और उसकी सबसे बड़ी मार्गदर्शक बन गई।

अर्चना रोज़ सुबह चार बजे उठती, रागिनी के लिए बादाम का दूध, अंकुरित अनाज और पौष्टिक खुराक तैयार करती। रागिनी के कड़े अभ्यास के लिए अच्छे प्रोटीन और स्पोर्ट्स किट की ज़रूरत थी, जिसके लिए अर्चना ने चुपचाप अपने मायके से मिला सोने का कंगन बेच दिया। जब रागिनी को इस बात का पता चला, तो वह रोते हुए भाभी के सीने से लिपट गई और बोली, “भाभी, यह आपने क्या किया? अपने गहने बेचकर मेरे लिए यह सब क्यों कर रही हैं? अगर मैं हार गई तो?”

अर्चना ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, “मेरी गुड़िया, गहने तो बाज़ार से दोबारा खरीदे जा सकते हैं, लेकिन अगर किसी सपने की साँसें टूट जाएँ, तो वह ज़िंदगी भर कचोटता रहता है। तू बस अपने पंच पर ध्यान दे, बाकी सब मैं संभाल लूँगी।”

शुरुआती महीनों में रागिनी के लिए सब कुछ बहुत कठिन था। रिंग में लगने वाली चोटें, नीले पड़ते हाथ-पैर और थका देने वाली रनिंग के बाद जब वह घर लौटती, तो माँ और पिता की तीखी नज़रें उसका स्वागत करतीं। कई बार पड़ोस के लोग व्यंग्य करते कि ‘लड़की को पहलवान बनाकर ब्याहोगे कहाँ?’ लेकिन अर्चना हर शाम रागिनी के बदन पर सिकाई करती, उसके घावों पर मरहम लगाती और कहती, “याद रखना रागिनी, पत्थरों पर पड़ने वाली छेनी की चोट ही पत्थर को भगवान की मूरत बनाती है।”

रागिनी ने भी अपनी भाभी के त्याग की लाज रखने के लिए अपनी जान झोंक दी। उसने पसीने की हर एक बूँद को अपनी ताकत बना लिया। आठ महीने बीतते-बीतते उसने राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद उसका चयन राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर के लिए हो गया। अब परिवार के लोगों का विरोध थोड़ा धीमा पड़ने लगा था, लेकिन उनके दिलों में अर्चना के लिए कोई सम्मान नहीं जगा, बल्कि वे यह मान बैठे थे कि रागिनी में जन्मजात प्रतिभा थी, जिसे कोई रोक नहीं सकता था।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन के बाद रागिनी का चयन अंतरराष्ट्रीय एशियाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप के लिए भारतीय दल में हो गया। रागिनी जब विदेश के लिए रवाना हो रही थी, तो उसने अर्चना के पाँव छूकर कहा था, “भाभी, आपकी अमानत लेकर जा रही हूँ, खाली हाथ नहीं लौटूंगी।” और उसने अपना वादा निभाया। विदेशी धरती पर कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान की धाकड़ मुक्केबाजों को रिंग में धूल चटाते हुए रागिनी ने तिरंगा सबसे ऊँचा लहराया और फाइनल में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया।

“छुक-छुक… छुक-छुक…”

ट्रेन की सीटी की तेज़ आवाज़ ने रागिनी को उसकी स्मृतियों से बाहर खींच लिया। ट्रेन जबलपुर रेलवे स्टेशन के मुख्य प्लेटफार्म पर धीरे-धीरे आकर रुक रही थी। रागिनी की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसके मन में केवल एक ही छवि घूम रही थी—उसकी भाभी, उसकी तपस्विनी अर्चना। वह अपनी भाभी के गले लगकर वह पदक उनके चरणों में रख देना चाहती थी।

रागिनी अपना बैग संभालते हुए डिब्बे से तेज़ी से नीचे उतरी। लेकिन स्टेशन का नज़ारा देखकर वह दंग रह गई। प्लेटफार्म पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। ढोल-नगाड़ों की थाप गूँज रही थी, हवा में गुलाल उड़ रहा था और शहर के बड़े-बड़े लोग, प्रशासनिक अधिकारी, खेल प्रेमी और मीडिया के पत्रकार कैमरों की फ्लैश चमका रहे थे। भीड़ के बीचों-बीच पिता हरिशंकर जी, भाई विवेक और माँ यशोदा जी खड़े थे। हरिशंकर जी का सीना गर्व से फूला हुआ था, मानों यह जीत केवल उनकी ही नीतियों का नतीजा हो।

विवेक हाथों में गेंदे के फूलों का विशाल हार लिए आगे बढ़ा और मुस्कुराते हुए चिल्लाया, “शाबाश मेरी बहना! तुमने तो पूरे देश में हमारे परिवार का नाम चमका दिया। हमें तुम पर नाज़ है!”

चारों तरफ से नारों की आवाज़ें आ रही थीं—”देश की बेटी रागिनी जिंदाबाद!”

रागिनी ने हाथ जोड़कर सबका अभिवादन स्वीकार किया, लेकिन उसकी आँखें उस विशाल भीड़ में केवल एक चेहरे को ढूँढ रही थीं। उसने बेचैनी से चारों तरफ देखा, पर वहाँ अर्चना भाभी कहीं नज़र नहीं आ रही थीं। रागिनी का मन आशंकित हो उठा। उसने भाई विवेक का हाथ पकड़ा और घबराई हुई आवाज़ में पूछा, “भैया, भाभी कहाँ हैं? वे मुझे लेने स्टेशन क्यों नहीं आईं?”

विवेक ने ज़रा झेंपते हुए और लापरवाही से हँसकर कहा, “अरे पगली, वो घर पर है। इतने बड़े आयोजन में घर की बहू का बाहर धक्के खाना ठीक नहीं लगता। घर में हज़ारों मेहमान आने वाले हैं, तो वह रसोई में मिठाइयाँ और नाश्ता तैयार करवा रही है।”

रागिनी का कलेजा मुँह को आ गया। उसने पिता हरिशंकर जी की ओर देखा, “बाबूजी, क्या भाभी को सच में यहाँ नहीं लाया गया?”

हरिशंकर जी ने अपनी पगड़ी ठीक करते हुए बेहद सहज भाव से कहा, “अरे बेटा, इतनी भारी भीड़ में उसका यहाँ क्या काम था? औरत जात का काम घर की व्यवस्था देखना होता है। जब घर चलोगी तो मिल लेना, वो कहीं भागी थोड़ी जा रही है। चलो, मीडिया वाले बाइट लेने के लिए खड़े हैं, ज़रा मुस्कुराओ।”

इतना सुनते ही रागिनी के भीतर जैसे कोई ज्वालामुखी फट पड़ा। उसकी आँखों से सम्मान और खुशी के आँसू सूख गए और उनकी जगह स्वाभिमान की ज्वाला धधक उठी। जिस भाभी ने अपनी नींद, अपनी खुशियाँ और अपने ज़ेवर तक उसके लिए न्योछावर कर दिए थे, आज जब उस तपस्या का फल मिलने का दिन आया था, तो उसे रसोई के धुएँ में धकेल दिया गया था ताकि पुरुष प्रधान समाज की तथाकथित झूठी मर्यादा पर कोई आंच न आए!

रागिनी ने विवेक के हाथ से फूलों का हार लेने से साफ़ इनकार कर दिया और एक कदम पीछे हट गई। उसका यह रूप देखकर वहाँ मौजूद तमाम अफ़सर और मीडियाकर्मी हैरान रह गए।

हरिशंकर जी ने फुसफुसाते हुए डांटने के लहजे में कहा, “यह क्या बचपना है रागिनी? सब लोग देख रहे हैं, कैमरे चल रहे हैं। आगे बढ़ो!”

रागिनी ने पूरी दृढ़ता के साथ अपना सिर उठाया और कांपती मगर बुलंद आवाज़ में कहा, “माफ़ कीजिएगा बाबूजी, जिस इंसान की बदौलत आज मैं इस मुकाम पर खड़ी हूँ, अगर उसके त्याग का ऐसा सरेआम अपमान होगा, तो मुझे इस झूठे स्वागत और फूलों के हार की रत्ती भर भी ज़रूरत नहीं है। अगर इस ऐतिहासिक पल में मेरी भाभी का यहाँ कोई काम नहीं था, तो मेरा भी इस भीड़ में खड़े होकर अपनी जीत का जश्न मनाने का कोई हक नहीं बनता।”

यह कहकर रागिनी ने किसी की बात नहीं सुनी। उसने अपनी किट उठाई और हतप्रभ खड़ी भीड़ को चीरते हुए बाहर निकलने लगी। पत्रकारों के कैमरे और माइक तुरंत उसके पीछे दौड़े। एक पत्रकार ने आगे बढ़ते हुए पूछा, “रागिनी जी! रागिनी जी! आप अचानक इस तरह क्यों जा रही हैं? कम से कम देश की जनता को यह तो बताइए कि आपकी इस ऐतिहासिक और जादुई सफलता के पीछे असली राज़ क्या है? आपकी प्रेरणा कौन है?”

रागिनी ने चलते-चलते पलटकर देखा, उसकी आँखों में आत्मसम्मान का तेज़ था। उसने संजीदगी से कहा, “अगर मेरी सफलता का असली राज़ देखना है, तो मेरे पीछे आइए। जवाब मेरे घर की उस चौखट पर मिलेगा, जहाँ असली भारत की नारी चुपचाप अपनी आहुति देती है।”

इतना कहकर वह तेज़ी से एक गाड़ी में बैठी और घर की ओर रवाना हो गई। पीछे-पीछे गाड़ियों का एक लंबा काफिला, प्रशासनिक गाड़ियाँ और मीडिया की ओबी वैन भी दौड़ पड़ीं।

कुछ ही मिनटों में रागिनी अपने घर की दहलीज पर पहुँच गई। दरवाज़ा खुला हुआ था। अंदर रसोई से मसालों और गर्म तेल की खुशबू आ रही थी। रागिनी ने जूते उतारे और सीधे रसोई की ओर भागी। वहाँ चूल्हे के सामने खड़ी अर्चना पसीने से तर-बतर, बड़ी-बड़ी कढ़ाइयों में पूरियाँ और हलवा उतारने में व्यस्त थी। उसके माथे पर पसीने की बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं।

रागिनी ने बिना कुछ सोचे-समझे पीछे से जाकर अर्चना को अपनी बाँहों में कसकर भींच लिया। अर्चना चौंक गई और जैसे ही उसने रागिनी का चेहरा देखा, उसकी आँखें छलक पड़ीं। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछते हुए कहा, “अरे मेरी गुड़िया! तू आ गई? देख, मैंने तेरी पसंद का केसरिया हलवा बनाया है। तू थक गई होगी ना?”

अर्चना की इस निस्वार्थ ममता को देखकर रागिनी के सब्र का बाँध टूट गया। वह फफक-फफक कर रो पड़ी। उसने अर्चना का हाथ पकड़ा और उसे रसोई से बाहर बैठक में खींच लाई। तब तक पूरा घर पत्रकारों, कैमरामैनों और शहर के गणमान्य लोगों से भर चुका था। हरिशंकर जी, यशोदा जी और विवेक भी सिर झुकाए एक कोने में खड़े थे, क्योंकि रागिनी के तेवर देखकर वे समझ चुके थे कि आज कुछ ऐसा होने वाला है जो उनकी सोच की बुनियाद हिला देगा।

रागिनी ने कैमरे की चकाचौंध रोशनी के सामने अर्चना को अपने बराबर में खड़ा किया। अर्चना असहज होकर पीछे हटने लगी, लेकिन रागिनी ने उसका हाथ मजबूती से थामे रखा। रागिनी ने अपने बैग से वह मखमली डिब्बा निकाला, उसमें से सोने का मेडल निकाला और बिना एक पल गँवाए उसे बड़े अदब और सम्मान के साथ अपनी भाभी के गले में पहना दिया।

पूरे कमरे में कैमरों के फ्लैश चमक उठे। रागिनी ने मीडिया के माइक को अपने हाथ में लिया और भरे गले से बोली, “आज दुनिया मुझे चैंपियन कह रही है, अखबारों में मेरी तस्वीरें छपेंगी और मुझे पुरस्कार मिलेंगे। लेकिन इस पदक की असली हकदार मैं नहीं, मेरी भाभी अर्चना हैं। आज से तीन साल पहले जब मेरे अपने परिवार ने, मेरे पिता और भाई ने मुझे समाज के डर से घर के कोने में कैद करने का फैसला कर लिया था, तब यह पराई बेटी मेरे सपनों की ढाल बनकर खड़ी हुई थी। इन्होंने अपने ज़ेवर तक बेच दिए ताकि मुझे सही खुराक मिल सके। इन्होंने अपने सुखों का त्याग किया ताकि मैं रिंग में मुक्के बरसा सकूँ। और विडंबना देखिए कि आज जब जश्न का दिन आया, तो इन्हें फिर से उसी रसोई के धुएँ में धकेल दिया गया, क्योंकि हमारे समाज की नज़र में औरत का काम केवल तालियाँ बजाना और रोटियाँ सेकना है।”

रागिनी की बातें तीर की तरह हरिशंकर जी और विवेक के सीने में चुभ रही थीं। कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया था। रागिनी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “अगर एक बहू किसी बेटी के सपनों को पंख दे सकती है, तो उस बहू को समाज और घर में सिर का ताज बनने का पहला हक है। जब तक हम अपने घरों की इन देवियों को उनका उचित सम्मान नहीं देंगे, तब तक हमारा कोई भी पदक, कोई भी उपलब्धि बेमानी है।”

रागिनी के इन शब्दों ने वहाँ मौजूद हर इंसान की आँखों को नम कर दिया। मीडियाकर्मियों ने खड़े होकर तालियाँ बजाना शुरू कर दिया।

हरिशंकर जी के पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक चुकी थी। उन्हें अपनी संकीर्ण सोच और झूठी पुरुषवादी मर्यादा पर गहरा पछतावा हो रहा था। वे कांपते कदमों से आगे बढ़े और अर्चना के सिर पर हाथ रख दिया। उनकी आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे। वे रुंधे हुए गले से बोले, “बहू… आज इस बूढ़े बाप की आँखें खुल गईं। तू हमारे घर की बहू नहीं, साक्षात अन्नपूर्णा और इस कुल की तारनहार है। हमने हमेशा मर्यादा की दुहाई देकर सिर्फ़ बंदिशें लगाईं, लेकिन तूने त्याग और प्रेम से इस घर को असली मान दिलाया है। मुझे माफ़ कर दे बेटी, आज मैं तेरी तपस्या के आगे बहुत छोटा महसूस कर रहा हूँ।”

विवेक भी अपनी गलती पर शर्मिंदा होकर आगे आया और उसने हाथ जोड़कर अपनी पत्नी से माफी मांगी। माँ यशोदा जी ने दोनों बहु-बेटी को अपनी छाती से लगा लिया।

पूरा घर एक अद्भुत भावुकता और सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर हो गया था। अर्चना की आँखों में बहते आँसू अब दर्द के नहीं, बल्कि अपने त्याग को मिले उस सर्वोच्च सम्मान के थे, जिसकी वह सच्ची हकदार थी। रागिनी ने मुस्कुराते हुए अपनी भाभी को गले से लगा लिया। उसने न केवल देश के लिए पदक जीता था, बल्कि अपने ही घर की दीवारों को तोड़कर उस नारी को उसका खोया हुआ आत्मसम्मान और गौरव भी लौटा दिया था जिसने निस्वार्थ भाव से अपनी खुशियाँ उस पर वार दी थीं।

दोस्तों, आज भी हमारे समाज में ऐसे कई घर हैं जहाँ बेटों और बेटियों के बीच तो दीवारें हैं ही, साथ ही घर में ब्याह कर आई बहुओं के त्याग और भावनाओं को चौके-चूल्हे की राख तले दबा दिया जाता है। पर ज़रा सोचिए, क्या एक बहू सिर्फ़ जिम्मेदारियों का बोझ ढोने के लिए होती है, या फिर वह भी उस परिवार के हर सुख, सफलता और सम्मान में बराबर की हकदार है?

क्या आपके विचार से भी हमारे समाज को बहुओं के इस मौन त्याग को खुलकर स्वीकारना और उन्हें सम्मान देना नहीं सीखना चाहिए? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।

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