कोख की देवी

“मेरी बच्ची… मेरी लाडो… मुझे माफ कर दे बेटा…” देवकी अम्मा ने बच्ची को अपने सीने से चिपका लिया और फूट-फूटकर रो पड़ीं। उन्होंने बच्ची के कोमल माथे को चूमा और सरला से बोलीं, “बहू, मुझे माफ कर दे। मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे। तूने तो हमारे घर में साक्षात जगदम्बा को जन्म दिया है।” पूरा वार्ड उस मार्मिक दृश्य को देखकर भावुक हो उठा। दरवाजे पर खड़ी शालिनी के होंठों पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई।

 ‘आनंद निवास’ की विशाल हवेली रंग-बिरंगी रोशनी से नहाई हुई थी। मुख्य द्वार पर गेंदे और चमेली के ताजे फूलों की महकती हुई लटकनें हर आने-जाने वाले का मन मोह रही थीं। प्रांगण में बज रही शहनाई की मधुर धुन वातावरण में एक पवित्र उल्लास भर रही थी। डॉक्टर शालिनी जैसे ही मुख्य द्वार से भीतर प्रविष्ट हुईं, उनकी नजरें उस सजे-धजे प्रांगण में किसी परिचित चेहरे को तलाशने लगीं। अभी वे दो कदम ही आगे बढ़ी थीं कि चांदी जैसी सफेद बालों वाली एक बुजुर्ग महिला ने आगे बढ़कर बड़ी आत्मीयता से उनके दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए।

“अरे डॉक्टर बिटिया! आ गईं आप… आपके बिना तो हमारे घर का यह उत्सव बिल्कुल अधूरा रह जाता।” उन बुजुर्ग महिला, देवकी अम्मा के चेहरे पर ऐसी श्रद्धा और अपनापन था, जो केवल अपनों के लिए ही झलकता है।

शालिनी ने झुककर उनके चरण स्पर्श किए और मुस्कुराते हुए कहा, “प्रणाम दादी मां! भला मैं कैसे नहीं आती? यह दिन तो हम सबके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। और फिर यह सब तो ईश्वर की ही कृपा है।”

“नहीं बिटिया, भगवान ऊपर बैठकर लीला रचता है, लेकिन धरती पर उस लीला को सही दिशा देने के लिए आप जैसे फरिश्तों को ही माध्यम बनाता है। उस दिन अगर आपने मेरी बंद आंखों पर से अज्ञान का पर्दा न हटाया होता, तो शायद आज मैं इस खुशहाल आंगन में खड़े होने लायक भी न रहती,” कहते-कहते देवकी अम्मा का गला भर आया। उन्होंने पास खड़े सेवक को इशारा किया और शालिनी के हाथ में मेवे की खीर का कटोरा थमाते हुए बोलीं, “तुम पहले मुंह मीठा करो बिटिया, हम अभी समधन जी से मिलकर आते हैं।”

शालिनी ने खीर का एक चम्मच मुंह में रखा और सामने मंच की ओर देखने लगीं। मंच पर नीले रंग के शानदार औपचारिक परिधान में खड़ी पच्चीस वर्ष की तन्वी अपने माता-पिता और बड़ी बहन के साथ खड़ी मेहमानों का अभिवादन स्वीकार कर रही थी। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास और आंखों में एक अनोखा तेज था। उस भव्य और शालीन युवती को देखकर शालिनी का मन अतीत के पन्नों में खो गया। समय का पहिया कितनी तेजी से घूमता है… वही नन्हीं सी जान, जिसे कभी इस दुनिया में आते ही तिरस्कार की ठंडी हवाएं झेलनी पड़ी थीं, आज सफलता के किस मुकाम पर खड़ी थी!

शालिनी को याद आया, यह लगभग पच्चीस साल पुरानी बात थी। तब वे ग्वालियर के जिला महिला चिकित्सालय में बतौर मुख्य स्त्री रोग विशेषज्ञ अपनी सेवाएं दे रही थीं। अस्पताल की उस चारदीवारी में उन्होंने जिंदगी और मौत के न जाने कितने रूप देखे थे, लेकिन एक बात जो उनके संवेदनशील दिल को हमेशा छलनी कर देती थी, वह थी समाज की दोहरी मानसिकता। जब भी प्रसूति कक्ष के बाहर किसी नवजात बालक के जन्म की घोषणा होती, तो बाहर बैठे परिजनों के चेहरे खिल उठते, ढोल-नगाड़े बजने लगते, मिठाइयां बंटने लगतीं और बधाई देने वालों का तांता लग जाता। इसके विपरीत, जब किसी कन्या का जन्म होता, तो अस्पताल का गलियारा किसी मातम जैसी खामोशी में डूब जाता। रिश्तेदार एक-दूसरे को ऐसे सांत्वना देते मानो कोई बहुत बड़ी विपदा आ पड़ी हो। लोग दबी जुबान में कहते, “चलो कोई बात नहीं, अगली बार भगवान बेटा देगा।” शालिनी जब भी यह देखतीं, उनका मन भीतर तक व्यथित हो उठता कि इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर खड़ा होकर भी यह समाज कोख में पलने वाली अपनी ही बेटियों से इतना पराया व्यवहार कैसे कर सकता है।

उसी दौर की एक दोपहर अस्पताल में सरला नाम की एक महिला को भर्ती कराया गया। वह प्रसव पीड़ा से कराह रही थी। उसके साथ उसकी सास देवकी अम्मा और पति विमलेश भी आए थे। सरला की पहले से एक तीन साल की प्यारी सी बेटी थी, जिसका नाम लावण्या था। अस्पताल के गलियारे में देवकी अम्मा का पारा सातवें आसमान पर था। वे बार-बार डॉक्टरों के कमरे की ओर चक्कर काट रही थीं और अपनी माला फेरते हुए बड़बड़ा रही थीं।

जब शालिनी राउंड पर निकलीं, तो देवकी अम्मा ने उनका रास्ता रोक लिया और बड़े रौबदार स्वर में बोलीं, “सुनो डॉक्टर मैडम, अंदर मेरी बहू है। पहले से हमारे घर में एक लड़की बैठी है। अबकी बार हमें कुल का दीपक ही चाहिए। हमारे खानदान का नाम आगे बढ़ाने वाला कोई होना चाहिए ना! पूरे नौ महीने मैंने शीतला माता के मंदिर में मन्नत के नारियल बांधे हैं। बस किसी भी तरह हमें पोता ही मिलना चाहिए।”

शालिनी ने बहुत ही शांति और संयम के साथ कहा, “माता जी, यह सब हमारे या आपके हाथ में नहीं होता। यह प्रकृति और ईश्वर की देन है। आप बस भगवान से यह प्रार्थना कीजिए कि जच्चा और बच्चा दोनों पूरी तरह स्वस्थ रहें।”

लेकिन देवकी अम्मा के तेवर तल्ख ही रहे, “अरे क्या स्वस्थ रहें! बेटा नहीं हुआ तो यह जिंदगी किस काम की? वंश कैसे चलेगा?”

शालिनी समझ गईं कि इस समय इन्हें कुछ भी समझाना व्यर्थ है, क्योंकि रूढ़िवादिता की पट्टी इनकी आंखों पर बहुत गहराई से बंधी हुई थी। वे चुपचाप ऑपरेशन थिएटर की ओर बढ़ गईं। कुछ ही घंटों की मशक्कत के बाद सरला ने एक बेहद सुंदर, गोल-मटोल और स्वस्थ कन्या को जन्म दिया। बच्ची की पहली किलकारी से पूरा लेबर रूम गूंज उठा। लेकिन जब शालिनी बच्ची को तौलिए में लपेटकर बाहर आईं और उन्होंने विमलेश और देवकी अम्मा से कहा, “बधाई हो, आपके घर साक्षात लक्ष्मी का अवतार हुआ है, बहुत प्यारी बेटी हुई है!”

यह सुनते ही देवकी अम्मा का चेहरा एकदम से स्याह पड़ गया। उनकी त्योरियां चढ़ गईं और वे गुस्से में बिफर पड़ीं, “फिर से लड़की? मार डाला भगवान ने! हमारे कर्म ही फूट गए। कुल का नाश करने के लिए एक और बला हमारे सिर मढ़ दी।” उन्होंने नवजात बच्ची की ओर देखना तक गवारा नहीं किया और मुंह फेरकर अस्पताल की बेंच पर जाकर बैठ गईं।

उधर विमलेश का दिल भी एक पल के लिए भारी हुआ था, लेकिन अपनी औलाद को देखकर उसका पितृत्व जाग उठा। उसने शालिनी के हाथों से अपनी नन्ही बेटी को गोद में ले लिया और उसकी पेशानी को चूम लिया। उसने कहा, “डॉक्टर साहिबा, मेरे लिए बेटा और बेटी दोनों एक समान हैं। अगर भगवान ने मुझे दो परियां दी हैं, तो मैं इनका पालन-पोषण राजकुमारियों की तरह करूंगा।” विमलेश ने पूरे अस्पताल स्टाफ में मिठाइयां बंटवाईं, लेकिन देवकी अम्मा ने मिठाई का एक टुकड़ा तक मुंह में नहीं रखा।

सरला को कुछ जटिलताओं के कारण दो दिन अस्पताल में ही रुकना पड़ा। उन दो दिनों में देवकी अम्मा एक बार भी उस नवजात बच्ची के पास नहीं फटकती थीं। वे जब भी कमरे में आतीं, सरला को ही कोसने लगतीं कि उसने उनके वंश को आगे बढ़ाने वाला वारिस नहीं दिया। सरला अपने आंसुओं को तकिये में छिपाकर रोती रहती। शालिनी से यह सब देखा नहीं गया। उन्हें लगा कि यदि आज इस बुजुर्ग महिला की सोच को नहीं बदला गया, तो यह नन्ही बच्ची जीवन भर अपने ही घर में तिरस्कार और हीनभावना का शिकार होती रहेगी।

छुट्टी वाले दिन, जब विमलेश कागजी कार्रवाई पूरी करने गया था, शालिनी ने देवकी अम्मा को अपने केबिन में बुलाया। देवकी अम्मा अनिच्छा से आकर कुर्सी पर बैठ गईं।

शालिनी ने मेज पर रखे पानी के जग से एक गिलास पानी भरकर उनके सामने रखा और बहुत ही शांत स्वर में पूछा, “अम्मा जी, आपके गले में तुलसी की कंठी है और माथे पर चंदन का तिलक। क्या आप रोज पूजा-पाठ करती हैं?”

देवकी अम्मा ने गर्व से सिर ऊंचा करके कहा, “हां डॉक्टर बिटिया, बचपन से ही नियम है। बिना पूजा किए तो मैं अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं डालती। भगवान शिव, राम जी, हनुमान जी और हमारी कुलदेवी दुर्गा मैया… सबकी आरती करती हूं।”

शालिनी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “अम्मा जी, नवरात्रि में आप क्या करती हैं?”

“नवरात्रि में नौ दिन का अखंड उपवास रखती हूं और नवमी के दिन नौ कन्याओं को घर बुलाकर उनके पांव पखारती हूं, उन्हें हलवा-पूरी खिलाती हूं, दक्षिणा देती हूं और उनके चरण छूकर आशीर्वाद मांगती हूं। कन्याएं तो साक्षात जगतजननी का रूप होती हैं ना!” देवकी अम्मा ने श्रद्धाभाव से उत्तर दिया।

शालिनी की आंखें अचानक गंभीर हो गईं। उन्होंने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया और सीधी नजरें देवकी अम्मा की आंखों में डालकर बोलीं, “अम्मा जी, फिर मुझे एक बात समझाइए… जो इंसान बाहर दूसरों की बेटियों के पैर धोकर उनका जूठन तक सिर माथे लगाता है, वही इंसान अपने ही खून से जन्मी, अपने ही आंगन की साक्षात देवी को अपनाने से क्यों कतरा रहा है? नवरात्रि में जिस देवी के आगे आप गिड़गिड़ाती हैं, आज जब वही देवी आपके घर अपनी कृपा बरसाने आई है, तो आपने उससे मुंह क्यों मोड़ लिया? क्या आपकी वह नौ दिन की पूजा केवल एक ढोंग और पाखंड है?”

शालिनी के इस सीधे और तीखे प्रहार से देवकी अम्मा बुरी तरह अचकचा गईं। उनका चेहरा कभी लाल तो कभी पीला पड़ने लगा। वे हकलाते हुए बोलीं, “नहीं… बिटिया, वो बात नहीं है… लेकिन बेटा तो वंश चलाता है ना! बुढ़ापे की लाठी बनता है। बेटी तो पराए घर चली जाएगी, वह हमारा क्या सहारा बनेगी?”

शालिनी ने एक गहरी सांस ली और अत्यंत ममतामयी स्वर में समझाना शुरू किया, “अम्मा जी, यह समाज का सबसे बड़ा भ्रम है। बेटा केवल तब तक आपका है जब तक उसकी शादी नहीं होती, लेकिन बेटी जीवन के अंतिम सांस तक माता-पिता के दुख-दर्द की साझीदार होती है। और रही बात वंश की, तो इतिहास गवाह है कि कुल का नाम बेटों से नहीं, बल्कि बच्चों के अच्छे संस्कारों और कर्मों से रोशन होता है। जरा अपनी आंखें बंद करके सोचिए अम्मा जी… जब आप बीमार पड़ेंगी, जब आपका बदन दर्द से टूटेगा, तो क्या आपका बेटा आकर आपके पैर दबाएगा? नहीं! वह तो कमाने बाहर चला जाएगा। तब यही दोनों नन्हीं परियां दौड़-दौड़कर आपके लिए दवा का घूंट लाएंगी, आपके सिर पर तेल की मालिश करेंगी और आपकी हर कराह पर इनके आंसू निकल पड़ेंगे। सोचिए, जब ये दोनों बच्चियां अपनी तोतली जुबान में आपको ‘दादी मां… दादी मां…’ कहकर पुकारेंगी और आपके आंचल में छिपेंगी, तो क्या आपको स्वर्ग का सुख नहीं मिलेगा? क्या दुनिया का कोई भी बेटा अपनी मां को वह निस्वार्थ ममता दे सकता है जो एक बेटी देती है?”

शालिनी की बातें देवकी अम्मा के अंतर्मन में हथौड़े की तरह चोट कर रही थीं। शालिनी ने आगे कहा, “सीता मैया भी तो अपनी बहनों के साथ पली-बढ़ी थीं। क्या राजा जनक का मान कम हो गया था? अम्मा जी, भगवान बहुत सोच-समझकर किसी आंगन में बेटी की सौगात भेजता है। बेटियां उन्हीं के नसीब में होती हैं, जिन पर ईश्वर का विशेष आशीर्वाद होता है। अगर आज आपने अपनी इस लक्ष्मी का तिरस्कार किया, तो याद रखिएगा, आप सिर्फ अपनी पोती का नहीं, बल्कि उस ईश्वर का और खुद अपने नारी रूप का अपमान कर रही हैं।”

शालिनी का एक-एक शब्द सत्य की आग में तपा हुआ था। देवकी अम्मा की आंखों के सामने से रूढ़िवादिता और अंधविश्वास का पर्दा भरभराकर गिर पड़ा। उनके भीतर की सोई हुई ममता और विवेक जाग उठा। उन्हें लगा कि जैसे किसी ने उन्हें एक भयानक पाप करने से ऐन वक्त पर रोक लिया हो। उनकी आंखें आंसुओं से भर आईं और दोनों हाथ कांपने लगे।

वे बिना कुछ बोले अपनी कुर्सी से उठीं और लड़खड़ाते कदमों से सीधे वार्ड नंबर चार की ओर दौड़ीं। वार्ड का दरवाजा खोलकर जब वे भीतर पहुंचीं, तो देखा कि सरला अपनी बच्ची को सीने से लगाए बैठी थी और उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। देवकी अम्मा ने बिना एक पल गंवाए आगे बढ़कर अपनी बहू के सिर पर हाथ रखा और अपने कांपते हाथों से उस नन्ही बच्ची को गोद में उठा लिया।

“मेरी बच्ची… मेरी लाडो… मुझे माफ कर दे बेटा…” देवकी अम्मा ने बच्ची को अपने सीने से चिपका लिया और फूट-फूटकर रो पड़ीं। उन्होंने बच्ची के कोमल माथे को चूमा और सरला से बोलीं, “बहू, मुझे माफ कर दे। मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे। तूने तो हमारे घर में साक्षात जगदम्बा को जन्म दिया है।” पूरा वार्ड उस मार्मिक दृश्य को देखकर भावुक हो उठा। दरवाजे पर खड़ी शालिनी के होंठों पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई।

उस घटना के कुछ महीनों बाद, सरला जब अपनी बच्ची को टीका लगवाने अस्पताल आई, तो उसके चेहरे पर एक अलौकिक चमक थी। उसने शालिनी को बताया कि उस बच्ची के जन्म के ठीक ग्यारहवें दिन, विमलेश का वर्षों से फंसा हुआ पुश्तैनी जमीन का एक बड़ा विवाद अचानक उनके पक्ष में सुलझ गया और उन्हें बहुत बड़ा मुआवजा मिला। देवकी अम्मा इतनी गदगद हुईं कि उन्होंने कहा, “यह सब मेरी तन्वी के शुभ कदमों का फल है। यह कोई साधारण कन्या नहीं, यह तो हमारे घर की साक्षात अन्नपूर्णा है।” और उसी दिन देवकी अम्मा ने घोषणा कर दी थी कि वे जो नया आशियाना बनवा रहे हैं, उसका नाम ‘आनंद निवास’ रखेंगे, क्योंकि इस नन्ही जान ने उनके पूरे परिवार को सच्चा आनंद और नई सोच दी थी।

वर्षों बीतते गए। शालिनी का तबादला दूसरे अस्पताल में हो गया, लेकिन देवकी अम्मा और उनका परिवार हमेशा शालिनी के संपर्क में रहा। हर दीवाली और नवरात्रि पर तन्वी और उसकी बड़ी बहन लावण्या शालिनी का आशीर्वाद लेने जरूर आती थीं। देवकी अम्मा ने अपनी दोनों पोतियों को बेटों से बढ़कर पाला। उन्होंने समाज के हर ताने का डटकर मुकाबला किया। बड़ी बेटी लावण्या ने उच्च शिक्षा प्राप्त करके शिक्षा जगत में अपना नाम कमाया और कॉलेज में प्रोफेसर बनी।

वहीं छोटी बेटी तन्वी, जिसके जन्म पर कभी मातम सा सन्नाटा पसर गया था, उसने बचपन से ही एक बड़ा सपना देखा था। उसने दिन-रात एक करके कठिन परिश्रम किया और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा में देश भर में शीर्ष स्थान हासिल किया। वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के लिए चुनी गई थी। आज उसी ऐतिहासिक सफलता का जश्न मनाने के लिए यह भव्य समारोह आयोजित किया गया था, जहां शहर के गणमान्य नागरिक, आला अधिकारी और रिश्तेदार उस परिवार को बधाई देने के लिए कतार में खड़े थे।

“शालिनी मौसी! आप यहां अकेली खड़ी क्या सोच रही हैं? चलिए, मंच पर सब आपका ही इंतजार कर रहे हैं,” एक खनकती हुई, मधुर आवाज ने शालिनी की तंद्रा तोड़ी। सामने तन्वी खड़ी थी, उसकी आंखों में वही मासूमियत और चेहरे पर गरिमा थी।

शालिनी वर्तमान में लौटीं। उन्होंने स्नेह से तन्वी के सिर पर हाथ फेरा और कहा, “कुछ नहीं बेटा, बस यह देख रही थी कि जब एक बेटी को सही दिशा, प्यार और विश्वास का संबल मिलता है, तो वह किस तरह पूरे कुल का गौरव बन जाती है।”

तन्वी ने शालिनी का हाथ थामा और दोनों मंच की ओर बढ़ गईं। मंच पर खड़े होकर तन्वी ने माइक संभाला और पूरे सभागार के सामने कहा, “मेरी इस सफलता का सबसे बड़ा श्रेय मेरी दादी मां और मेरी मां को जाता है, जिन्होंने मुझे सिखाया कि एक लड़की की सीमाएं केवल चौखट तक नहीं, बल्कि पूरे आसमान को छूने की होती हैं। और मेरी प्रेरणा हैं डॉक्टर शालिनी मौसी, जिनकी एक सही सीख ने आज मुझे इस काबिल बनाया।” पूरे सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। सामने बैठी देवकी अम्मा की आंखों से खुशी और गर्व के आंसू बह रहे थे।

दोस्तों, बेटा अगर कुल का मान होता है, तो बेटियां दोनों कुलों की मर्यादा, संस्कार और अभिमान होती हैं। आज का यह दौर साबित कर चुका है कि बेटियों को यदि अवसर और समर्थन दिया जाए, तो वे धरती से लेकर अंतरिक्ष तक हर क्षेत्र में इतिहास रच सकती हैं। किसी के घर में बेटी का जन्म होना ईश्वर के विशेष अनुग्रह का प्रतीक है, न कि किसी दुर्भाग्य का।

इस कहानी पर आपकी क्या राय है? क्या आज भी हमारे समाज के कुछ हिस्सों में बेटा और बेटी के बीच यह अंतर मौजूद है? और इस मानसिकता को पूरी तरह समाप्त करने के लिए हमें अपने घरों में किस तरह के बदलाव लाने चाहिए? अपने अनमोल विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .

error: Content is protected !!