नेहा ने तुरंत शालिनी को गले से लगा लिया और उसकी पीठ सहलाते हुए बोली, “अरे भाभी, ऐसा मत कहिए। परिवार में तो ऐसी नोक-झोंक होती ही रहती है। आप मेरी बड़ी बहन जैसी हैं, आपसे भला मैं कैसे नाराज हो सकती हूं? आज हमारे देवर की शादी है, हम दोनों बहनों को मिलकर बारात में जमकर नाचना है!”
दोनों बहुओं को इस तरह गले मिलते देखकर गायत्री जी और हरिशंकर जी की आंखें भर आईं। घर की छत के नीचे जो एक अदृश्य दीवार खड़ी हो रही थी, वह आज प्यार, समझदारी और बड़ों के सही मार्गदर्शन से हमेशा-हमेशा के लिए ढह गई थी।
घर के आंगन में शहनाई की गूंज और ढोलक की थाप हर दिल में उमंग भर रही थी। आज घर के सबसे छोटे लाडले रोहन का विवाह था। पूरे परिवार के चेहरे पर रौनक खिली थी, लेकिन ऊपर-ऊपर से दिखती इस खुशहाली के पीछे रंजिश और जलन की एक धीमी आंच भी सुलग रही थी। यह घर था ग्वालियर के पुराने और प्रतिष्ठित माथुर परिवार का। बड़े बेटे विवेक और उनकी पत्नी शालिनी अपने दोनों बच्चों के साथ माता-पिता की देखरेख के बहाने पुश्तैनी मकान में ही रहते थे, जबकि मंझले बेटे मयंक की नौकरी भोपाल में थी, इसलिए वह अपनी पत्नी नेहा और अपनी सात साल की बेटी आरूषी के साथ वहीं रहता था। आज जब घर में बारात निकलने की तैयारियां हो रही थीं, तो रिश्तेदारों की चहल-पहल से कोना-कोना गुलजार था।
नेहा दो दिन पहले ही भोपाल से आई थी। वह स्वभाव से जितनी सीधी, सरल और ममतामयी थी, उसकी जेठानी शालिनी उतनी ही तेज-तर्रार, दिखावे की शौकीन और भीतर ही भीतर कुढ़ने वाली महिला थी। शालिनी के दिल में हमेशा एक चुभन रहती थी कि नेहा शहर में रहकर ऐशो-आराम से जीती है, उसे रोज-रोज सास-ससुर की खटपट और घरेलू जिम्मेदारियों से जूझना नहीं पड़ता, जबकि असलियत यह थी कि नेहा संयुक्त परिवार से दूर रहकर अक्सर अकेलापन महसूस करती थी। जब भी घर में कोई पर्व या उत्सव होता, वह जी-जान से मायके और ससुराल के रिश्तों को सींचने में जुट जाती थी।
शाम को बारात निकलने का समय करीब आ रहा था। तभी शालिनी सज-संवरकर कमरे से निकली। उसने भारी-भरकम डिजाइनर कांजीवरम साड़ी पहनी थी, जिसके बॉर्डर पर जरदोजी का बारीक काम दमक रहा था। गले में कुंदन का भारी नौलखा हार और मांगटीका उसकी शान को कई गुना बढ़ा रहा था। वह इतराती हुई नेहा के कमरे में दाखिल हुई। नेहा उस समय अपने सूटकेस से एक खूबसूरत गहरे लाल और सुनहरी जरी वाली बनारसी साड़ी निकालकर बिस्तर पर सहेज रही थी।
“अरे वाह नेहा! बारात चढ़ने का वक्त हो रहा है, क्या पहनने का इरादा है तुम्हारा?” शालिनी ने एक बनावटी मुस्कान के साथ पूछा।
नेहा ने अपनी साड़ी को बड़े स्नेह से छूते हुए कहा, “भाभी, पिछले करवाचौथ पर मयंक जी ने यह साड़ी बहुत ढूंढकर मेरे लिए खरीदी थी। उन्होंने कहा था कि जब छोटे की शादी होगी, तो मैं यही पहनूं। आज पहली बार निकाल रही हूं। वैसे भाभी, आप तो वाकई बहुत खूबसूरत लग रही हैं! आखिर सबसे बड़ी जेठानी हैं, आपका रौब तो दिखना ही चाहिए।”
शालिनी ने नेहा की साड़ी को ऊपर से नीचे तक देखा। साड़ी का रेशम इतना शुद्ध था और उसका लाल रंग इतना चटक था कि कमरे की रोशनी में भी वह जगमगा रही थी। शालिनी के कलेजे पर जैसे सांप लोट गया। उसे लगा कि अगर नेहा ने यह साड़ी पहन ली, तो सारे मेहमानों की नजरें उसी पर टिक जाएंगी और उसकी खुद की महंगी कांजीवरम साड़ी फीकी पड़ जाएगी।
शालिनी ने फौरन अपने चेहरे पर बनावटी चिंता और शिकन के भाव ओढ़ लिए। उसने एक अजीब सा मुंह बनाया और बोली, “हम्म… साड़ी बुरी तो नहीं है नेहा, लेकिन… बुरा मत मानना, आजकल ऐसी पारंपरिक बनारसी साड़ियां बहुत पुरानी चाल की लगती हैं। आजकल तो पेस्टल शेड्स और हल्की जॉर्जेट साड़ियों का फैशन चल रहा है। देवर की शादी है तुम्हारी, लोग कहेंगे कि मंझली बहू इतने पुराने ढर्रे के कपड़े पहनकर आ गई। मयंक को तो फैशन की समझ है नहीं, उसने तो जो देखा ले लिया।”
नेहा का चेहरा थोड़ा उतर गया। उसने संकोच से कहा, “लेकिन भाभी, मुझे तो यह बहुत प्यारी लगी थी और इसके साथ मैचिंग झुमके भी लाई हूं…”
“अरे छोड़ो भी! रुको, मेरे पास तुम्हारे लिए एक बेहद मॉडर्न साड़ी है।” यह कहकर शालिनी तुरंत अपने कमरे की तरफ भागी और कुछ ही देर में हाथ में एक फीकी राखिया-गुलाबी रंग की साड़ी लेकर लौटी। वह साड़ी देखने में बेहद साधारण, बिना चमक-दमक वाली थी, जिसका पल्लू भी काफी घिसा हुआ लग रहा था। शालिनी ने वह साड़ी नेहा के हाथ में थमाते हुए कहा, “यह देखो! यह बिल्कुल नया ट्रेंड है। मैंने सिर्फ एक बार किसी छोटी किटी पार्टी में पहनी थी। तुम इसे पहन लो। यह हल्की भी है और तुम्हें काफी सोबर लुक देगी।”
नेहा ने हिचकिचाते हुए मना करने की कोशिश की, “नहीं भाभी, रहने दीजिए। यह आपकी साड़ी है और फिर शादी का माहौल है, कुछ चटक रंग ही अच्छा लगेगा। मैं अपनी ही साड़ी संभाल लूंगी।”
शालिनी ने तुरंत बात का रुख मोड़ते हुए शिकायती लहजा अपनाया, “क्या नेहा! तुम भी न पराया करने लगीं? जेठानी को बड़ी बहन का दर्जा दिया गया है और तुम मेरी एक छोटी सी बात नहीं मान सकतीं? क्या मेरा-तेरा लगा रखा है? और अगर तुम गहनों की बात कर रही हो, तो चिंता मत करो, इसके साथ पहनने के लिए मैं तुम्हें अपना एक सेट दे दूंगी। बस, अब कोई ना-नुकर नहीं, तुम यही साड़ी पहनोगी।”
शालिनी के इस जबरन अपनत्व और मान-मनौव्वल के आगे सीधी-सादी नेहा झुक गई। वह नहीं चाहती थी कि शादी जैसे शुभ मौके पर किसी बात को लेकर जेठानी का दिल दुखे या घर में कोई खिंचाव पैदा हो। उसने भारी मन से वह फीकी साड़ी ले ली और अपनी प्यारी बनारसी साड़ी वापस सूटकेस में रख दी।
शालिनी अपने कमरे में लौट आई। उसके होंठों पर एक कुटिल मुस्कान तैर रही थी। उसने अपनी अलमारी के कोने से एक नकली मोतियों और तांबे की पालिश वाला पुराना सेट निकाला, जिसकी चमक बहुत पहले ही उतर चुकी थी, और ले जाकर नेहा को दे दिया। शालिनी मन ही मन सोच रही थी कि जब नेहा इस फीकी साड़ी और बेजान गहनों में नीचे आएगी, तो हर कोई उसे एक साधारण और उपेक्षित बहू समझेगा, जबकि सारी महफिल की वाहवाही सिर्फ और सिर्फ उसी की झोली में गिरेगी।
कुछ देर बाद जब नेहा पूरी तरह तैयार होकर आई, तो आईने में खुद को देखकर उसकी आंखों में हल्की सी नमी तैर गई। साड़ी का रंग उस पर बिल्कुल नहीं खिल रहा था, गहने भी बेमेल थे। लेकिन उसने अपने चेहरे पर एक गरिमामयी मुस्कान सजाई और अपनी ममतामयी सास गायत्री जी के कमरे की ओर बढ़ी ताकि उनके चरण छूकर आशीर्वाद ले सके।
कमरे में ससुर हरिशंकर जी और सास गायत्री जी बैठे हुए थे। गायत्री जी घुटनों के दर्द के कारण पिछले कुछ दिनों से काफी परेशान थीं। जैसे ही नेहा कमरे में दाखिल हुई, सास ने सिर उठाकर उसे देखा। उनकी अनुभवी नजरों ने एक पल में भांप लिया कि बात क्या है। गायत्री जी जानती थीं कि मयंक ने नेहा के लिए कितने चाव से साड़ी खरीदी थी, जिसकी तस्वीर नेहा ने वीडियो कॉल पर उन्हें भी दिखाई थी। पर आज बारात के मौके पर नेहा के बदन पर शालिनी की वह पुरानी, बेमेल साड़ी देखकर वे चौंक गईं।
“नेहा बेटी, आगे आ,” गायत्री जी ने स्नेह से पुकारा।
नेहा ने झुककर सास-ससुर के पैर छुए। हरिशंकर जी ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, “सदा सुहागन रहो बहू।”
गायत्री जी ने नेहा का हाथ अपने हाथों में लिया और पूछा, “बहू, तूने वह साड़ी क्यों नहीं पहनी जो मयंक तेरे लिए लाया था? यह साड़ी तो शालिनी की है ना?”
नेहा ने बात को संभालते हुए मुस्कुराकर कहा, “मां जी, भाभी ने बड़े प्यार से कहा कि आजकल यही फैशन में है और उन्होंने अपनी साड़ी मुझे खुद निकाल कर दी। उनका मन रखने के लिए मैंने पहन ली। कपड़ों से क्या फर्क पड़ता है मां जी, मन में उल्लास होना चाहिए, आज मेरे प्यारे देवर की शादी जो है।”
गायत्री जी ने एक गहरी सांस ली। वे अपनी दोनों बहुओं की फितरत से अच्छी तरह वाकिफ थीं। शालिनी का यह दांव उनकी समझ में आ गया था कि वह कैसे नेहा को दबाने और खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए रिश्तों की मर्यादा से खेल रही थी।
तभी दरवाजे पर खटखटाने की आवाज आई। विवेक और मयंक बारात रवानगी की व्यवस्था देखने के लिए बुलाने आए थे। मयंक ने जब नेहा को देखा, तो उसके चेहरे पर भी हल्का सा आश्चर्य उभरा, लेकिन नेहा ने इशारों ही इशारों में उसे शांत रहने का संकेत दे दिया। मयंक ने कुछ नहीं कहा, पर उसकी आंखों में पत्नी के इस सादगी भरे समर्पण के लिए आदर और बढ़ गया।
गायत्री जी धीरे से उठीं। उन्होंने अपनी पुरानी भारी अलमारी की चाबी निकाली। वह अलमारी उनके पूर्वजों की धरोहर थी। गायत्री जी ने अलमारी के गुप्त दराज से एक मखमली संदूकची निकाली। संदूकची को खोलते ही उसमें से खानदानी कुंदन और असली पन्ने का बना वह ऐतिहासिक हार चमक उठा, जो इस घराने की सबसे बड़ी पहचान था। यह वही हार था जो गायत्री जी को उनकी सास ने अपनी खानदानी परंपरा सौंपते हुए दिया था।
शालिनी कब से उस हार पर अपनी नजरें गड़ाए बैठी थी। उसे पूरा यकीन था कि बड़ी बहू होने के नाते आज देवर की शादी में वह हार उसी के गले की शोभा बनेगा।
गायत्री जी ने नेहा को अपने करीब बुलाया। उन्होंने नेहा के गले से शालिनी का दिया हुआ वह बेजान, नकली सेट उतारा और उसे एक किनारे रख दिया। फिर उन्होंने अपने कांपते लेकिन ममता भरे हाथों से वह खानदानी हार नेहा के गले में पहना दिया। साथ ही, उन्होंने अपने बक्से से गहरे लाल रंग की शुद्ध पश्मीना की एक नक्काशीदार शॉल निकाली और बड़े सलीके से नेहा के कंधे पर ओढ़ा दी।
लाल शॉल की शाही छटा और कुंदन के हार की दमक ने उस फीकी साड़ी के साधारणपन को पूरी तरह ढक दिया। नेहा का सादा, शांत और सौम्य चेहरा उस खानदानी आभूषण की आभा से दमकने लगा। वह सादगी की मूरत होते हुए भी किसी राजघराने की महारानी जैसी भव्य लगने लगी।
“मां जी, यह क्या कर रही हैं आप? यह तो आपकी खानदानी धरोहर है, इस पर तो भाभी का…” नेहा ने संकोच से कहना चाहा।
तभी शालिनी भी कमरे में दाखिल हुई। जैसे ही उसकी नजर नेहा के गले में जगमगाते उस पुश्तैनी हार और कंधे पर सजी उस बेशकीमती शॉल पर पड़ी, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका चेहरा मारे गुस्से और हैरानी के फक पड़ गया।
“मां जी! यह हार तो…” शालिनी की आवाज लड़खड़ा गई।
गायत्री जी ने पलटकर शालिनी की आंखों में देखा। उनकी नजरों में कोई क्रोध नहीं था, बल्कि एक शांत और गंभीर गरिमा थी। उन्होंने बहुत ही कोमल लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “हां शालिनी, यह वही हार है जो इस घर की परंपरा का प्रतीक है। गहने और साड़ियां किसी इंसान का कद नहीं बढ़ाते बहू, इंसान का कद उसकी नीयत और उसके संस्कारों से तय होता है। तूने नेहा को अपनी यह साड़ी बहुत प्यार और अपनेपन का वास्ता देकर पहनाई थी ना? नेहा ने तेरी बात का मान रखा, उसने अपना मन मारकर भी तेरी खुशी को आगे रखा। जब एक देवरानी अपनी जेठानी के दिए कपड़े को बिना किसी शिकायत के माथे से लगा सकती है, तो फिर इस घर की मां का भी फर्ज बनता है कि वह अपनी बहू के त्याग को अपनी सबसे बड़ी दौलत से सजाए।”
शालिनी के चेहरे का रंग उड़ चुका था। उसे समझ आ गया कि उसकी चालाकी सास की पारखी नजरों से छिप नहीं सकी थी।
गायत्री जी ने आगे बढ़कर शालिनी का हाथ भी अपने हाथ में लिया और ममता से समझाया, “शालिनी, तू इस घर की बड़ी बहू है। बड़ी बहू का दिल भी घर में सबसे बड़ा होना चाहिए। जब घर में दो बर्तन होते हैं, तो वे टकराते नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहारे से ही रसोई चलती है। मयंक और नेहा बाहर रहते हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि वे परिवार का हिस्सा नहीं हैं या हमारे प्रति उनका फर्ज कम है। तूने जो किया, अगर मैं उस पर गुस्सा करती तो आज इस शादी के दिन घर में दरार पड़ जाती। लेकिन मैं तुझे यह समझाना चाहती हूं कि छोटा दिखाने की नीयत से कभी कोई खुद बड़ा नहीं बन पाता। बड़प्पन त्याग में है, दूसरों को समेटने में है, उनकी चमक छीनने में नहीं।”
सास की यह बात सीधे शालिनी के दिल पर तीर की तरह लगी। उसे अपनी छोटी सोच, अपनी ईर्ष्या और अपनी ओछी हरकत पर गहरा पछतावा होने लगा। उसने देखा कि नेहा की आंखों में उसके प्रति कोई द्वेष या बदले की भावना नहीं थी, बल्कि नेहा अब भी उसकी तरफ सहानुभूति और सम्मान से देख रही थी।
शालिनी का अहंकार पल भर में पिघलकर बह गया। उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू छलक पड़े। वह आगे बढ़ी और उसने नेहा के दोनों हाथ थाम लिए।
“मुझे माफ कर दो नेहा… मुझे सच में माफ कर दो,” शालिनी की आवाज भर्रा गई। “मैं इतनी अंधी हो गई थी कि तुम्हारी सादगी और प्रेम को कमजोरी समझ बैठी। मुझे हमेशा लगता था कि तुम दूर रहकर सुखी हो और मैं यहां पिस रही हूं। इसी जलन ने मेरी बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी। आज अगर मां जी ने मेरी आंखें न खोली होतीं, तो शायद मैं कभी अपनी गलती समझ ही नहीं पाती।”
नेहा ने तुरंत शालिनी को गले से लगा लिया और उसकी पीठ सहलाते हुए बोली, “अरे भाभी, ऐसा मत कहिए। परिवार में तो ऐसी नोक-झोंक होती ही रहती है। आप मेरी बड़ी बहन जैसी हैं, आपसे भला मैं कैसे नाराज हो सकती हूं? आज हमारे देवर की शादी है, हम दोनों बहनों को मिलकर बारात में जमकर नाचना है!”
दोनों बहुओं को इस तरह गले मिलते देखकर गायत्री जी और हरिशंकर जी की आंखें भर आईं। घर की छत के नीचे जो एक अदृश्य दीवार खड़ी हो रही थी, वह आज प्यार, समझदारी और बड़ों के सही मार्गदर्शन से हमेशा-हमेशा के लिए ढह गई थी।
बारात जब मैरिज गार्डन पहुंची, तो माहौल देखने लायक था। बारात के स्वागत के समय जब दोनों बहुएं एक साथ आगे बढ़ीं, तो सभी रिश्तेदार दंग रह गए। शालिनी अपनी कांजीवरम साड़ी में गरिमामयी लग रही थी और नेहा उस सादगी और खानदानी हार के साथ असीम शांति बिखेर रही थी। लेकिन सबसे खूबसूरत बात यह थी कि दोनों के चेहरों पर एक सच्चा अपनापन और एक-दूसरे के प्रति गहरा आदर झलक रहा था। जो कोई भी उन्हें देखता, यही कहता कि माथुर परिवार की बहुएं केवल सुंदर ही नहीं, बल्कि संस्कारों और प्रेम की साक्षात मूरत हैं।
उस रात बारात के मंडप में सिर्फ एक नए जोड़े का फेरा नहीं हुआ था, बल्कि एक पूरे परिवार के बिखरे हुए धागे फिर से एक मजबूत और अटूट रिश्ते की डोर में बंध गए थे।
क्या परिवार में छोटा-बड़ा बनने की होड़ से रिश्ते कमजोर होते हैं? अगर जेठानी की जगह आप होते, तो परिवार की एकता के लिए क्या कदम उठाते? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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