असली दौलत बैंक बैलेंस नहीं…

जब तान्या को पूरी तरह होश आया, तो उसने देखा कि उसकी दाईं तरफ उसकी सास बैठी धीरे-धीरे उसके माथे पर हाथ फेर रही थीं और उनकी आँखों में आँसू थे। बाईं तरफ जेठानी जी थर्मस में हल्का सूप लिए खड़ी थीं। दरवाज़े पर उसका देवर मानव, कमज़ोरी के बावजूद चेहरे पर मुस्कान लिए खड़ा था।

तान्या ने जब सुना कि उसकी जान किसी और ने नहीं, बल्कि उसी देवर के खून ने बचाई है जिसे वह कभी अपने कमरे में फटकने भी नहीं देती थी, तो उसकी आत्मा काँप उठी। वह फूट-फूट कर रोने लगी।

“अरे तान्या! ये क्या… इतनी सारी डिशेज़? दाल मखनी, शाही पनीर, भरवां करेले, कचौड़ियाँ और गरमा-गरम मूंग दाल का हलवा भी! ये सब तूने अकेले मेरे स्वागत के लिए बनाया है? सच में, व्हाट अ सरप्राइज़!”

तान्या ने अपने चेहरे पर आई रेशमी लट को धीरे से कान के पीछे किया और मुस्कुराते हुए मेज पर काँच का जग रखते हुए बोली, “नहीं रूही, ये सब अकेले मैंने नहीं बनाया। ये तो घर के सभी लोगों ने मिलकर तैयार किया है। हलवा बड़ी भाभी ने भुना है, पनीर का मसाला ताई जी ने तैयार किया और मैंने बस कचौड़ियाँ तली हैं।”

रूही ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं और हाथ में पकड़े डिज़ाइनर पर्स को झटके से सोफे पर रखते हुए तपाक से बोली, “तुम्हारा दिमाग तो ठीक है तान्या? याद है कॉलेज के दिनों में मैंने तुम्हें कितना समझाया था कि अगर ज़िंदगी में सुकून, प्राइवेसी और तरक्की चाहती हो, तो ऐसे संयुक्त परिवारों के जंजाल से दूर ही रहना! पर तुम्हारे कानों पर तो जूँ तक नहीं रेंगी। यहाँ तो पूरा कुनबा सिर पर सवार रहता होगा!”

तान्या ने एक गहरी साँस ली, अपने दोनों हाथों को सीने से बाँधते हुए शांत स्वर में बोली, “रूही, तेरी उसी तथाकथित समझदारी और आज़ादी की बातों में आकर मैं अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल करने जा रही थी। सच कहूँ तो मैं अपने उस फ़ैसले पर आज भी शर्मिंदा हूँ। पर अब नहीं… अब मुझे किसी झूठी आज़ादी की चाह नहीं है। तू इस भरे-पूरे घर की कीमत नहीं समझ सकती, क्योंकि कुछ समय पहले तक मैं खुद भी इसे कहाँ समझ पाई थी! तभी तो अपनी ही नज़रों में गिर गई थी। पर इस परिवार के बड़प्पन ने मुझे माफ़ करके अपनी बाहों में समेट लिया। अब मुझे इन्हीं सबके बीच, इसी अपनेपन में सबसे ज़्यादा सुकून मिलता है।”

यह कहते-कहते तान्या की आँखें शून्य में ठहर गईं और उसका मन उन दिनों की यादों में भटक गया जब उसने पहली बार इस घर में कदम रखा था।

तान्या अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। पिता का जबलपुर में बहुत बड़ा रियल एस्टेट का कारोबार था और माँ शहर की नामी सोशलाइट थीं। आलीशान कोठी, नौकरों की कतार और हर ज़रूरत को उंगलियों के इशारे पर पूरा करने वाला अथाह पैसा—यही तान्या की दुनिया थी। मगर इस चमक-दमक के पीछे एक वीराना भी था। पिता हमेशा बिज़नेस टूर पर रहते, माँ अपनी किटी पार्टियों और क्लबों में व्यस्त रहतीं, और तान्या उस विशालकाय हवेली में अपने कमरे की चारदीवारी के भीतर नितांत अकेली सिमट कर रह जाती थी। अकेले रहना, किसी की दखलअंदाज़ी बर्दाश्त न करना और हर काम अपनी मर्ज़ी से करना ही उसका स्वभाव बन चुका था।

कॉलेज की पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात अक्षत से हुई। अक्षत एक बेहद संजीदा, हंसमुख और सुलझा हुआ इंसान था। बातों का सिलसिला बढ़ा, नज़दीकियाँ बढ़ीं और दोनों ने एक-दूसरे को अपना हमसफ़र चुनने का वादा कर लिया। जब अक्षत के परिवार की बात आई, तो अक्षत ने साफ़-साफ़ बताया था कि उसका परिवार बहुत बड़ा है। तीन भाई, माता-पिता, ताऊ-ताई और उनके बच्चे—सब एक ही छत के नीचे एक साथ रहते हैं। तान्या ने तब इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। उसने सोचा कि शादी के बाद वह अक्षत को अपने रंग में ढाल लेगी। अमीर बाप की इकलौती बेटी ने ज़िद पकड़ ली और आखिरकार दोनों का धूमधाम से विवाह हो गया।

शादी के बाद जब तान्या जबलपुर के उस पारंपरिक, बड़े से मकान में बहू बनकर आई, तो उसकी तथाकथित प्राइवेसी के परखच्चे उड़ने लगे। सुबह से ही घर में चहल-पहल शुरू हो जाती। कभी देवरानी किसी रेसिपी के लिए पूछने कमरे में आ जाती, कभी नन्हे भतीजे खेलने के लिए उसकी गोद में कूद पड़ते, तो कभी ताई जी आकर सिर पर हाथ फेरते हुए प्यार से कुछ नसीहत दे जातीं। तान्या को लगता जैसे उसकी आज़ादी छीन ली गई हो।

उसे यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता था कि उसके कमरे में कोई बिना खटखटाए आ जाए। उसके मायके से आए कीमती कपड़ों या सजावटी सामान को जब बच्चे छू लेते, तो उसका पारा सातवें आसमान पर चढ़ जाता था। वह मन ही मन घुटने लगी और उसने घर के सदस्यों से दूरी बनानी शुरू कर दी। वह खाने की मेज पर भी सबसे बाद में जाती और किसी से सीधी बात तक नहीं करती थी।

एक दिन बात हद से बढ़ गई जब अक्षत की छोटी बहन अपनी सहेली की शादी के लिए तान्या की एक रेशमी साड़ी माँगने आई। तान्या ने रूखेपन से साफ़ मना कर दिया और कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया। उस रात उसने अक्षत के सामने बगावत का बिगुल फूँक दिया।

“अक्षत! मैं इस धर्मशाला में एक पल भी और नहीं रह सकती! यहाँ कोई किसी की निजता का सम्मान नहीं करता। हर कोई मेरे कमरे में झाँकता रहता है। अगर तुम्हें मेरे साथ रहना है, तो हमें इस घर से अलग होना पड़ेगा। वरना मैं हमेशा के लिए अपने मायके जा रही हूँ।”

अक्षत ने अपनी माँ, पिता और बड़े भाई-भाभियों के प्यार की दुहाई दी। उसने समझाने की कोशिश की कि यहाँ कोई पराया नहीं है, सब उसका अपना परिवार हैं। लेकिन तान्या की हठ के आगे उसकी एक न चली। परिवार के बुजुर्गों ने जब देखा कि बात बहुत बिगड़ रही है और बहू का मन यहाँ नहीं लग रहा, तो उन्होंने भारी मन से अक्षत और तान्या को शहर के दूसरे कोने में एक फ्लैट किराए पर लेकर रहने की इजाजत दे दी।

फ्लैट में शिफ्ट होकर तान्या ने राहत की साँस ली। “फाइनली, माय ओन स्पेस!” उसने अपने सोशल मीडिया पर नए फ्लैट की तस्वीरें डालते हुए कैप्शन लिखा था। शुरुआत के कुछ हफ्ते तो आज़ादी के नशे में बहुत अच्छे गुज़रे। दोनों देर रात तक बाहर घूमते, जब मन करता होटल से खाना मँगवा लेते और अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी जीते। अक्षत ऊपर से मुस्कुराता था, लेकिन अंदर ही अंदर अपने भरे-पूरे परिवार, माँ के हाथ की रोटियों और भाइयों की हँसी-ठिठोली को याद करके उदास रहता था।

फिर क़ुदरत ने एक ऐसा पासा फेंका जिसने तान्या के सारे अहंकार को चकनाचूर कर दिया।

सर्दियों के दिन थे। अचानक एक रात तान्या को तेज़ कंपकंपी के साथ बुखार चढ़ा। सुबह तक उसका बदन तपने लगा और उल्टियाँ होने लगीं। अक्षत घबराकर उसे पास के एक निजी अस्पताल में ले गया। डॉक्टरों ने जब खून की जाँच की, तो रिपोर्ट देखकर उनके चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। डेंगू के गंभीर संक्रमण की वजह से तान्या की प्लेटलेट्स तेज़ी से गिरकर मात्र पंद्रह हज़ार पर पहुँच चुकी थीं। आंतरिक रक्तस्राव का ख़तरा मंडरा रहा था और डॉक्टरों ने तुरंत खून और एसडीपी (सिंगल डोनर प्लेटलेट्स) चढ़ाने की सख्त हिदायत दी।

समस्या यह थी कि तान्या का ब्लड ग्रुप ‘ओ नेगेटिव’ था, जो बेहद दुर्लभ माना जाता है। अस्पताल के ब्लड बैंक में उस समय यह ग्रुप उपलब्ध नहीं था। शहर के अन्य ब्लड बैंकों में भी तलाश की गई, लेकिन कहीं से सकारात्मक जवाब नहीं मिला।

तान्या के पिता को जब खबर लगी, तो वे तुरंत अस्पताल पहुँचे। उन्होंने अस्पताल के डायरेक्टर के सामने चेकबुक पटक दी और कहा, “जितना पैसा चाहिए ले लो डॉक्टर साहब, पर मेरी बेटी को कुछ नहीं होना चाहिए! प्राइवेट प्लेन मँगवा लीजिए, बाहर से डोनर बुलवाइए!”

लेकिन डॉक्टर ने बेबसी से हाथ जोड़ते हुए कहा, “पटेल साहब, यहाँ पैसे की नहीं, समय और सही डोनर की ज़रूरत है। अगर अगले तीन-चार घंटों में प्लेटलेट्स नहीं चढ़ाई गईं, तो मरीज़ को बचाना नामुमकिन हो जाएगा। डोनर का स्वस्थ होना और उसका खून तुरंत मैच होना ज़रूरी है।”

पैसों का घमंड एक पल में लाचारगी के आँसुओं में बह गया। तान्या बिस्तर पर नीम-बेहोशी की हालत में ज़िंदगी और मौत से जूझ रही थी। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा रहा था। पिता सिर पकड़कर रो रहे थे और अक्षत बदहवास सा इधर-उधर फोन मिला रहा था।

तभी आईसीयू के बाहर तेज़ कदमों की आहट हुई। अक्षत का पूरा परिवार—माता-पिता, ताऊ-ताई, दोनों भाई, भाभियाँ और यहाँ तक कि चचेरे देवर भी वहाँ पहुँच चुके थे। अक्षत के बड़े भाई ने आते ही अक्षत को सीने से लगाया और बोले, “तू अकेला क्यों लड़ रहा है अक्षत? जब पूरा परिवार तेरे पीछे खड़ा है, तो हिम्मत कैसे हार गया?”

घर के सभी नौजवानों और सदस्यों ने बिना एक पल गँवाए लैब में जाकर अपने खून की जाँच करवाई। कुदरत का करिश्मा कहिए या अटूट पारिवारिक डोर, तान्या के छोटे देवर मानव का ब्लड ग्रुप बिल्कुल वही ‘ओ नेगेटिव’ निकला।

मानव ने बिना किसी झिझक के अपनी बाहें आगे कर दीं। डॉक्टरों ने तुरंत प्लेटलेट्स निकालने की प्रक्रिया शुरू की और कुछ ही घंटों के भीतर तान्या के शरीर में जीवनदायिनी बूँदें टपकने लगीं। सुबह होते-होते तान्या की हालत खतरे से बाहर आ गई और प्लेटलेट्स की संख्या बढ़ने लगी।

जब तान्या को पूरी तरह होश आया, तो उसने देखा कि उसकी दाईं तरफ उसकी सास बैठी धीरे-धीरे उसके माथे पर हाथ फेर रही थीं और उनकी आँखों में आँसू थे। बाईं तरफ जेठानी जी थर्मस में हल्का सूप लिए खड़ी थीं। दरवाज़े पर उसका देवर मानव, कमज़ोरी के बावजूद चेहरे पर मुस्कान लिए खड़ा था।

तान्या ने जब सुना कि उसकी जान किसी और ने नहीं, बल्कि उसी देवर के खून ने बचाई है जिसे वह कभी अपने कमरे में फटकने भी नहीं देती थी, तो उसकी आत्मा काँप उठी। वह फूट-फूट कर रोने लगी।

मानव धीरे से आगे बढ़ा और मुस्कुराते हुए बोला, “अरे भाभी, रो क्यों रही हो? अब तो आपके शरीर में भी इसी घर का खून दौड़ रहा है। अब तो आप चाहकर भी हमसे अलग होने की बात नहीं कर सकतीं! आप तो हमेशा के लिए हमारी अपनी हो गईं।”

तान्या ने हाथ जोड़कर अपनी सास और जेठानी से माफ़ी माँगनी चाही, “माँ जी… भाभी… मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने आप सबके प्यार को नहीं समझा। मैंने रिश्तों को बंधन समझ लिया था…”

सास ने तान्या के आँसू पोंछते हुए उसे अपने सीने से लगा लिया और वात्सल्य भरे स्वर में कहा, “पगली, परिवार में कभी कोई माफ़ी नहीं माँगता। अगर बच्चे नादानी में रूठकर दूर चले भी जाएँ, तो क्या माँ-बाप उन्हें पराया कर देते हैं? तू हमारी अमानत है।”

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद तान्या उस किराए के फ्लैट में नहीं, बल्कि अपने उस भरे-पूरे संयुक्त परिवार के घर लौटी। अगले एक महीने तक जिस तरह पूरे परिवार ने उसकी सेवा की, दिन-रात उसका ख्याल रखा, उसने तान्या के दिल पर जमी सारी कड़वाहट और अकेलेपन की धूल को हमेशा के लिए धो दिया। उसने समझ लिया कि दौलत से दवाइयाँ और बिस्तर खरीदे जा सकते हैं, पर ज़िंदगी की डोर थामने वाला अपनापन सिर्फ़ और सिर्फ़ परिवार से मिलता है।

“अरे तान्या बहू! तुम अभी तक अपनी सहेली को बातों में ही उलझाए बैठी हो? चलो, जल्दी से खाना शुरू करवाओ। मैं गरमा-गरम फूली हुई रोटियाँ सेक कर ला रही हूँ!”

किचन के दरवाज़े से बड़ी जेठानी सौम्या जी ने हाथ में कैसरोल लिए प्यार भरी डाँट लगाते हुए आवाज़ दी।

सौम्या जी की आवाज़ से तान्या अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आई। उसने रूही की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोली, “देखा रूही, यहाँ कोई किसी को अकेला नहीं छोड़ता। इस भोजन की थाली में सिर्फ़ मसाले नहीं हैं, बल्कि हर रिश्ते का दुलार और परवाह घुली हुई है।”

रूही अवाक होकर तान्या और उसके घर के माहौल को देख रही थी। थोड़ी देर पहले जिस परिवार को वह झंझट और आज़ादी की रुकावट समझ रही थी, वहाँ बहते असीम स्नेह, आदर और सुरक्षा के भाव ने उसकी आँखें खोल दी थीं। रूही ने खाना खाया। भोजन के दौरान घर के बड़ों ने उससे जिस आदर और दुलार से बातें कीं, उसने रूही के दिल को गहराई तक छू लिया।

जब रूही जाने लगी, तो उसने दरवाज़े पर रुककर तान्या को कसकर गले लगाया और उसके कान में धीरे से कहा, “तान्या, मुझे अपनी सोच पर बेहद पछतावा हो रहा है। आज मुझे समझ आया कि चारदीवारी में अकेले रहना आज़ादी नहीं, बल्कि खुद को रिश्तों की छाँव से महरूम करना है। तू बहुत खुशनसीब है जो तुझे इतना प्यारा परिवार मिला। अब इस घर के प्यार और जड़ों को हमेशा ऐसे ही सहेज कर रखना।”

दोनों सहेलियाँ एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दीं। तान्या ने मुड़कर अपने घर की ओर देखा, जहाँ आँगन में हँसी के फव्वारे छूट रहे थे और चूल्हे की आँच से पूरे घर में आत्मीयता की महक बिखरी हुई थी।

दोस्तों, आज के आधुनिक दौर में हम अक्सर अपनी आज़ादी और प्राइवेसी के नाम पर अपनों से ही दूरियाँ बना लेते हैं। लेकिन सच तो यह है कि मुसीबत की घड़ी में पैसा, स्टेटस या फ्लैट की चारदीवारी काम नहीं आती, बल्कि परिवार के वे हाथ काम आते हैं जो बिना किसी शर्त के हमें थाम लेते हैं।

क्या आपको भी लगता है कि आधुनिकता की होड़ में हम संयुक्त परिवार की उस ताकत और सुरक्षा को खोते जा रहे हैं? इस बारे में आपकी क्या राय है, हमें अपनी अनमोल टिप्पणी करके ज़रूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .

लेखिका : रमा शुक्ला

error: Content is protected !!