सोफे पर बैठे अवनीश जी अपने चश्मे को ठीक करते हुए अखबार के पन्ने पलट रहे थे। तभी उनका उन्नीस वर्षीय बेटा आयुष हाथ में कॉलेज का ब्रोशर लिए तेजी से कमरे में दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी और साथ ही भारी उत्साह तैर रहा था।
“पापा! आपको याद है न, इस शनिवार को हमारे कॉलेज का गोल्डन जुबली एनुअल फेस्ट है? ऑडिटोरियम में होने वाले मुख्य नाटक में मुझे मुख्य नायक का किरदार मिला है। आपको हर हाल में शनिवार दोपहर बारह बजे तक पहुँच जाना है। और हाँ पापा, उस दिन आप वही ग्रे रंग का जोधपुरी सूट पहनिएगा जो आपने पिछले महीने लिया था। आप उसमें बहुत प्रभावशाली और रोबदार दिखते हैं।” आयुष ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखते हुए बड़े लाड़ से कहा।
अवनीश जी ने अखबार मोड़कर मेज पर रखा और मुस्कुराते हुए बोले, “अरे वाह! इतनी तारीफ? लगता है कोई बड़ा काम करवाने का इरादा है या फिर सच में बेटे को बाप की याद आ गई?”
“नहीं पापा, सच कह रहा हूँ। उस दिन चीफ गेस्ट के साथ-साथ शहर के कई जाने-माने उद्योगपति और मेरे दोस्तों के बड़े-बड़े परिवार आने वाले हैं। मैं चाहता हूँ कि जब आप ऑडिटोरियम में कदम रखें, तो सब कहें कि आयुष के पापा कितने ग्रेसफुल और मॉडर्न हैं।” आयुष के चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था।
रसोई से गरमा-गरम मेथी के पराठे और अदरक वाली चाय की प्यालियाँ लेकर आयुष की माँ, शारदा जी, कमरे में आईं। उनके चेहरे पर वही जानी-पहचानी ममतामयी और शांत मुस्कान थी। उन्होंने नाश्ते की प्लेट मेज पर रखी और आयुष के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा, “बड़ी खुशी की बात है बेटा। तेरे पापा तो जोधपुरी सूट में हमेशा ही अच्छे लगते हैं। पर तू नाश्ता ठंडा मत कर, पहले दो निवाले खा ले।”
अवनीश जी ने चाय का घूंट भरा और पत्नी की ओर प्रेमपूर्वक देखते हुए बोले, “शारदा, सिर्फ मेरे सूट की बात क्यों हो रही है? तुम बताओ, तुमने उस दिन के लिए कौन सी साड़ी निकाली है? मेरे ख्याल से जो कांजीवरम सिल्क मैंने तुम्हें तुम्हारी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह पर दी थी, वही पहनना। जब तुम उस गहरे मैरून रंग की साड़ी में बैठोगी, तो पूरे हॉल में तुम्हारी सादगी और गरिमा सबसे अलग चमकेगी।”
शारदा जी ने हल्की सी झेंप के साथ अपनी पल्लू का कोना ठीक किया और धीमी आवाज में कहा, “आप भी न… इस उम्र में बच्चों के सामने कुछ भी बोल देते हैं। ज़रा तो लिहाज़ किया कीजिए।”
“अरे भाई, अपने ही बेटे के सामने अपनी धर्मपत्नी की तारीफ करने में कैसा संकोच? क्यों आयुष, मैंने बिल्कुल सही कहा न?” अवनीश जी ने मुस्कुराते हुए बेटे की तरफ देखा।
लेकिन आयुष के चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी। उसके माथे पर बल पड़ गए और उसने अपनी चाय का कप मेज पर रखते हुए बेहद सपाट और रूखे स्वर में कहा, “पापा… माँ का वहाँ क्या काम? मैंने तो सिर्फ आपको आने का न्योता दिया है। माँ को घर पर ही रहने दीजिए।”
ड्राइंग रूम में एक पल के लिए सन्नाटा पसर गया। दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी की टिक-टिक अचानक बहुत तेज सुनाई देने लगी।
शारदा जी के हाथ वहीं थम गए। उनकी आँखें पलभर में छलक आईं। उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। यह वही आयुष था, जो बचपन में जब स्कूल से लौटता था, तो बस्ता फेंककर सबसे पहले पूरे घर में ‘माँ-माँ’ पुकारता हुआ दौड़ता था। ज़रा सी चोट लगने पर जिसका रोना केवल माँ के सीने से लगकर थमता था। हर छोटी-बड़ी बात, स्कूल के झगड़े, दोस्तों की शरारतें, सब कुछ सबसे पहले अपनी माँ को सुनाता था। आज उसी बेटे के मुँह से यह शब्द निकल रहे थे कि ‘माँ का वहाँ क्या काम?’
अवनीश जी की भृकुटियाँ तन गईं। उन्होंने अपनी चाय का कप झटके से मेज पर रखा और गंभीर स्वर में पूछा, “आयुष! यह तुम क्या कह रहे हो? तुम्हें होश भी है कि तुम अपनी माँ से किस लहजे में बात कर रहे हो? मुझे अपनी परवरिश पर शर्म आ रही है कि तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते हो!”
आयुष ने अपनी नजरें चुराने की बजाय चिढ़कर कहा, “पापा, आप बात का बतंगड़ बना रहे हैं। इसमें इतना हैरान होने की क्या जरूरत है? मैं बस इतना कह रहा हूँ कि माँ वहाँ फिट नहीं बैठेंगी। उनके वहाँ जाने से मेरे दोस्तों के बीच मेरी जो इमेज बनी है, उस पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।”
शारदा जी ने कांपते होठों और भीगे कंठ से पूछा, “बेटा… मेरे वहाँ जाने से तुम्हारी इमेज कैसे खराब हो जाएगी? मैंने तो कभी तुझे किसी के सामने शर्मिंदा नहीं किया। मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि तू क्या कहना चाहता है।”
“माँ, समझने की कोशिश कीजिए!” आयुष थोड़े ऊंचे स्वर में बोला, “मेरे कॉलेज के जितने भी दोस्त हैं—रोहन, समर, कबीर—उन सबकी मम्मियाँ बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों में काम करती हैं, कोई बैंकर है तो कोई कॉलेज में प्रोफेसर। वे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हैं, उनका एक लाइफस्टाइल है, फैशन सेंस है। और आप? आप सिर्फ एक साधारण हाउसवाइफ हैं। न आपको आज के मॉडर्न ट्रेंड्स का पता है, न बिजनेस की समझ है, न ही आप उन अमीर और हाई-फाई आंटियों के बीच उठने-बैठने लायक हैं। अगर मेरे दोस्त आपसे अंग्रेजी में बात करने लगे या आपके प्रोफेशन के बारे में पूछने लगे, तो मैं क्या मुँह दिखाऊँगा? सब कहेंगे कि आयुष की माँ सिर्फ चूल्हा-चौका संभालती हैं!”
“खामोश रहो आयुष!” अवनीश जी की आवाज में ऐसा गरजता हुआ क्रोध था कि आयुष अपनी जगह सिहर उठा। अवनीश जी सोफे से उठ खड़े हुए।
“क्या हाउसवाइफ होना कोई गुनाह है? कोई हीनता की निशानी है?” अवनीश जी की आँखें लाल हो चुकी थीं। “तुम्हारी माँ केवल हाउसवाइफ नहीं, इस घर की रीढ़ है, होममेकर है! अगर ये न होतीं, तो यह आलीशान मकान सिर्फ सीमेंट और ईंटों का एक खोखला ढांचा होता, घर नहीं। तुमने अपनी माँ के वजूद को सिर्फ एक शब्द में समेट कर उसका मोल घटा दिया?”
आयुष ने ढिठाई से जवाब दिया, “पापा, आप भावुक हो रहे हैं। हाउसवाइफ कहें या होममेकर, असलियत तो यही है न कि माँ ने जिंदगी में कोई करियर नहीं बनाया। घर का काम तो कोई भी बिना पढ़ा-लिखा इंसान भी कर सकता है। बाहर जाकर नौकरी करने से, पैसे कमाने से समाज में रुतबा बनता है, घर के भीतर रोटियाँ सेकने और झाड़ू-पोछा देखने से कोई स्टेटस नहीं मिलता। मुझे अपनी सोशल लाइफ और रेपुटेशन की चिंता है, इसमें गलत क्या है?”
अवनीश जी ने एक गहरी और तल्ख सांस ली। वे कुछ पल तक अपने बेटे को अविश्वास से घूरते रहे। “वाह आयुष! बहुत खूब। कुछ साल कॉलेज क्या चले गए, चार अंग्रेजी की किताबें और महंगे कपड़े क्या पहन लिए, तुमने समझ लिया कि तुम्हें अपनी जन्मदात्री का अपमान करने का अधिकार मिल गया? दूध के दांत अभी पूरी तरह गिरे नहीं और अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया! आज तुम अपनी माँ को गंवार और अनपढ़ जैसा दर्जा दे रहे हो, कल को अगर मैं बूढ़ा और लाचार हो जाऊँगा, तो शायद मुझे भी अपने दोस्तों से छुपाओगे कि यह बूढ़ा मेरी रेपुटेशन खराब कर देगा!”
आयुष के पास इस बात का कोई सीधा जवाब नहीं था, लेकिन उसके चेहरे पर अब भी वही हठधर्मी थी। उसने नजरें नीची करते हुए धीरे से कहा, “पापा, माँ ने जो किया, वह तो हर माँ का फर्ज होता है। उसमें कौन सा अहसान है?”
“फर्ज?” अवनीश जी की आवाज तीखी हो गई। “और तुम्हारा फर्ज क्या है? जिस माँ ने नौ महीने तुम्हें अपनी कोख में रखकर अपना खून पिलाया, जब तुम बचपन में गंभीर निमोनिया से पीड़ित थे तो पंद्रह दिन तक बिना सोए तुम्हारी छाती पर सिर रखकर बैठी रही, उसका फर्ज था? आज जो तुम इस मुकाम पर पहुंचे हो, कॉलेज के टॉपर बने बैठे हो, डिबेट और नाटकों में हिस्सा लेते हो, वह तुम्हारे अंदर अनुशासन और संस्कार किसने बोए? मैंने? नहीं! मैं तो दिन भर दफ्तर में बैठकर फाइलें निपटाता था और करियर बनाता था। मेरे करियर की नींव तुम्हारी माँ के त्याग पर टिकी है। मैं निश्चिंत होकर काम इसलिए कर पाता था क्योंकि मुझे पता था कि घर पर शारदा है, जो मेरी और तुम्हारी हर जरूरत का ध्यान अपनी सांसों से ज्यादा रखती है।”
शारदा जी ने आगे बढ़कर अवनीश जी का हाथ पकड़ लिया, “रहने दीजिए जी… जाने दीजिए। बच्चा है, नासमझी में बोल गया। आप अपना बीपी मत बढ़ाइए।”
“नहीं शारदा, आज नहीं! आज इसे सच सुनना ही होगा, वरना यह जिंदगी भर इस झूठे दिखावे और खोखले स्टेटस के दलदल में धंसा रहेगा।” अवनीश जी ने शारदा का हाथ सहलाते हुए आयुष की ओर रुख किया।
“आयुष, तुझे लगता है कि तेरी माँ को बाहर की दुनिया की समझ नहीं है? तेरी माँ अनपढ़ है? तुझे शायद यह जानकर अपनी अज्ञानता पर रोना आएगा कि तुम्हारी माँ ने वनस्थली विद्यापीठ से अंग्रेजी साहित्य में गोल्ड मेडल हासिल किया था। शादी से पहले और तुम्हारे पैदा होने के शुरुआती दो सालों तक, तुम्हारी माँ शहर के सबसे प्रतिष्ठित इंटरनेशनल स्कूल में सीनियर लेक्चरर थीं। उनका वेतन और उनका मान-सम्मान किसी भी कॉरपोरेट अधिकारी से कम नहीं था।”
आयुष ने चौंककर अपनी माँ की तरफ देखा। उसकी आँखों में गहरा आश्चर्य तैर गया। “क्या… यह सच है?”
“हाँ, बिल्कुल सच है!” अवनीश जी ने दृढ़ता से कहा। “जब तुम तीन साल के हुए और तुम्हें बार-बार अस्थमा के दौरे पड़ने लगे, तब डॉक्टरों ने कहा था कि इस बच्चे को चौबीसों घंटे विशेष देखभाल और प्यार की जरूरत है। उस दिन तुम्हारी माँ के सामने दो रास्ते थे—या तो वह अपने करियर को चुनकर तुम्हें किसी आया के भरोसे छोड़ देतीं, या फिर अपने सारे सपनों और डिग्रियों को एक बक्से में बंद करके तुम्हारे जीवन को संवारने में लग जातीं। तुम्हारी माँ ने बिना एक पल की हिचकिचाहट के अपना इस्तीफा सौंप दिया। उन्होंने कभी इस बात का ढिंढोरा नहीं पीटा, कभी अहसान नहीं जताया।”
अवनीश जी आगे बढ़े और उन्होंने बुकशेल्फ के नीचे की दराज खोली। उसमें से एक पुरानी मखमली डायरी और कुछ शील्ड्स व प्रमाण पत्र निकाले। उन्होंने वे सब आयुष के हाथों पर रख दिए।
“और रही बात समाज और पहचान की… तुम्हारी माँ तुम्हारे उन अमीर दोस्तों की माताओं की तरह किटी पार्टियों में जाकर गॉसिप नहीं करतीं। वे चुपचाप अपने खाली समय में अनाथालय के बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाती हैं और सामाजिक सरोकारों पर गंभीर आलेख लिखती हैं, जो देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं। इनकी लिखी रचनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। लेकिन इन्होंने कभी अपने ज्ञान का घमंड नहीं किया, क्योंकि इनके लिए परिवार की खुशी ही इनका सबसे बड़ा मेडल थी। और आज तुम… चंद सतही और खोखले दोस्तों के सामने अपनी उस माँ का परिचय देने से कतरा रहे हो, जिसकी परछाईं के बराबर भी बनने की तुम्हारी औकात नहीं है!”
आयुष के हाथों में वे प्रमाणपत्र कांप रहे थे। उसने देखा—’शारदा शर्मा, यूनिवर्सिटी टॉपर, मास्टर ऑफ आर्ट्स’, साथ में समाज सेवा के कई सम्मान पत्र। उसने अपनी माँ की डायरी खोली, जिसके पहले पन्ने पर लिखा था—”मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरा बेटा आयुष है, जिसके चेहरे की मुस्कान मेरे हर छूटे हुए सपने की भरपाई कर देती है।”
आयुष के पैरों तले से मानो जमीन खिसक गई। उसके सीने में अपराधबोध का एक ऐसा बवंडर उठा जिसने उसके सारे झूठे अहंकार, मॉडर्न दिखावे और हीनभावना को एक झटके में राख कर दिया। जिन दोस्तों के स्टेटस के आगे वह अपनी माँ को छुपाना चाहता था, वे दोस्त और उनकी बातें कितनी छोटी, कितनी खोखली थीं! उसकी माँ तो त्याग, विद्या और गरिमा की साक्षात मूरत थीं, जिन्हें उसने सिर्फ एक घरेलू औरत समझकर दुत्कार दिया था।
आयुष की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उसने प्रमाणपत्र मेज पर रखे और घुटनों के बल फर्श पर बैठकर अपनी माँ के दोनों पैर पकड़ लिए।
“माँ… मुझे माफ कर दो माँ! मुझे माफ कर दो… मैं अंधा हो गया था। दोस्तों के झूठे ठाठ-बाट और अंग्रेजी के दिखावे ने मेरी अक्ल पर पर्दा डाल दिया था। मैं इतना गिर गया कि जिसने मुझे इंसान बनाया, उसी के वजूद पर सवाल उठाने लगा। मैं भूल गया था कि संस्कारों और ममता की कोई डिग्री नहीं होती, और आपकी डिग्री तो मेरी सोच से भी बहुत बड़ी है माँ!” आयुष बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा।
शारदा जी का मातृत्व जाग उठा। एक माँ अपने बच्चे की नासमझी पर कितनी भी आहत क्यों न हो, उसके सच्चे आंसुओं के आगे उसका हर दर्द पिघल जाता है। शारदा जी ने तुरंत झुककर आयुष को उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
“बस कर मेरे बच्चे… रो मत। तूने अपनी गलती समझ ली, मेरे लिए यही बहुत है। माँ कभी अपने बच्चों से हमेशा के लिए रूठ सकती है क्या? लेकिन एक बात हमेशा याद रखना बेटा, दुनिया में कपड़े, अंग्रेजी और पद कभी किसी इंसान की असल पहचान नहीं होते। इंसान की असली पहचान उसके चरित्र, उसकी जड़ों और उसके संस्कारों से होती है। अपनी जड़ों को भूलकर जो पेड़ आसमान छूना चाहता है, वह पहली ही आंधी में गिर जाता है।”
आयुष ने अपने आंसू पोंछे और दोनों हाथ जोड़कर पिता के सामने खड़ा हो गया, “पापा, आपने आज मेरी आँखें खोल दीं। अगर आज आपने मुझे यह आईना न दिखाया होता, तो शायद मैं जिंदगी भर इस खोखले घमंड में जीता रहता।” फिर उसने माँ की ओर मुड़कर अत्यंत गर्व और श्रद्धा से कहा, “माँ, शनिवार को आप उसी कांजीवरम साड़ी में मेरे कॉलेज चलेंगी। ऑडिटोरियम की सबसे पहली कतार में आप और पापा बैठेंगे। और नाटक खत्म होने के बाद, जब मुझे मंच पर बुलाया जाएगा, तो मैं माइक पर पूरे कॉलेज के सामने गर्व से कहूँगा—’यह मेरी माँ हैं, जिन्होंने मुझे इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए अपने सुनहरे करियर की आहुति दे दी। मैं आज जो कुछ भी हूँ, अपनी इसी देवी जैसी माँ की बदौलत हूँ!’ अब मुझे किसी की परवाह नहीं, मेरी सबसे बड़ी रेपुटेशन मेरी माँ हैं।”
अवनीश जी के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान खिल उठी। उन्होंने आगे बढ़कर आयुष और शारदा दोनों को अपने आगोश में भर लिया। घर का वह कोना एक बार फिर अपनत्व, सम्मान और सच्ची पारिवारिक मिठास से महक उठा था।
विचारणीय प्रश्न: आज के आधुनिक दौर में अक्सर युवा पीढ़ी बाहरी चमक-दमक और सोशल स्टेटस की दौड़ में अपने ही माता-पिता के त्याग और सादगी को कम आंकने की भूल कर बैठती है। क्या एक गृहिणी का सम्मान किसी भी नौकरीपेशा व्यक्ति से कम होना चाहिए? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें अपनी राय जरूर लिखकर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।
लेखिका : रागिनी दत्त