शालिनी ने दोनों के पैर नहीं छोड़े। उसने रोते हुए कहा, “मुझे माफ कर दीजिए अम्मा जी, मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी। आज मेरे गुस्से और मेरी नासमझी ने मुझे इतना अंधा कर दिया था कि मैं अपने ही परिवार की जड़ों को कबाड़ समझ बैठी। मुझे चोट सामान के कोने से नहीं लगी थी, बल्कि मेरे भीतर के झूठे दिखावे और घमंड को चोट लगी थी। रोहन ने आज मेरी आँखें खोल दी हैं। अगर आज यह मुझे डांटते या मुझ पर गुस्सा करते, तो शायद मैं कभी अपनी गलती न समझ पाती। लेकिन इन्होंने जिस खूबसूरती से मुझे मेरी गलती का अहसास कराया है, उसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया है।”
“उफ! फिर वही हुआ… हे भगवान, इस भारी-भरकम संदूक का यह पीतल वाला कोना सीधे मेरी एड़ी पर आकर लगा है! खून ही निकल आता अभी। कितनी बार समझा चुकी हूँ अमित को कि इस पुराने सड़े-गले कबाड़ को किसी रद्दी वाले के हवाले कर दें। पर मजाल है जो किसी के कान पर जूं भी रेंग जाए! पता नहीं अम्मा-बाबूजी को अपनी इन फटी-पुरानी, बेढंगी चीजों से इतना क्या चिपकाव है? अरे जब गाँव छोड़कर शहर आना ही था, तो अपनी यह गृहस्थी वहीं किसी के हवाले कर आते या किसी जरूरतमंद को बाँट देते। पर नहीं, पूरी मिनी ट्रक भरवाकर यह सारा कूड़ा यहाँ नए फ्लैट में लाद लाए। मेरे इतने खूबसूरत, मॉडर्न इंटीरियर वाले घर को कबाड़खाना बनाकर रख दिया है। सहेलियाँ आती हैं तो मुझे शर्म आती है कि ड्राइंग रूम के पास यह सब क्या रखा है! बेटे को भी बस अपने माँ-बाप पर हद से ज्यादा प्यार उमड़ रहा था, जो बिना सोचे-समझे सबकुछ यहाँ उठा लाया!”
ड्राइंग रूम से लगे गलियारे में झाड़ू लगाते हुए बहू शालिनी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। पैर में लगी हल्की सी चोट ने उसकी हफ्तों से दबी खीझ को बाहर निकाल दिया था। उसकी आवाज इतनी तीखी और ऊंची थी कि फ्लैट की बालकनी में धूप सेंक रहे बुजुर्ग दंपत्ति के कानों में एक-एक शब्द शीशे की तरह चुभ गया।
बालकनी की छोटी सी बेंच पर बैठे पचहत्तर वर्षीय हरिशंकर जी और उनकी पत्नी पार्वती जी सन्न रह गए। दोनों के चेहरे पर गहरी उदासी और बेबसी छा गई। हरिशंकर जी ने अपने थरथराते हाथों से चश्मा ठीक किया और अपनी पत्नी की तरफ देखा, जिनकी आँखों में आँसू छलकने को बेताब थे।
हरिशंकर जी ने बहुत ही दबे स्वर में कहा, “सुन रही हो न रोहन की माँ? मैं तुमसे गाँव में ही कह रहा था कि हमें अपनी मिट्टी, अपना पुराना घर छोड़कर यहाँ शहर नहीं आना चाहिए। नई पीढ़ी का रहन-सहन, उनकी सोच और उनकी जिंदगी अलग होती है। उन्हें हमारी मौजूदगी तो शायद बर्दाश्त भी हो जाए, लेकिन हमारे साथ जुड़ी हमारी पुरानी आदतें और यह पुराना सामान उनकी आँखों में खटकेगा ही। पर तुम तो अपने बेटे का मोह नहीं छोड़ पाईं।”
पार्वती जी ने अपने आँचल के छोर से आँखें पोंछते हुए भरे गले से जवाब दिया, “और आप? आप जैसे तो बिल्कुल नहीं आना चाहते थे! जब पिछले महीने रोहन छुट्टी पर गाँव आया था और उसने आपका हाथ पकड़कर कहा था—’बाबूजी, अब आप पूरे चालीस साल की मास्टरी के बाद रिटायर हो चुके हैं। उम्र भी हो चली है, अब गाँव में अकेले रहने की कोई जरूरत नहीं। चलिए हमारे साथ शहर, वहाँ आपकी तबीयत का ख्याल भी रहेगा और नाती-पोतों के साथ दिन भी हँसी-खुशी कट जाएगा।’ तब कौन था जो पूरे गाँव में सीना चौड़ा करके सबको चाय पिलाता घूम रहा था? आप ही तो कह रहे थे कि हमारे रोहन जैसा आज्ञाकारी बेटा किसी का नहीं, जो हमें अपने साथ ले जाने आया है।”
हरिशंकर जी ने एक गहरी सांस छोड़ी और झुकी नजरों से फर्श को देखने लगे, “बात तो तुम्हारी सौ आने सच है पार्वती। पर मुझे क्या पता था कि जिस संदूक में हमारी पचास साल की गृहस्थी की यादें बंद हैं, जिस पुराने ट्रांजिस्टर पर मैंने जवानी से लेकर बुढ़ापे तक की सुबहें संगीत सुनकर बिताई हैं, वो सब यहाँ आकर अचानक कबाड़ बन जाएगा। हम तो अपनी यादें समेटकर लाए थे, पर यहाँ तो वो सब कचरा करार दे दिया गया।”
“कचरा नहीं है बाबूजी, यह तो हमारे परिवार की वो अनमोल विरासत है जिसने मुझे इस मुकाम तक पहुँचाया है।”
अचानक पीछे से आई एक शांत, मगर दृढ़ आवाज सुनकर दोनों बुजुर्ग चौंक गए। उन्होंने मुड़कर देखा तो उनका बेटा रोहन दरवाजे के पास खड़ा था। उसके चेहरे पर न कोई गुस्सा था, न कोई तनाव; बस एक गहरी समझदारी और आत्मसम्मान की चमक थी।
“रोहन! तुम… तुम कब उठे बेटा? आज तो इतवार था, तुम्हारी छुट्टी का दिन…” पार्वती जी घबराकर बोलीं, उन्हें डर था कि कहीं बेटे ने अपनी पत्नी की कड़वी बातें सुन तो नहीं लीं।
रोहन ने आगे बढ़कर अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखा और बाबूजी का हाथ थामते हुए मुस्कुराकर कहा, “मैं काफी देर से जाग चुका हूँ माँ। आप दोनों धूप में बैठे-बैठे परेशान मत होइए। चलिए, मेरे साथ अंदर आइए। मुझे आप दोनों को कुछ दिखाना है।”
हरिशंकर जी और पार्वती जी एक-दूसरे का चेहरा देखते हुए संकोच भरे कदमों से बेटे के पीछे-पीछे चल पड़े। रोहन उन्हें फ्लैट के उस सबसे बड़े कमरे में ले गया, जो पिछले तीन दिनों से बंद पड़ा था और जिसमें गाँव से लाया गया सारा सामान रखा हुआ था।
जैसे ही रोहन ने कमरे का दरवाजा खोला, हरिशंकर जी और पार्वती जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। वे दोनों चौखट पर ही ठिठक कर खड़े रह गए। कमरे का नजारा देखकर उन्हें अपनी आँखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था।
कमरे की दीवारें हल्के क्रीम रंग से सजी थीं और उस कमरे का कोना-कोना किसी राजसी और विंटेज आर्ट गैलरी की तरह चमक रहा था। वही बड़ा लोहे का संदूक, जिसके नुकीले कोने से टकराकर बहू अक्सर झल्लाती थी, अब पूरी तरह बदल चुका था। उस पर गहरे भूरे रंग की मैट पॉलिश चढ़ाई गई थी, उसके चारों कोनों पर पीतल के खूबसूरत, गोल और नक्काशीदार गार्ड लगा दिए गए थे ताकि किसी को चोट न लगे। संदूक के ऊपर एक बहुत ही गद्देदार, मखमली कुशन जड़वा दिया गया था, जिससे वह एक शानदार विंटेज दीवान या बैठने की शाही बेंच जैसा लग रहा था।
इतना ही नहीं, हरिशंकर जी की प्रिय पुरानी शीशम की आरामकुर्सी, जिसकी बेंत ढीली हो गई थी, उस पर नए सिरे से मजबूत बुनाई करवाई गई थी और लकड़ी पर ऐसी शीन आ रही थी मानो कल ही खरीदी गई हो। कोने में रखी छोटी सी पुरानी तिपाई को साइड टेबल का रूप देकर उस पर बाबूजी का वही पचास साल पुराना मर्फी का ट्रांजिस्टर रखा था। उस ट्रांजिस्टर के पुराने लकड़ी के ढाँचे को साफ करवाकर उस पर लेदर की बारीक फिनिशिंग दी गई थी और भीतर एक छोटा ब्लूटूथ रिसीवर भी फिट करा दिया गया था, जिससे वह अब नए जमाने के गानों के साथ-साथ पुराने आकाशवाणी के स्टेशन भी साफ-साफ बजा सकता था।
कमरे की एक दीवार पर हरिशंकर जी की पुरानी पीतल की घंटी, मास्टरी के समय मिली तख्तियां और पार्वती जी के हाथ की बनी पुरानी कसीदाकारी को बहुत ही सुंदर कांच के फ्रेमों में मढ़वाकर सजाया गया था।
पूरा कमरा एक अजीब से सुकून, अपनी मिट्टी की खुशबू और आधुनिक गरिमा का संगम लग रहा था।
पार्वती जी ने अपने कांपते हाथों से उस संदूक को छुआ, फिर मुड़कर अचंभित होकर बोलीं, “अरे रोहन! यह… यह सब क्या है बेटा? यह तो वही हमारी पुरानी चीजें हैं न, जिन्हें बहू कबाड़ कह रही थी? यह सब तो बिल्कुल नया और राजा-महाराजाओं के महल जैसा चमक रहा है! इसका तो पूरा रूप ही बदल गया।”
रोहन की आँखें हल्की सी नम हो गईं। उसने अपने पिता के दोनों हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, “बाबूजी, जिस बेटे को आपने अपनी फटी बनियान पहनकर पढ़ाया-लिखाया हो, जिस संदूक में माँ ने अपनी शादी के गहने गिरवी रखकर मेरी इंजीनियरिंग की फीस के पैसे सहेजे थे, जिस रेडियो की खबरों को सुनकर आपने मुझे दुनिया की समझ दी… अगर कोई उन चीजों को कबाड़ कहे और आपके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाए, तो क्या आपका यह बेटा चुपचाप खड़ा देखता रहता?”
हरिशंकर जी का गला रुंध गया, उन्होंने भारी मन से पूछा, “तो… तो क्या तुमने अपनी पत्नी की सारी बातें सुन ली थीं?”
“हाँ बाबूजी, मैंने सब सुन लिया था,” रोहन ने दृढ़ता से कहा, “लेकिन गलती सिर्फ शालिनी की नहीं है। हमारी आज की पीढ़ी यह भूल जाती है कि जिन चीजों को हम ‘आउटडेटेड’ या ‘कबाड़’ कहकर फेंकने पर आमादा रहते हैं, असल में उन्हीं पुरानी जड़ों पर हमारे वर्तमान का यह आलीशान महल खड़ा है। शालिनी को लगा कि यह सामान उसके घर के आधुनिक लुक को बिगाड़ रहा है। उसने केवल इसकी पुरानी, धूल-धूसरित ऊपरी परत देखी, इसके पीछे छिपे आपके पसीने, आपकी तपस्या और आपकी यादों को नहीं देखा। इसलिए मैंने तय किया कि मैं इस सामान को फेंकने के बजाय इसका ऐसा कायाकल्प करवाऊँगा कि कोई इसे कबाड़ कहने की जुर्रत न कर सके।”
रोहन ने आगे बताया, “पिछले तीन दिनों से मैं अपने एक इंटीरियर डिजाइनर दोस्त और कुछ बढ़इयों को बुलाकर इसी कमरे में काम करवा रहा था ताकि आपको एक सरप्राइज दे सकूं। यह कोई कबाड़ नहीं है बाबूजी, यह हमारे घर का सबसे कीमती कोना है—’विंटेज हेरिटेज कॉर्नर’। अब बताइए, क्या किसी को चोट लगेगी? क्या अब कोई इसे कबाड़ कह सकता है?”
दरवाजे के पीछे खड़ी शालिनी, जो चाय की ट्रे लेकर कमरे की तरफ बढ़ रही थी, यह सब सुन रही थी। रोहन का एक-एक शब्द उसके दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रहा था। उसे याद आया कि जब वह गाँव गई थी, तो इसी संदूक से निकाल कर पार्वती जी ने उसे अपने खानदानी कंगन पहनाए थे। उस संदूक की कीमत उसने सिर्फ एक लोहे के बक्से के रूप में आंकी थी, उस माँ के ममतामयी दिल के रूप में नहीं। उसे अपनी सोच की संकीर्णता पर बेहद पछतावा हुआ। उसे समझ आया कि घर केवल दीवारों पर लगे महंगे टाइल्स और इटैलियन मार्बल से खूबसूरत नहीं बनता, बल्कि घर बनता है बुजुर्गों के आशीर्वाद और उनकी स्मृतियों के सम्मान से।
शालिनी की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और संकोच से भरे कदमों से कमरे के भीतर दाखिल हुई। उसने हाथ में पकड़ी चाय की ट्रे साइड टेबल पर रखी और बिना कुछ कहे सीधे झुककर हरिशंकर जी और पार्वती जी के पैर छू लिए।
“बहू! अरे यह क्या कर रही हो?” पार्वती जी ने हड़बड़ा कर उसे उठाना चाहा।
शालिनी ने दोनों के पैर नहीं छोड़े। उसने रोते हुए कहा, “मुझे माफ कर दीजिए अम्मा जी, मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी। आज मेरे गुस्से और मेरी नासमझी ने मुझे इतना अंधा कर दिया था कि मैं अपने ही परिवार की जड़ों को कबाड़ समझ बैठी। मुझे चोट सामान के कोने से नहीं लगी थी, बल्कि मेरे भीतर के झूठे दिखावे और घमंड को चोट लगी थी। रोहन ने आज मेरी आँखें खोल दी हैं। अगर आज यह मुझे डांटते या मुझ पर गुस्सा करते, तो शायद मैं कभी अपनी गलती न समझ पाती। लेकिन इन्होंने जिस खूबसूरती से मुझे मेरी गलती का अहसास कराया है, उसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया है।”
शालिनी ने मुड़कर उस संदूक पर हाथ फेरा और कहा, “बाबूजी, अब यह कमरा इस घर का सबसे खास कमरा होगा। और मैं वादा करती हूँ कि आज के बाद आपकी किसी भी याद, आपकी किसी भी चीज और सबसे बढ़कर आपके मान-सम्मान पर कभी कोई आंच नहीं आने दूंगी।”
हरिशंकर जी की आँखें भर आईं। उन्होंने आगे बढ़कर बहू के सिर पर अपना कांपता हुआ हाथ रख दिया और बोले, “जीती रहो बहू, खुश रहो। इंसान से ही गलतियां होती हैं और जो समय रहते अपनों की कद्र समझ ले, वही सच्चा गृहस्थ है। तुमने अपनी भूल समझ ली, हमारे लिए इससे बड़ा सुख और क्या हो सकता है।”
पार्वती जी ने शालिनी को गले से लगा लिया। घर का वह भारी और घुटन भरा माहौल अचानक एक असीम शांति और अपनत्व में बदल गया।
रोहन ने आगे बढ़कर उस पुराने मर्फी ट्रांजिस्टर का बटन दबाया। कमरे में मध्यम स्वर में एक पुराना, मधुर गीत गूँजने लगा—’याद न जाए, बीते दिनों की…’। उस मधुर धुन के बीच, जब पूरा परिवार उस चमचमाते संदूक के पास एक साथ बैठा, तो लगा कि बरसों पुरानी यादें आज फिर से नई होकर मुस्कुरा रही थीं।
रिश्तों की खूबसूरती इस बात में नहीं है कि हम पुरानी चीजों और पुराने लोगों को छोड़कर आगे बढ़ जाएँ, बल्कि इसमें है कि हम अपनी जड़ों को सींचते हुए, उन्हें नए जमाने के साथ इस तरह जोड़ें कि न बुजुर्गों का आत्मसम्मान टूटे और न ही घर की शांति।
आज के इस दौर में हम अक्सर अपने घर को ‘मॉडर्न’ और ‘स्टाइलिश’ बनाने के चक्कर में अपने ही बुजुर्गों की भावनाओं और उनकी संजोई हुई यादों को ‘कबाड़’ या ‘आउटडेटेड’ करार दे देते हैं। क्या आपके घर में भी कोई ऐसी पुरानी चीज या संदूक है जो सिर्फ एक बेजान वस्तु नहीं, बल्कि आपके परिवार के संघर्षों और पुरखों के प्यार का जीता-जागता सबूत है? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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