अपने ही आंगन में पराये कदम

 साक्षी झल्लाते हुए तकिए पर हाथ पटक कर बोली, “राहुल! मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि मम्मी-पापा को मत बुलाओ। ये पुराने जमाने के लोग आएंगे तो हर बात में नुक्स निकालेंगे। यह मत करो, वो मत करो। आजकल डॉक्टर खुद फॉर्मूला मिल्क की सलाह देते हैं। मुझे थोड़ा आराम चाहिए, मेरा सिजेरियन हुआ है और मुझे शांति की जरूरत है!”

उर्मिला जी ने भी तुरंत सुर में सुर मिलाया, “हां बहन जी, आजकल सब डिब्बे का ही दूध पिलाते हैं। कौन मांएं अपनी सेहत खराब करती हैं। वो जमाने लद गए जब औरतें छह-छह महीने कमरे में बंद रहती थीं।”

  सत्तर साल की कल्याणी देवी कभी इस कमरे से उस कमरे में जातीं, तो कभी पुराने संदूक को खोलकर उसमें से छोटे बच्चों के ऊनी कपड़े, पुराने समय के ताबीज और जड़ी-बूटियों की पोटलियां निकालतीं। उनके चेहरे पर छाई झुर्रियां आज खुशी के मारे खिल उठी थीं।

पास ही चश्मा लगाए बैठे उनके पति त्रिलोकीनाथ जी अपनी पुरानी चमड़े की अटैची की धूल झाड़ रहे थे। कल्याणी देवी ने रसोई की तरफ नजर दौड़ाते हुए आवाज लगाई, “सुनिए जी, ज़रा जल्दी हाथ चलाइए ना! पूरे दो साल बीत गए अपने लाल के घर गए हुए। अब तो हमारे घर का कुलदीपक, हमारा पोता आ गया है। इस बुढ़ापे में भगवान ने इतनी बड़ी नेमत बख्शी है। अस्पताल में तो पहली झलक भी देखने नहीं जा पाए, पर अब जब तक अपने कलेजे के टुकड़े को सीने से लगाकर जी भर खिला नहीं लूंगी, मेरी आंखों को चैन कहां मिलेगा।”

त्रिलोकीनाथ जी ने हंसते हुए सिर हिलाया और बोले, “अरे भागवान, ज़रा सांस तो ले लो! ताला ठीक से बंद किया है न पिछले दरवाजे का? पोते के मोह में ऐसा न हो कि घर खुला ही छोड़ दो और चोर सारा बही-खाता साफ कर जाएं। तुम तो ऐसे उतावली हो रही हो जैसे पूरा शहर ही तुम्हारे स्वागत में पलकें बिछाए खड़ा हो।”

“आप भी ना बस ताने ही मारते रहिए! मन ही मन आप कितने लड्डू फोड़ रहे हैं, यह मुझसे छुपा है क्या? अब जल्दी कीजिए, बस छूट जाएगी तो उस बड़े शहर की ट्रेन भी निकल जाएगी।” कल्याणी देवी ने अपनी पोटली संभालते हुए कहा।

त्रिलोकीनाथ जी और कल्याणी देवी दोनों ही सत्तर की उम्र पार कर चुके थे। उनका इकलौता बेटा राहुल अपनी पत्नी साक्षी के साथ पुणे में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था। शादी को दो साल हुए थे, लेकिन काम की आपाधापी में बच्चे कभी गांव आ ही नहीं पाते थे। जब से राहुल ने फोन पर यह खुशखबरी सुनाई थी कि साक्षी ने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया है, तब से दोनों बुजुर्गों के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उन्होंने घर पर शुद्ध घी के मेवे वाले गोंद के लड्डू बनाए, अजवाइन का अर्क तैयार किया और लंबे सफर की परवाह किए बिना बस और ट्रेन का सफर तय कर आखिरकार पुणे पहुंच ही गए।

पुणे स्टेशन पर राहुल अपनी नई सेडान गाड़ी लेकर लेने आया था। उसने माता-पिता के पैर छुए और सामान डिक्की में रख दिया।

गाड़ी में बैठते ही कल्याणी देवी से रहा नहीं गया, “बेटा राहुल, हमारा मुन्ना कैसा है? और बहू साक्षी की तबीयत कैसी है? सिजेरियन हुआ था न उसका, दर्द तो नहीं है उसे ज्यादा? मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि दस दिन पहले मुझे बुला लो, तो मैं बहू की देखरेख कर देती, पर तुमने कहा कि सब संभल जाएगा।”

राहुल ने स्टीयरिंग संभालते हुए हल्के संकोच से कहा, “अरे मां, साक्षी की मम्मी, यानी आपकी समधन उर्मिला जी, पिछले एक महीने से हमारे फ्लैट पर ही हैं। वो सब देख रही हैं, इसलिए मैंने आपको इतनी ठंड में पहले बुलाकर परेशान नहीं करना चाहा।”

त्रिलोकीनाथ जी ने थोड़ा हैरान होकर पूछा, “अरे, तूने बताया ही नहीं कि समधन जी पहले से आई हुई हैं?”

“पापा, बस काम के चक्कर में और डिलीवरी की भागदौड़ में दिमाग से निकल गया,” राहुल ने बात संभालते हुए कहा।

फ्लैट पर पहुंचते ही दरवाजा खुला। घर आधुनिक साज-सज्जा से चमक रहा था। तभी समधन उर्मिला जी अंदर से मुस्कुराती हुई निकलीं। उनके हाथ में पानी की ट्रे थी।

“आइए-आइए समधी जी, बहन जी! सफर बहुत लंबा था, बहुत थक गए होंगे आप लोग। बैठिए सोफे पर, पानी पीजिए,” उर्मिला जी ने बड़ी औपचारिकता से कहा।

कल्याणी देवी ने सोफे पर बैठते हुए फिर बेटे से वही सवाल किया, “बेटा राहुल, ज़रा पहले बता तो देता कि समधन जी पहले से यहां हैं, तो हम कुछ और तैयारी करके आते।”

राहुल इस बार थोड़ा झल्ला गया और आवाज ऊंची करते हुए बोला, “मां, अब एक ही बात को कितनी बार खींचोगी? बोल तो दिया कि भूल गया था। मम्मी एक महीने से साक्षी की सेवा कर रही हैं, रात-रात भर जागती हैं। आप लोग तो बस हर बात पर टोकना शुरू कर देते हैं।”

बेटे की इस तीखी आवाज से कल्याणी देवी का चेहरा फक पड़ गया। उनकी आंखें डबडबा आईं। त्रिलोकीनाथ जी ने पत्नी की उदासी भांपकर धीमे से उनका हाथ दबाया और बोले, “अच्छा छोड़ो राहुल, जरा हमें अंदर ले चलो, हम अपने पोते को अपनी आंखों से देख तो लें।”

“अरे समधी जी, रुकिए जरा,” उर्मिला जी फौरन बीच में आ गईं। “आप लोग बाहर से इतने लंबे सफर से आ रहे हैं, ट्रेन की धूल-मिट्टी लगी होगी। पहले हाथ-मुंह धो लीजिए। राहुल, जरा पापा-मम्मी के हाथ सैनिटाइज करवा दो। आजकल नवजात बच्चों में इन्फेक्शन का कितना खतरा रहता है, आपको पता ही है।”

सत्तर साल के त्रिलोकीनाथ जी और कल्याणी देवी किसी मूक दर्शक की तरह एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। राहुल ने बिना कुछ कहे उनकी हथेलियों पर कड़वी महक वाला सैनिटाइजर छिड़क दिया। दोनों ने चुपचाप अपने हाथ मले और चेहरे पर पानी के छींटे मारे।

कल्याणी देवी से अब और रुका नहीं जा रहा था। वे उत्सुकता से बहू के बेडरूम की तरफ बढ़ने लगीं।

तभी उर्मिला जी ने फिर टोका, “अरे बहन जी, कहां जा रही हैं? अभी साक्षी और मुन्ना दोनों गहरी नींद में हैं। डॉक्टर ने कहा है कि जच्चा-बच्चा को पूरा आराम चाहिए। आप लोग ड्राइंग रूम में बैठिए, मैं चाय भिजवाती हूं।”

त्रिलोकीनाथ जी से अब बर्दाश्त नहीं हुआ। उनके स्वाभिमान को ठेस लगी थी। वे तल्ख आवाज में बोले, “समधन जी, जब आप पिछले एक घंटे से उसी कमरे में बैठी थीं, तो क्या हमारे अंदर जाने से बच्चे की नींद में खलल पड़ जाएगा? आखिर हम भी तो उस बच्चे के दादा-दादी हैं। क्या दो मिनट के लिए अपने पोते का माथा चूमने का हक भी हमें इजाजत लेकर मिलेगा?”

उर्मिला जी ने बात संभालते हुए कहा, “मेरा वो मतलब नहीं था समधी जी… बस आप लोग सफर से थके हैं, इसलिए कहा।”

घर में एक अजीब सा तनाव फैल गया। दोनों बुजुर्गों को महसूस होने लगा कि अपने ही बेटे के घर में वे किसी बिन बुलाए मेहमान की तरह कोने में बिठा दिए गए हैं। दोपहर का खाना आया, लेकिन उर्मिला जी खुद थाली सजाकर साक्षी के कमरे में ले गईं और अंदर से दरवाजा सटा दिया। कल्याणी देवी और त्रिलोकीनाथ जी को डाइनिंग टेबल पर खाना परोस दिया गया।

शाम के चार बज चुके थे। घर पहुंचे हुए पूरे पांच घंटे बीत गए थे, लेकिन पोते का दीदार तक नहीं हुआ था। आखिरकार कल्याणी देवी का सब्र टूट गया। वे थोड़ी ढीठ बनकर खुद ही बेडरूम का दरवाजा धकेलकर अंदर दाखिल हो गईं।

“हमें आए हुए पूरा दिन बीतने को आया, पर अपने ही खून की एक झलक पाने के लिए हम तरस गए। क्या हमारे पोते पर हमारा कोई हक नहीं?” कल्याणी देवी कमरे में पहुंचते ही रुंधे गले से बोल पड़ीं।

बिस्तर पर लेटी बहू साक्षी ने सास-ससुर को देखा तो थोड़ा असहज होकर उठने की कोशिश की, “नमस्ते मम्मी जी, नमस्ते पापा जी।”

“जीती रहो बहू, खुश रहो,” कल्याणी देवी ने आगे बढ़कर प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। “कैसी हो बेटा? शरीर में कोई दर्द तो नहीं?”

साक्षी ने नजरें चुराते हुए कहा, “ठीक हूं मम्मी जी। पर राहुल ने आपको इतनी दूर से क्यों परेशान किया? अगले महीने जब डॉक्टर मुझे सफर की इजाजत देते, तो हम खुद ही गांव आने वाले थे। वहां आराम से मिलते। यहां फ्लैट में जगह की भी तंगी है, ज्यादा लोग होंगे तो मम्मी को और परेशानी होगी संभालने में।”

कल्याणी देवी का कलेजा यह सुनकर बैठ गया। फिर भी उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की, “अरे बहू, हम परेशान करने नहीं, तुम्हारा हाथ बंटाने आए हैं। मैं मुन्ने की सुबह-शाम मालिश कर दूंगी, तुम्हारे लिए गोंद और सोंठ के लड्डू बना लाई हूं। जो बाकी बचे हैं, वो यहां शुद्ध मेवे डालकर बना दूंगी।”

साक्षी ने तुरंत हाथ जोड़ लिए, “नहीं-नहीं मम्मी जी, प्लीज! मेरी मां ने सारे लड्डू पहले ही देसी घी के बनवा कर रख दिए हैं। और मुन्ने के लिए हमने प्रोफेशनल मालिश वाली बाई रख ली है जो रोज आकर हाइजीनिक तरीके से बेबी मसाज करती है। आप इन सब झंझटों में मत पड़िए, आपकी उम्र आराम करने की है।”

कल्याणी देवी ने एक ठंडी सांस भरी, “जैसी तुम्हारी मर्जी बहू। लाओ, ज़रा अपने इस लाल को मेरी गोद में दे दो।”

पालने से उठाकर जब कल्याणी देवी ने उस मासूम को अपनी बांहों में लिया, तो उनकी सारी थकान, सारा अपमान जैसे एक पल में उड़ गया। बच्चे के गुलाबी गाल और नन्हीं उंगलियों को चूमते हुए वे भावुक होकर बोलीं, “अरे वाह! यह तो बिल्कुल अपने दादाजी के नक्श पर गया है। वही चौड़ा माथा और वही तीखी नाक!”

पास खड़ी उर्मिला जी तपाक से बोल उठीं, “अरे बहन जी, आपको अंधेरे में तीर चलाने की आदत है क्या? यह तो रत्ती-रत्ती मेरी बेटी साक्षी पर गया है। इसकी आंखें, इसके कान बिल्कुल मेरी बेटी जैसे हैं, और साक्षी की शक्ल पूरी मुझ पर है।”

कल्याणी देवी ने विवाद बढ़ाने के बजाय बच्चे को त्रिलोकीनाथ जी की गोद में देना चाहा। त्रिलोकीनाथ जी ने कांपते हाथों से अपनी बाहें फैलाईं ही थीं कि उर्मिला जी ने लपककर बच्चे को अपनी गोद में समेट लिया, “अरे समधी जी, रुकिए! इसके दूध का समय हो गया है। इसे भूख लगी है, रोने लगेगा।”

कल्याणी देवी ने हैरानी से पूछा, “तो बहू अपना दूध नहीं पिला रही क्या?”

साक्षी झल्लाते हुए तकिए पर हाथ पटक कर बोली, “राहुल! मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि मम्मी-पापा को मत बुलाओ। ये पुराने जमाने के लोग आएंगे तो हर बात में नुक्स निकालेंगे। यह मत करो, वो मत करो। आजकल डॉक्टर खुद फॉर्मूला मिल्क की सलाह देते हैं। मुझे थोड़ा आराम चाहिए, मेरा सिजेरियन हुआ है और मुझे शांति की जरूरत है!”

उर्मिला जी ने भी तुरंत सुर में सुर मिलाया, “हां बहन जी, आजकल सब डिब्बे का ही दूध पिलाते हैं। कौन मांएं अपनी सेहत खराब करती हैं। वो जमाने लद गए जब औरतें छह-छह महीने कमरे में बंद रहती थीं।”

त्रिलोकीनाथ जी की खाली बाहें हवा में ही रह गईं। उनके चेहरे पर अपमान की एक गहरी लकीर खिंच गई। उन्होंने चुपचाप अपने हाथ समेट लिए और कमरे से बाहर निकल आए।

अगले तीन दिन उन दोनों बुजुर्गों के लिए किसी जेल की सजा से कम नहीं थे। चौबीस घंटों में शायद मुश्किल से एकाध बार उन्हें बच्चे को दूर से देखने दिया जाता। जब भी वे बच्चे के पास जाते, कभी उसके सोने का बहाना बना दिया जाता, तो कभी उसे हवा न लगने की बात कहकर दरवाजा बंद कर लिया जाता। सुबह का नाश्ता और रात का खाना उन्हें मेहमानों की तरह मेज पर परोस दिया जाता। न कोई उनसे हाल पूछता, न कोई घर की बातें करता।

कल्याणी देवी बार-बार अपने बेटे राहुल की ओर देखतीं कि शायद उनका बेटा अपनी मां के बहते आंसुओं को समझेगा, शायद वह कहेगा कि ‘मां, तुम इस घर की मालकिन हो, तुम्हारा हक सबसे पहले है।’ लेकिन राहुल या तो अपने लैपटॉप में आंखें गड़ाए रहता या नजरें झुकाकर कमरे से खिसक जाता। उसे अपनी पत्नी की नाराजगी का डर था।

पांचवें दिन की सुबह, त्रिलोकीनाथ जी ने अपनी अटैची पैक कर ली। कल्याणी देवी ने भी अपने संदूक को बंद कर दिया। दोनों के चेहरे पर एक शांत, मगर गहरा वैराग्य था।

त्रिलोकीनाथ जी ने हॉल में आकर शांत स्वर में कहा, “राहुल बेटा, हमने अपनी वापसी की टिकट करवा ली है। आज शाम की ट्रेन से हम गांव लौट रहे हैं।”

राहुल ने चौंककर देखा, “अरे पापा, इतनी जल्दी क्या है? अभी तो आए थे आप लोग।”

त्रिलोकीनाथ जी ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “बेटा, हम यहां अपने पोते पर प्यार लुटाने और बहू की सेवा करने आए थे। पर अब समझ आ गया कि यहां हमारी कोई जरूरत नहीं है। दिन भर खाली बैठकर दूसरों पर बोझ बनने से अच्छा है कि हम अपने उसी पुराने पुश्तैनी घर में रहें, जहां कम से कम अपनी मर्जी से सांस तो ले सकते हैं। तुम लोग सुखी रहो, हमारे बच्चे का ख्याल रखना।”

साक्षी के चेहरे पर एक राहत भरी चमक साफ दिखाई देने लगी। उसे लगा कि अब बिना किसी रोक-टोक के घर पर उसका राज रहेगा।

लेकिन तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी।

कमरे से उर्मिला जी अपना बड़ा सा ट्रॉली बैग खींचते हुए बाहर निकलीं। उनका बैग पूरी तरह पैक था। साक्षी ने अवाक होकर देखा, “अरे मम्मी! यह क्या? आप अपना बैग क्यों निकाल रही हैं? आप कहां जा रही हैं?”

उर्मिला जी के चेहरे पर आज वह बनावटी कठोरता नहीं थी, बल्कि एक गहरा पश्चाताप और आत्मग्लानि थी। उन्होंने अपनी बेटी साक्षी की ओर देखा और बहुत गंभीर आवाज में बोलीं, “साक्षी, मैं भी आज ही अपने घर लौट रही हूं। मैंने बहुत बड़ी भूल कर दी जो पिछले एक महीने से तेरे इस घर में डेरा जमाए बैठी रही।”

साक्षी घबरा गई, “मम्मी, यह आप क्या कह रही हैं? आपके सहारे ही तो मैं इस पूरे घर को संभाल रही थी। अगर आप चली जाएंगी तो मैं अकेली इस बच्चे को कैसे देखूंगी?”

उर्मिला जी ने आगे बढ़कर साक्षी के दोनों हाथ पकड़े और उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “साक्षी, आज तक मैं सोचती थी कि मैं तेरी मां हूं, इसलिए तेरा सहारा बनना मेरा फर्ज है। लेकिन पिछले चार दिनों से जो तमाशा मैंने इस घर में देखा है, उसने मेरी अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। मैं चुपचाप देख रही थी कि तू किस तरह अपने सगे सास-ससुर का अपमान कर रही थी। और सबसे बड़ा गुनाह मेरा था कि मैं तेरी गलत बातों में तेरा साथ दे रही थी।”

उर्मिला जी की आवाज भारी हो गई, “साक्षी, तेरा असली सहारा मैं नहीं हूं। तेरा असली सहारा वो सामने खड़े तेरे सास-ससुर हैं! जिस बूढ़े बाप ने अपने खून-पसीने की कमाई से राहुल को इस काबिल बनाया कि वह आज इस बड़े शहर में यह आलीशान फ्लैट खरीद सका, आज तू उसी बाप को अपनी दहलीज पर भिखारी बनाकर खड़ा कर रही है? जिस मां ने अपनी पूरी जवानी अपने बेटे पर न्योछावर कर दी, तू उसे उसके पोते की सूरत देखने के लिए तरसा रही है?”

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। राहुल का सिर शर्म से झुक गया। साक्षी की आंखें फटी की फटी रह गईं।

उर्मिला जी ने अपनी बात जारी रखी, “साक्षी, बेटी की ससुराल में मां का काम आग लगाना या अपनी हुकूमत चलाना नहीं होता, बल्कि अपनी बेटी को उसके नए परिवार में घुलना-मिलना सिखाना होता है। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है। अगर मैं आज यहां से नहीं गई, तो तू कभी इस घर को अपना नहीं समझ पाएगी। तूने अपने सास-ससुर को जो दर्द दिया है, याद रख, कल जब तेरा यह बेटा बड़ा होगा और तेरी बहू तेरे साथ यही सुलूक करेगी, तब तुझे इस बूढ़ी मां और बाप के आंसुओं की कीमत समझ आएगी। तेरा असली परिवार यही है साक्षी, अपने इस परिवार की कद्र करना सीख।”

उर्मिला जी ने मुड़कर त्रिलोकीनाथ जी और कल्याणी देवी के आगे हाथ जोड़ दिए, “समधी जी, बहन जी… मुझे माफ कर दीजिए। ममता के झूठे मोह में पड़कर मैंने आप दोनों के मान-सम्मान को ठेस पहुंचाई। मेरी बेटी नादान है, इसे अपनी बच्ची समझकर क्षमा कर दीजिएगा।”

कल्याणी देवी की आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने आगे बढ़कर उर्मिला जी के हाथ थाम लिए, “अरे समधन जी, आप यह क्या कह रही हैं? आप तो हमारी बहन जैसी हैं।”

साक्षी अपनी जगह पर जड़वत खड़ी थी। अपनी मां के इन तीखे, मगर सच्चे शब्दों ने उसके दिमाग पर पड़ा अहंकार का पर्दा एक झटके में फाड़ दिया था। उसने देखा कि उसके ससुर की आंखें भीगी हुई थीं और सास का चेहरा ममता और दर्द से भरा हुआ था। उसे याद आया कि जब उसकी शादी हुई थी, तो कल्याणी देवी ने अपनी मां का खानदानी सोने का हार उसके गले में पहनाते हुए कहा था कि ‘आज से तू मेरी बहू नहीं, मेरी सबसे लाडली बेटी है।’

साक्षी के घुटने मुड़ गए। वह तेजी से आगे बढ़ी और सीधे कल्याणी देवी और त्रिलोकीनाथ जी के चरणों में गिर पड़ी।

“मम्मी जी… पापा जी… मुझे माफ कर दीजिए!” साक्षी फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी सिसकियों से कमरा गूंज उठा। “मैं बहुत अंधी हो गई थी। अपने सुख और आराम के आगे मैंने आपका दिल छलनी कर दिया। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है पापा जी… प्लीज मुझे छोड़कर मत जाइए। अगर आप चले गए तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी।”

राहुल भी अपनी आंखों में पश्चाताप के आंसू लिए अपने पिता के पैरों में बैठ गया, “पापा, मुझे भी माफ कर दीजिए। मैं अपनी जिम्मेदारियां भूल गया था। मुझे लगा था कि चुप रहकर मैं घर में शांति बनाए रख रहा हूं, पर मैं यह नहीं समझा कि मेरी खामोशी मेरे माता-पिता के सम्मान का कत्ल कर रही थी।”

त्रिलोकीनाथ जी का कठोर चेहरा पिघल गया। उनके होंठ कांपने लगे। उन्होंने राहुल और साक्षी दोनों को अपने हाथों से उठाया और सीने से लगा लिया।

कल्याणी देवी ने साक्षी का सिर अपनी छाती से चिपका लिया और उसके आंसू पोंछते हुए बोलीं, “अरे पगली, मां-बाप भी कभी अपने बच्चों से नाराज होते हैं क्या? तूने अपनी भूल समझ ली, हमारे लिए यही सबसे बड़ा सुख है। अब रोना बंद कर, नहीं तो मेरे मुन्ने पर इसका असर पड़ेगा।”

तभी उर्मिला जी कमरे से उस नन्हें बच्चे को अपनी गोद में उठाकर ले आईं और उन्होंने बहुत ही आदर के साथ उस नन्हीं जान को त्रिलोकीनाथ जी की फैली हुई बांहों में रख दिया।

त्रिलोकीनाथ जी ने जब अपने पोते को सीने से लगाया, तो उनकी आंखों से टपके आंसुओं ने उस नन्हे बालक के माथे का अभिषेक कर दिया। बच्चे ने अपनी छोटी-छोटी आंखें खोलीं और अपने दादाजी की दाढ़ी को अपनी नन्हीं मुट्ठी में पकड़ लिया। पूरा घर उस मासूम की पहली अधूरी मुस्कान से खिल उठा।

साक्षी ने अपने आंसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा, “मम्मी जी, अब आप कहीं नहीं जा रही हैं। और हां, अब हम सब मिलकर अगले हफ्ते गांव चलेंगे। वहीं हमारे पुश्तैनी आंगन में, पूरे खानदान और कुलदेवता के सामने मेरे बेटे का नामकरण संस्कार होगा। उस आंगन की मिट्टी का आशीर्वाद मेरे बच्चे को सबसे पहले मिलना चाहिए।”

राहुल ने उत्साह से भरकर कहा, “बिल्कुल साक्षी! गांव के उस बड़े आंगन से बेहतर जगह और क्या हो सकती है। पूरे गांव को दावत दी जाएगी!”

त्रिलोकीनाथ जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उनके चेहरे की खोई हुई चमक पूरी तरह लौट आई थी। जिस घर में सुबह तक अजनबीपन की दीवारें खड़ी थीं, शाम ढलते-ढलते वही घर प्यार, सम्मान और अटूट पारिवारिक बंधनों के पावन संगम में तब्दील हो चुका था। ग्वालियर से चले उन दो बुजुर्गों की तपस्या सफल हो चुकी थी, क्योंकि देर से ही सही, उनके आंगन में रिश्तों का असली वसंत लौट आया था।

अक्सर आधुनिकता और निजता के नाम पर हम यह भूल जाते हैं कि बुजुर्गों का आशीर्वाद किसी भी घर की सबसे मजबूत नींव होता है। क्या आपको भी लगता है कि बेटी की ससुराल में मां का सही मार्गदर्शन और बुजुर्गों का आदर ही एक खुशहाल परिवार को टूटने से बचा सकता है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : मीनाक्षी सिंह

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